कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से किसे फायदा?

पंजाब: 5 नवंबर तक रेल रोको आंदोलन में ढील लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन की तैयारी

केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब विधान सभा से कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार के विधेयक पारित होने के बाद बुधवार...

कृषि कानून के खिलाफ पंजाब की राह पर राजस्थान

केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ लड़ाई में पंजाब की अमरिंदर सरकार ने नई शुरुआत की है। मंगलवार को पंजाब विधान सभा...

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केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ पारित विधेयकों पर क्या कहते हैं किसान नेता

पंजाब की विधानसभा ने मंगलवार को केंद्र के कृषि कानूनों को राज्य में प्रभावहीन करने वाले तीन कृषि विधेयक को सर्वसम्मति से...

केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ अमरिंदर सरकार के विधेयक पारित

केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब विधानसभा में 4 विधेयक पारित हो गए हैं। विधेयक पेश करते हुए सीएम अमरिंदर सिंह...

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग यानी ठेका खेती, मोदी सरकार ने हाल ही में मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौते-2020 यानी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को क़ानूनी जामा पहना दिया है, ऐसे में ये समझना ज़रूरी है की छोटी जोत वाले किसानों को इससे कितना और क्या फ़ायदा होगा।

देश में 86% छोटे और सीमांत किसान हैं जिनके पास 2 हेक्टेयर से भी कम खेतिहर ज़मीन है। कितने ही किसान तो बंटाई पर काम करते है, उनके पास ख़ुद की ज़मीन तक नहीं और कितने ही किसान खेतिहर मज़दूर हैं। कॉंट्रैक्ट खेती का जो मसौदा सरकार ने पेश किया है उसमें बीज, खाद, कीटनाशक, दवाई से लेकर फ़सल की बुवाई, बुवाई से पहले खेत तैयार करने की तकनीक, शोध से लेकर फ़सल उगाने तक का सफ़र और उसमें शामिल तमाम ख़र्च उस कम्पनी का होगा जिसके साथ किसान ने क़रार किया है, साथ ही फ़सल की बुवाई से पहले ही भाव तय हो जाएगा  और फ़सल तैयार होने पर किसान उसे तय भाव पर कम्पनी को  बेच कर अपना भुगतान ले लेगा, क़ानून में ये साफ़ है कि कॉंट्रैक्ट खेती में कम्पनी किसान की ज़मीन का मालिकाना हक़ नहीं ले सकेंगी।

सरकार का कहना है कि इस क़दम से छोटे किसान लाभान्वित होंगे और उनकी आय दोगुनी हो सकेगी, साथ ही बाज़ार ना मिलने का जोखिम और फ़सल के सही भाव की सरदर्दी से भी उन्हें छुटकारा मिल जाएगा लेकिन बात इतनी ही सहज होती तो बात ही क्या थी, क्या कारण है कि किसान कॉंट्रैक्ट खेती की गाइडलाइंस से आश्वस्त नहीं हैं और उन्हें गड़बड़ी का अंदेशा है। उन्हें भय है कि ठेका खेती से किसान अपने ही खेत पर मज़दूर बन जाएंगे, उनकी खान पान के तौर तरीक़ों और फ़सल विविधता की आज़ादी छिन जाएगी,  आगे चलकर उन्हें ज़मीन से बेदख़ल भी किया जा सकता है।

भारत में ठेका खेती कोई नई बात नहीं है, ये सालों से होती आयी है, 1940 में तम्बाकू की खेती, फिर चीनी मिलों के लिए गन्ने की खेती, पोल्ट्री उद्योग, बीज उद्योग ये सब कॉंट्रैक्ट फ़ार्मिंग के तहत ही पला- बढ़ा है और आज भी चल रहा है हालांकि इसे लेकर किसानों और कम्पनी दोनों के अनुभव खट्टे मीठे रहे हैं। गुजरात , पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक जैसे राज्यों में किसान गन्ना, आलू, टमाटर, सेब, केला, काले गेहूँ , चावल  और नक़दी फ़सलों की कॉंट्रैक्ट खेती करते आए हैं और कई बड़े किसानों ने इसके बलबूते लाखों की कमाई की है और अपनी फ़सलें निर्यात भी की हैं लेकिन अब जब सरकार ने बक़ायदा इसे क़ानून बना दिया तो एक तरफ़ जहाँ कोरपोरेट्स और एफपीओ यानी फ़ार्मर्ज़ प्रड्यूसर्ज़ ऑर्गनाइजेशन को बिना किसी उलझन के खेती में बड़े पैमाने पर क़िस्मत आज़माने का मौक़ा मिल गया है तो वहीं किसान और खेती से जुड़े लोग अतीत के अनुभव और उस के आधार पर इस क़ानून से जुड़ी शर्तों, नफ़े- नुक़सान को सिरे से तोल रहे हैं।

