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किसानों को खेत में फ़सलों की बुआई से लेकर उसकी कटाई तक तमाम जोखिमों से सुरक्षा देने वाली मोदी सरकार की फ़्लैगशिप योजना प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना का सुरक्षा कवच इन दिनों कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। खरीफ-2016 में शुरू हुई फसल बीमा योजना को 2020-21 के रबी सीजन में कुल 10 सीज़न पूरे हो जाएंगे। लेकिन महज इन्हीं पांच सालों में कई राज्य सरकारों ने इस योजना को नमस्ते बोल दिया। सबसे हाल में इस योजना का साथ छोड़ने वाला राज्य बीजेपी शासित और खुद पीएम मोदी का गृह राज्य गुजरात है।

पीएम फसल बीमा योजना को सबसे पहले बिहार सरकार ने खरीफ सीज़न 2018-19 में अलविदा कहा। फिर पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश ने इससे खुद को अलग कर लिया। मई 2020 में तेलंगाना और झारखंड ने भी इसका साथ छोड़ने का ऐलान कर दिया। इसी साल जुलाई में गुजरात ने भी इस योजना से कम से कम इस साल के लिए दूरी बनाने का फैसला किया। अब ख़बरें आ रही हैं कि महाराष्ट्र और राजस्थान सरकारें भी इस योजना से खुद को अलग करने पर विचार कर रही हैं।

मोदी सरकार की फ्लैगशिप योजना होने के बावजूद आखिर इस योजना में ऐसा क्या हुआ कि एक-एक कर राज्य सरकारें इससे किनारा करते जा रही हैं? हालांकि, केंद्र सरकार ने इस योजना को प्रभावी बनाने के लिए समय-समय पर इसके दिशा-निर्देशों में कई बड़े बदलाव किए हैं। फरवरी 2020 में इससे जुड़ी सबसे बड़ी मांग को मानते हुए बैंकों से कर्ज लेने वाले किसानों के लिए फसल बीमा को स्वैच्छिक बना दिया गया। लेकिन कृषि क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का यह दांव कहीं न कहीं उलटा पड़ गया है। 

पहले जब किसान केसीसी या किसान क्रेडिट कार्ड पर कृषि कर्ज लेते थे तो खुद-ब-खुद उनकी फसल का बीमा हो जाता था। लेकिन अब ऐसे किसानों को फसलों का बीमा न कराने की छूट मिल गई है, बस इसके लिए उन्हें संबंधित बैंक को लिखित में जानकारी देनी जरूरी है। हालांकि, फसल नुकसान के मुकाबले बेहद मामूली बीमा क्लेम और इसके भी भुगतान में देरी से परेशान किसानों ने इस साल इस विकल्प का धड़ाधड़ इस्तेमाल किया है। इसका नतीजा यह हुआ कि ख़रीफ़ 2019 के मुक़ाबले ख़रीफ़-2020 में फसल बीमा कराने वाले किसानों की संख्या घट गई है।

फसल बीमा कराने वाले किसानों की संख्या घटी

 खरीफ-2020खरीफ-2019
किसानों की संख्या16,595,60818,728,803
बीमित क्षेत्र (हेक्टेयर)27,030,96228,801,786
कुल प्रीमिमय (रुपये)18420.5717519.06
स्रोत – पीएम फसल बीमा योजना की आधिकारी वेबसाइट

जैसा कि पहले से अंदेशा था, वही हुआ। किसानों की संख्या घटने के साथ फसल बीमा के प्रीमियम का खर्च बढ़ गया है (टेबल देखें)। इसका सीधा असर है कि किसानों और सरकारों के लिए फसल बीमा प्रीमियम की दरें पहले के मुकाबले बढ़ गई हैं। किसानों को रबी सीजन में फसलों के लिए 1.5 फीसदी, खरीफ सीजन में 2 फीसदी, जबकि नगदी फसलों के लिए पांच फीसदी प्रीमियम देना होता है। बाक़ी का प्रीमियम केंद्र और राज्य सरकारें आधा-आधा बांटकर भरती हैं।

हरियाणा में अखिल भारतीय किसान सभा के सचिव बलबीर सिंह ठाकन का कहना है कि पिछले साल तक हरियाणा में कपास की प्रीमियम दर प्रति एकड़ जहां 600 रुपये थी, वहीं अब इस योजना के स्वैछिक होने के बाद यह ढाई गुना बढ़कर 1650 रुपये प्रति एकड़ हो गई है। वे इस बार किसानों के फसल बीमा से दूर भागने के पीछे इसे एक बड़ी वजह बताते हैं।

फसल बीमा के प्रीमियम में उछाल और इससे किसानों को नुकसान के मुकाबले बहुत कम बीमा क्लेम का भुगतान दो बड़े कारण हैं कि जिसकी वजह से राज्य सरकारें इस योजना से दूरी बना रही हैं। चाहे गुजरात सरकार हो या बिहार, सभी ने एक सुर में कहा है कि उन्हें भारी-भरकम प्रीमियम चुकाना पड़ता है, जबकि उसके मुकाबले किसानों को बहुत कम सुरक्षा मिल पाती है। इन राज्यों ने इसकी जगह पर किसानों को मुआवजा देने की अपनी-अपनी की योजनाएं शुरू की हैं। इसके लिए किसानों या राज्य सरकारों को कोई प्रीमियम नहीं भरना होगा। हालांकि, इससे किसानों को फसल नुकसान से कितनी सुरक्षा मिल पाएगी, यह अलग सवाल है।

फसल बीमा योजना में आने वाली कुछ व्यावहारिक दिक्कतों की बात करें तो ज़्यादातर मौकों पर किसानों को बीमा क्लेम पाने के लिए बैंक, तहसील और राजस्व विभाग में दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। आज तक शिकायतों को निपटाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए गांव तक बीमा कंपनियों के दफ्तर नहीं खुल पाए हैं। ऐसे में जो बैंक बीमा कम्पनी के लिए प्रीमियम राशि काटते हैं, अक्सर वे किसानों के बीमा संबंधी सवालों का सही से जवाब नहीं दे पाते हैं, कभी फाइल में किसानों की बीमा पॉलिसी नहीं चढ़ पाती है, कृषि विभाग या बीमा कम्पनी की तरफ़ से कोई रसीद भी नहीं दी जाती है, जिससे किसानों को पता चल सके कि किस फसल के लिए कितनी प्रीमियम राशि उनके बैंक खाते से काटी गयी है।

मौसम की उठापटक और इससे फसलों का नुकसान बढ़ने के मामलों के बीच फसल बीमा कराने वाले किसानों की संख्या बढ़ने के बजाए घटी है, जो बताता है कि सरकार अभी तक किसानों को फसल बीमा, इसकी प्रक्रिया और फायदों को समझाने में नाकाम रही है।

किसानों के बीच जागरुकता की कमी का अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि उन्हें पता ही नहीं कि बीमा के लिए दो प्रकार के सर्वे होते हैं- एक मिड सर्वे, जब फसल खराब होती है और दूसरा सर्वे फसल कटाई के समय फसल कटाई अनुप्रयोग यानी क्रॉप कटिंग इक्स्पेरिमेंट्स (सीसीई)। किसानों के बीच जानकारी की कमी का लाभ उठाकर बीमा कंपनियों के एजेंट कई गांव में सीसीई के लिए सही आकार का प्लॉट काटकर उसके आंकड़े ही नहीं जुटाते। प्रगतिशील किसानों का आरोप है कि राजस्व विभाग के अधिकारी खेत में गए बिना ही बीमा एजेंट से सांठगांठ करके ऑफिस में ही बैठकर क्रॉप यील्ड यानी फ़सल उत्पादन के मनमाने आंकड़े चढ़ा देते हैं और इससे किसानों को बाद में फसल बीमा क्लेम का लाभ नहीं मिल पाता है।

राजस्व विभाग की रिपोर्ट के आधार पर बीमा कंपनियां प्रीमियम तो 100 फ़ीसदी काटती हैं, लेकिन क्लेम देते वक्त एरिया फैक्टर की दुहाई देकर क्लेम 70 फीसदी राशि तक सीमित कर देती हैं। प्रीमियम और क्लेम के भुगतान के अनुपात में भारी अंतर है। 2016 से 2019 तक प्रीमियम-क्लेम भुगतान में अंतर को देखें तो कंपनियों को मिले प्रीमियम के मुकाबले 11,490 करोड़ रुपये कम क्लेम का भुगतान किया गया है।

उत्तर प्रदेश में बिजनौर जिले के किसान और राष्ट्रीय किसान मज़दूर संगठन से जुड़े आदित्य बताते हैं कि ‘योजना की डिज़ाइन में ही फाल्ट है। किसी बीमा कंपनी का जिले में कोई ऑफिस नहीं होता है, न तो उनके बीमा एजेंट ही होते हैं। इस योजना से किसानों को फायदा होने की जगह बीमा कंपनियों को मुनाफा हुआ है। सरकार जितना पैसा प्रीमियम भरने में खर्च करती है, अगर उतना पैसा सीधा किसान तक पहुंच जाए तो उन्हें काफी राहत मिल जाएगी।’ 