देश के सीमांत किसान अपने अनुभव से खेती किसानी में हिट एंड ट्रायल तरीक़े से अपने परिवार का पालन पोषण करते आए हैं, बरसों से उनका यही मॉडल रहा है कि अपने खान-पान के मुताबिक़ फ़सल उगाओ, सरप्लस को बाज़ार में बेचो और आजीविका का निर्वाह करो। खेती एक ऐसा व्यवसाय है जहाँ छोटे किसानों की स्थिति पहले ही कमज़ोर होती है, खेती में जोखिम लेने की क्षमता, पढ़ाई-लिखाई का स्तर ऐसा नहीं होता की वह ठेका खेती की शर्तों और पेचीदगियों को ठीक से समझ पाएं, ऊपर से खेती की अपनी मजबूरियाँ, फ़सल चक्र पर आधारित आमदनी, मिट्टी, जलवायु , मौसम से जुड़े जोखिम इतने ज़्यादा होते हैं कि किसान कभी भी चैन से नहीं बैठ पाता। ऐसे में ये बड़ी दुविधा है कि अगर किसान कम्पनी से फ़सल का क़रार कर ले और फ़सल तय शर्त के मुताबिक़ ना उग पाए तो कौन ज़िम्मेदारी लेगा, सबसे बड़ा विवाद इस शर्त से ही उपज रहा है कि अब कम्पनी और किसान के बीच विवाद पैदा होने पर किसान कोर्ट का दरवाज़ा नहीं खटखटा सकता। सरकार कहती है कि विवाद की स्थिति में सबसे नज़दीकी मजिस्ट्रेट के पास शिकायत की जा सकेगी और एक सुलह बोर्ड घटित कर दिया जाएगा जहाँ 30 दिन के अंदर मामले का निपटारा करना होगा, शिकायत निवारण के लिए पहले एसडीएम के स्तर पर और मामला ना सुलझने की हालत में जिलाधिकारी के स्तर तक सुनवाई हो सकेगी लेकिन किसानों का कहना है कि सरकारी अफ़सर, किसान और कम्पनी के बीच उठे विवाद में अधिकारी किसकी तरफ़दारी लेगा या किसके दबाव में होगा इससे लोग अनजान नहीं हैं।

कॉंट्रैक्ट में साफ़ लिखा है कि कम्पनी किसान से उसकी फ़सल का एक साल के लिए कॉंट्रैक्ट कर सकती है, अगर कॉंट्रैक्ट किसी कारण बीच में तोड़ना पड़ जाए और यदि ग़लती किसान की तय हो तो किसान को कम्पनी की तरफ़ से मिले खाद, बीज और तमाम लागत का पैसा भरना होगा जो वो अगले फ़सल चक्र तक दे सकता है, इसमें उसकी ज़मीन पर कार्रवाई नहीं होगी लेकिन अगर दोषी कम्पनी पायी गयी तो जितना कॉंट्रैक्ट में तय है उसे पूरी लागत के बराबर रक़म और किसान को 150% रक़म बतौर पेनाल्टी देना होगा, सरकार इस प्रावधान को किसान हितैषी बता रही है लेकिन समस्या यह है कि दोषी किसान है या कम्पनी, इसका फ़ैसला कौन करेगा?