इस साल सभी बीमा एक्सपर्ट की ज़ुबान पर मध्य प्रदेश का उदाहरण है। पूर्व केंद्रीय कृषि सचिव सिराज हुसैन कहते हैं कि ‘सारा का सारा मॉनसून सीज़न ख़त्म होने को आया, तीन महीने बीत गए, तब जाकर मध्य प्रदेश सरकार फसल बीमा कराने चली है, जबकि बाढ़, बारिश से फ़सलें ख़राब हो चुकी हैं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘आमतौर पर खरीफ सीज़न के लिए मॉनसून के पहले पूर्वानुमान के साथ ही बीमा कम्पनी का टेंडर निकल जाना चाहिए यानी अप्रैल के आस-पास ताकि राज्य सरकारें और बीमा कंपनियों को तैयारी का वक़्त मिल सके, लेकिन अक्सर ऐसा नहीं होता है, यह सभी राज्यों की समस्या है।’ 

असल में मध्य प्रदेश में जो हुआ वह किसी मज़ाक़ से कम नहीं है। इस दफ़ा कोविड की वजह से फसल बीमा के लिए रजिस्ट्रेशन में देरी हुई। इसे देखते हुए बीमा रजिस्ट्रेशन की आख़िरी तारीख़ 31 जुलाई तय की गयी। जहां बाक़ी राज्यों में यह काम इस अवधि में पूरा हो गया, वहीं एमपी के लिए कट ऑफ डेट को 31 अगस्त तक बढ़ाना पड़ा। फिर भी बीमा कम्पनी के टेंडर तय करने का काम ही अगस्त के अंत तक पूरा हो पाया। इस बीच मध्य प्रदेश के किसानों के अकाउंट से फसल बीमा प्रीमियम की राशि लगातार काटी जाती रही। यहां योजना के स्वैछिक होने की जानकारी बहुत कम किसानों के पास थी, इसलिए बहुत से किसानों को न चाहते हुए भी फसल बीमा प्रीमियम चुकाना पड़ा। बाद में कुछ इलाक़ों में बाढ़ के चलते प्रीमियम भरने की आख़िरी तारीख़ को सात सितंबर तक बढ़ाया गया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

पहले सूखा, फिर बारिश, बाद में सोयाबीन पर येलो मोज़ेक के हमले और फिर बाढ़ ने इस साल मध्य प्रदेश के किसानों को बड़े पैमाने पर नुक़सान पहुंचाया है। कई जगहों पर सोयाबीन की फसल 100 फीसदी तक खराब हो चुकी है। अब किसान संशय में हैं कि इस भारी-भरकम नुकसान को देखते हुए बीमा कंपनी क्लेम देगी भी या नहीं, और क्लेम देगी तो कितना देगी?

हरदा जिले के किसान बृजेश जाट बताते हैं कि ‘तस्वीर भयावह है, किसानों को RBC -6(4) के तहत कोई फौरी राहत राशि मिल नहीं पाई है, फसल बीमा क्लेम भी एक-दो साल लेट चल रहा है और बची-कुची सोयाबीन की फसल का बाजार में सही भाव नहीं मिल रहा है। इसकी वजह मध्य प्रदेश में मॉडल क़ानून के विरोध में कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) की मंडियों में हड़ताल है। इससे मंडी के बाहर नए कानून के तहत सोयाबीन खरीदने वाले व्यापारियों ने इसके भाव गिरा दिए हैं, खुली लूट मची हुई है।’

किसानों की इन तमाम परेशानियों के बीच 18 सितंबर 2020 को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने एक क्लिक में सीधे किसानों के खाते में 4,688 करोड़ रुपये का फसल बीमा क्लेम भेजने का दावा किया। लेकिन मध्य प्रदेश के किसान नेता केदार सिरोही इस पर सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं कि ‘4,688 करोड़ रुपये में से अभी तक 2,628 करोड़ रुपये का भुगतान लंबित हैं, 10 दिन की गिनती बहुत गिनी है, अब ये वन क्लिक की गिनती भी समझा दो।’