काग़ज़ पर तो ये बहुत सहज दिखता है लेकिन व्यावहारिक तौर पर किसान के पक्ष का कम्पनी पर ये आरोप लगाना और उसे दोषी क़रार देना बहुत टेढ़ा काम होगा। किसानों का आरोप है कि कम्पनियों के माइंड गेम्ज, बॉडी लैंग्विज ( चालबाज़ी ) और रक़म देकर मामले को अपने पक्ष में करने की फ़ितरत से हर कोई वाक़िफ़ है , एक तरफ़ होगा गरीब छोटा किसान जो लड़ाई लड़ने के लिए पैसे नहीं जुटा सकता, ना ही वो इतना पढ़ा -लिखा होगा जो दूसरी तरफ़ खड़ी कम्पनी या उस की तरफ़ से आए पढ़े लिखे वकीलों और अधिकारियों की फ़ौज के सामने टिक सके, जिरह कर सके और जीत जाए, किसान की नेगोशीएटिंग पावर और हौसला पहले ही पस्त होता है, 2019 में पेप्सिको कम्पनी ने गुजरात के आलू किसानों पर 1-1 करोड़ का मुकदमा ठोक दिया था, आपत्ति दर्ज की थी कि ये किसान एक ख़ास क़िस्म की आलू के बीज बो रहे हैं जिसका इस्तेमाल कम्पनी आलू के चिप्स बनाने के लिए करती है, इसलिए उस क़िस्म के बीज पर कम्पनी का स्वामित्व है। हालाँकि देश भर से किसानों के बीज के अधिकार को लेकर उठी आवाज़ के दबाव में कम्पनी को हार कर सारे केस वापस लेने पड़े लेकिन कॉंट्रैक्ट फ़ार्मिंग के इस उदाहरण ने देश भर के किसान संगठनों को आगाह ज़रूर कर दिया कि आगे से समझौतों और ठेका खेती करने से पहले सतर्क रहें।

यह बात सही है की खेती प्रधान देश में खेती को आधुनिक बनाना है, उत्पाद के निर्यात की तमाम संभावनाएँ तलाशनी है ताकि हमारा देश विश्व पटल पर एक फूड बाउल यानी अच्छे खाद्य उत्पादक के तौर पर उभर कर सामने आए लेकिन ये ज़रूरी है कि ठेका खेती में आगे बढ़ने से पहले इससे जुड़ी नीतियों में साफ़गोई हो, किसान और कम्पनी की उम्मीदों और लक्ष्य के बीच संतुलन बैठाया जाए।  खेती को उन्नत बनाने की होड़ में ध्यान देना होगा कि विकास की इस कहानी का मुख्य किरदार अन्नदाता दरकिनार ना हो। कम्पनी और किसान का रिश्ता ऐसा हो जो एक दूसरे को लाभ पहुँचाए लेकिन ये कहने भर से नहीं होगा, उनके अधिकार के संरक्षण के लिए कुछ ठोस व्यावहारिक क़दम उठाने होंगे जो फ़िलहाल इस मसौदे में ग़ायब हैं।

यही कारण है कि देश भर के किसान इन कृषि क़ानून में किए गए बदलावों में अपनी माँग जोड़ना चाह रहे हैं, वे चाहते हैं कि एमएसपी को क़ानूनी दर्जा मिलना ज़रूरी है, किसान अपने ही खेत पर मज़दूर बन कर ना रह जाए इस डर से उन्हें निजात दिलाना ज़रूरी है, उनके हितों की रक्षा के लिए क़ानूनी संरक्षण और विवाद के निष्पक्ष निपटारे की गारंटी होना ज़रूरी है।

लेकिन सरकार किसानों की इन बुनियादी माँग को लगातार ठुकरा रही है।  ठेका खेती में ऐसी भी बहुत सी फ़सल हैं जिनका एमएसपी या भाव सरकार तय नहीं करती जैसे फल, सब्ज़ी, फूल। लेकिन उनके उचित मूल्य की ही तरह कोई व्यवस्था तय करनी होगी ताकि किसान एक तय दाम के नीचे फ़सल बेचने को मजबूर ना हो, हालाँकि सरकार के मुताबिक़ उसने फ़सलों की डायनामिक प्राइसिंग रखी है लेकिन अगर भाव एपीएमसी मंडी से जुड़े हैं, तो मंडी के नए क़ानून आने के बाद एपीएमसी मंडी व्यवस्था कब तक ज़िंदा रहेगी, एमएसपी की बेंच मार्किंग की सुविधा कब तक बरक़रार रहेगी ये कहना मुश्किल है। दूसरा फ़सलों की क़ीमत बाज़ार से जुड़ी हो सकती है अगर ये ऐसा होता है तो प्राइस डिस्कवरी कैसे होगी ये भी एक बड़ा सवाल है जिनके जवाब नहीं है। अगर फ़सल क्वालिटी के अनुरूप रही तो गाइडलाइंस में दाम के ऊपर इन्सेंटिव देने की बात कही गयी है लेकिन क्वालिटी को निष्पक्ष रूप से मापने की भी व्यवस्था ज़रूरी है तभी किसान की फ़सल का सही भाव और इन्सेंटिव मुकर्रर किया जा सकेगा।