किसान भी फसल बीमा क्लेम तय करने, सर्वे करने के तौर-तरीक़ों और क्लेम के भुगतान पर सवाल उठा रहे हैं। देवास जिले के किसान रणजीत रघुनाथ बताते हैं, ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की गाइडलाइन के अनुसार कोई भी फसल जब खराब हो जाती है तब किसानों को अगली फसल की तैयारी के लिए तत्काल सहायता के तौर पर फसल बीमा क्लेम की 25 फीसदी राशि दी जानी चाहिए, जो किसानों को नहीं मिली है।’ वे आगे कहते हैं कि, ‘अभी 2019 के खरीफ सीजन का बीमा क्लेम दिया गया है, उसमें भी भारी अनियमितताएं हैं, अकेले देवास जिले में 184 पटवारी हलकों को फसल बीमा क्लेम के लाभ से वंचित कर दिया गया है, यहां 10-15 हजार रुपये का फसल बीमा क्लेम बन रहा था, लेकिन किसानों के बैंक खातों में एक भी रुपया नहीं आया है।’ 

मध्य प्रदेश एक बानगी है कि कैसे फ़रवरी 2016 में बड़े जोर-शोर के साथ शुरू की गई मोदी सरकार की यह अतिमहत्वपूर्ण योजना अब धक्के खा रही है। किसान नेता रमनदीप सिंह मान के मुताबिक, ‘फसल बीमा योजना में बीमा कंपनियों की चांदी हो गई है और ये कभी किसान की परवाह नहीं करतीं, क्योंकि इन पर कोई सरकारी नियंत्रण नहीं है। रूल तो यह है कि नुक़सान के आंकड़े मिल जाने के तीन सप्ताह के अंदर बीमा राशि मिल जानी चाहिए, वरना बीमा कंपनियों को उस समय से हुई देरी पर क्लेम राशि पर 12% की दर से ब्याज देना पड़ेगा। लेकिन उसका ना तो कोई जिक्र होता है और ना ही ब्याज दिलाने में सरकार की ओर से कोई दबाव ही डाला जाता है।”

किसानों का कहना है कि उन्हें ब्याज समेत फसल बीमा क्लेम कभी नहीं मिला है। ऐसे में यह स्कीम अपनी ही कमज़ोरियों के कारण लोगों से दूर होती जा रही है। किसानों को छोड़ दिया जाए तो बीते तीन साल में फसल बीमा कंपनियों की बचत 11,490 करोड़ रुपये रही है। इस पर कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का कहना है कि ‘प्रीमियम और क्लेम भुगतान में जो अंतर है, वह कंपनियों का लाभ नहीं है। कंपनियां इससे दोबारा बीमा करती हैं और प्रशासनिक खर्च भी उठाती हैं।’

किसानों की जगह कंपनियों को फायदा होते देखकर गुजरात जैसी राज्य सरकारों ने फसल बीमा की जगह पर किसान सहायता योजनाएं शुरू की हैं। लेकिन इन योजनाओं की शर्तें, भुगतान की स्थिति और कोविड के चलते राज्यों की खस्ता माली हालत को देखते हुए इससे किसानों को कोई खास राहत मिलने की उम्मीद कम ही नजर आ रही है। लेकिन इसे किसानों के लिए त्रासदी ही कहेंगे कि उन्हें कोविड के दौरान जलवायु परिवर्तन के चलते कहीं पर सूखा, कहीं पर बाढ़ तो कहीं पर चक्रवात, ओलवृष्टि की मार झेलनी पड़ी है। टिड्डी-कीट-पतंगों और बीमारियों का प्रकोप भी कम नहीं रहा है। जाहिर है कि इस मुश्किल वक़्त में जब किसानों को फसल बीमा के सुरक्षा कवच की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब इस सुरक्षा कवच में बड़े-बड़े सुराख हो गए हैं।

इन चुनौतियों के बीच फसल बीमा योजना को दोबारा सशक्त बनाने के बारे में सुझाव मांगने पर पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन कहते हैं कि ‘राज्य और केंद्र सरकार को लगातार इस स्कीम का मूल्यांकन करते रहना होगा, ताकि इसकी ताक़त और कमज़ोरियों को अलग-अलग मॉडल्स के साथ ठीक तरह से आंका जा सके। नीति आयोग इस योजना के सतत मूल्यांकन में अहम भूमिका निभा सकता है ताकि यह योजना किसानों के लिए सबसे अच्छा विकल्प साबित हो और उन्हें रिस्क कवर दे पाए।’

(लेखक हिंद किसान की एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हैं)

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