भाव के अलावा एक और बात जिसे लेकर किसान सबसे ज़्यादा आशंकित है वो है ग्रेडिंग, फ़सल का साइज़ और उसका मानक, इसे लेकर किसानों के अनुभव काफ़ी कड़वे हैं। यह सही है कि फ़सल की एक क्वालिटी तय करना ज़रूरी है जिसके आधार पर कम्पनी माल ख़रीदेंगी लेकिन क्या वनस्पति में, पेड़- पौधों , फल या अनाज में इतनी बारीक स्पेसिफिकेशन की शर्त पूरी की जा सकेगी,  वह भी बदलते जलवायु परिवर्तन के माहौल में, साल 2020 में ही मौसम में कितने उतर चढ़ाव आए, पहले सूखा, फिर बारिश, ओलवृष्टि, अम्फन तूफ़ान, कहीं बाढ़ , कहीं वायरस का हमला , येलो मोसैक, सेब पर स्क्रब रोग तो कहीं टिड्डियों का हमला, ऐसे में किसान फ़सल के मोटे पतले, छोटे, बड़े साइज़ या फिर शक्ल सूरत की गारंटी जैसी शर्त कैसे निभा पाएँगे और अगर कम्पनी इस आधार पर माल नहीं ख़रीदती है तो किसान क्या खुले बाज़ार में फ़सल बेचने को मजबूर होंगे या कम्पनी घाटा उठाएगी, कॉंट्रैक्ट में इसका कहीं ज़िक्र नहीं है।

हो सकता है कि मौसम और प्रकृति से जूझने के लिए कम्पनी कुछ ख़ास तकनीक वाले बीज, कीटनाशक या GM फ़सलें उगाने के लिए किसानों को पूँजी, ट्रेनिंग और कौशल दें तो क्या ये हमारे देश की जैव विविधता, क्षेत्र विशेष के खान- पान की आदतों से छेड़छाड़ और पोषण पर प्रहार नहीं होगा?

जिस देश में ‘अनेकता में एकता’ की बात होती है उस देश में ‘एक देश एक बाज़ार’, बाज़ार के मुताबिक़ एक ही क़िस्म की फ़सलें उगाने की स्ट्रैटेजी कितनी कारगर होगी उस पर सोच विचार कर दूरगामी फ़ैसले लेने होंगे वरना बिना ‘चेक्स एंड बैलन्सेज़’ के कोरपोरेट के हाथ में खेती जैसी बुनियादी सेक्टर को देना ग्रामीण भारत के रहन- सहन, तीज- त्योहार, खान-पान में विविधता के आयामों को तितर-बितर कर सकता है। ये विविधता, ग्रामीण इलाक़ों और आदिवासी समाज के खान- पान के तौर तरीक़ों में भी सेंध लगा सकता है। जहाँ देश की ही नहीं उनकी अपनी खाद्य सुरक्षा भी ख़तरे में पड़ सकती है।

एक और बात जिस तरह से हरित क्रांति के बाद देसी बीजों के ऊपर उत्पादकता बढ़ाने के लिए हाई यील्डिंग वैरायटी यानी अधिक उपज देने वाले बीजों का प्रसार हुआ, धीरे- धीरे जैविक, गोबर खाद की जगह कैमिकल खाद ने ले ली, आगे चल कर कीटनाशक की ज़रूरत पड़ने लगी, पानी का ज़्यादा दोहन होने लगा उससे उत्पादकता भले ही तीन गुना बढ़ गयी। लेकिन लम्बे समय में मिट्टी की उर्वरक शक्ति पर असर पड़ने लगा और उसका जीव जंतुओं की सेहत पर भी असर दिखने लगा। ख़ुद सरकार एक तरफ़ जैविक खेती और प्रकृतिक खेती की ओर लौटने की बात कर रही है तो दूसरी तरफ़ कॉंट्रैक्ट खेती में कोरपोरेट खेती के लिए कृषि के लिए दरवाज़े खोलने,  उनके खेती करने के तौर- तरीक़े किसानों के मन में विरोधाभास पैदा कर रहे हैं। कॉंट्रैक्ट खेती में कंपनियाँ मुनाफ़े के लिए काम करेंगी, साफ़ तौर पर उत्पादन बढ़ाने के तौर- तरीक़ों पर ज़ोर होगा, बाज़ार में माँग के मुताबिक़ फ़सल उगाई जाएँगी जो कि फ़सल विविधता को तिलांजलि दे सकती है। कंपनियाँ आधुनिक बीज, मशीन और एआई यानी आर्टिफ़िशल इंटेलिजेन्स के इस्तेमाल की हिमायती होंगी जो कि देसी बीज, देसी कीटनाशक, काम करने वाले किसान मज़दूरों के रोज़गार पर, उनकी फ़सल विविधता,केवल बाज़ार के लिए ही नहीं उनके अपने खान पान के तौर तरीक़ों पर प्रहार कर सकती है, ऐसे में किसान और कम्पनी के खेती को लेकर विचारों में संतुलन कैसे बैठाया जाए ये सबसे बड़ी चुनौती है। 

जो किसान खेती के पारंपरिक और प्राकृतिक तरीक़ों से खेती कर रहे हैं, वो बताते हैं की प्राकृतिक खेती में जहाँ झाड़, बेल, पत्तों का महत्व होता है। किसान बहुफसली खेती कर साल में 3-4 फ़सलें लेते हैं वही कॉंट्रैक्ट खेती में कम्पनी का ज़ोर होगा नक़दी फ़सलों पर, उस खेती में झाड़ और खरपतवार की कोई जगह नहीं होती, साग, झाड़ियों का सफ़ाया करने के लिए ग्लाइफोसेट जैसे कैमिकल धड़ल्ले से इस्तेमाल किए जाते हैं।

मिसाल के तौर पर चौलाई, ये  प्राकृतिक तौर पर खेत के आस- पास साग के तौर पर बिखरी रहती है और किसान परिवार इसे खा कर पेट भी भरते हैं और पोषण भी भरपूर मिलता है, लेकिन कॉंट्रैक्ट पर खेत देने से शायद किसानों को अपने खेत में चौलाई नसीब ही ना हो, ऐसे में बाज़ार में मिलने वाली चौलाई का साग शायद शहरी उपभोक्ताओं को भी मुश्किल से उपलब्ध होगा या अगर मिलेगा भी तो उसका दोगुना दाम चुकाना पड़ सकता है, ऐसे में उपभोक्ताओं को भी अपनी थाली में होने वाले बदलावों को लेकर चौकन्ना रहना होगा।

भारत में वह खेत क्या जहाँ अन्नदाता के कीचड़ में सने हाथ और पाँव ना दिखें लेकिन खेती में जिस तरह कोरपोरेट्स आधुनिक टेक्नॉलजी का इस्तेमाल कर रहे हैं मिसाल के तौर पर एआई यानी आर्टिफ़िशल इंटेलिजेन्स, ऐसे में वो दिन भी दूर नहीं होगा जब दूर- दूर तक फैले हरे- भरे खेतों में सिर्फ़ इक्का दुक्का खेतिहर मज़दूर दिखें और सारा काम ड्रोंज़ और बड़ी- बड़ी मशीनों से हो रहा होगा।

बेशक खेती उन्नत और विकसित होगी लेकिन इस विकास की कहानी में अन्नदाता का विकास होगा या नहीं, वो कहानी का मुख्य पात्र ही रहेगा या नहीं ये ध्यान देने वाली बात है।

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