मंडियां नहीं बचेंगी तो क्या होगा?

राज्यों ने एग्रीकल्चर मार्केटिंग प्रोड्यूस कमेटी यानी एपीएमसी एक्ट के तहत मंडियों को बनाया जिनसे किसानों को बड़ी सहूलियतें मिली हैं।

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राज्यों ने एग्रीकल्चर मार्केटिंग प्रोड्यूस कमेटी यानी एपीएमसी एक्ट के तहत मंडियों को बनाया जिनसे किसानों को बड़ी सहूलियतें मिली हैं। मंडियों में विक्रेता और खरीददार के साथ- साथ रेगुलेटर यानी देखरेख करने वाले भी मौजूद रहते हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो किसानों के लिए आवश्यक सुविधाएं मंडियों में मौजूद होती हैं। केंद्र सरकार के नए कानूनों से इन्हीं मंडियों पर संकट खड़ा हो गया है। जिन राज्यों में मंडी कानून नहीं है वहां किसानो को लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा है। किसान मंडी के भीतर अपनी फसल बेचना चाहते हैं क्योंकि यहां सही कीमत मिलने की उम्मीद और भुगतान की गारंटी होती है। लेकिन नए कानून इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं। मंडियों की मौजूदा स्थिति, सुविधाओं और सुधारों पर बहस हो सकती है लेकिन नए कानून से मंडियों के अस्तित्व पर दिख रहा खतरा अगर सही साबित होता है तो खेती- किसानी के संकट को और बढ़ा सकता है। सवाल ये है कि अगर मंडियां नहीं बचेंगी तो क्या होगा?

किसानों को कोरोना की मार से बचाने, अनाज और सब्ज़ी आसानी से बाज़ार तक पहुंच सके, इसके लिए मंडी व्यवस्था में कई अस्थायी बदलाव किए गए। किसानों को सीधे ग्राहकों को फसलें बेचने की छूट दी गईं। लेकिन 5 जून को लॉकडाउन के बीच केंद्र सरकार राज्यों के कृषि उपज मंडी समिति अधिनियम (एपीएमसी एक्ट) के समानांतर ‘किसान उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अध्यादेश-2020 ले आई। यह अध्यादेश विधेयक के रूप में संसद से पारित होकर 27 सितंबर, 2020 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हस्ताक्षर के साथ कानून बन गया। यह क़ानून एमपीएमसी एक्ट के तहत चलने वाली मंडियों को उनके परिसर तक सीमित करता है और इसके बाहर होने वाली कृषि उपज की खरीद-फरोख्त या मंडी को टैक्स फ्री बनाता है। इससे एपीएमसी मंडियों में बड़े बदलाव आने तय हैं।

एक तरफ़ केंद्र सरकार इन क़ानून को ऐतिहासिक क़रार दे रही है और किसानों के हित में लिया गया निर्णायक फ़ैसला बता रही है, वहीं अधिकतर किसान इन कानूनों में शामिल कुछ पहलुओं से ख़ुश नहीं हैं और इसके ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे हैं। खेती से जुड़े ये कानूनी बदलाव इतनी तेज़ी से हुए कि देश के दूरदराज़ ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले किसान, खेतिहर मज़दूर और आदिवासी किसान इनसे आज तक बेख़बर हैं। इस सबके बीच यह समझना ज़रूरी है कि आख़िर एपीएमसी मंडियों की भूमिका क्या है, उन्हें किस मक़सद से बनाया गया है? मंडी तीन अहम काम करती हैं – किसानों को एक ऐसी जगह मुहैया कराना, जहां पर वे अपनी फसलों को क्वालिटी के हिसाब से सही भाव पर बेच सकें, उसकी सही तौल हो सके और उनके पैसों का समय पर भुगतान हो सके।

इसके लिए देश भर में अभी 7000 मंडियां है। 2018 के बजट में सरकार ने सीमांत किसानों का ख़याल करते हुए 23,000 ग्रामीण हाट बनाने का भी एलान किया था। जहां कुछ राज्यों में एपीएमसी मंडियों की व्यवस्था पूरी मजबूती से खड़ी है, वहीं कई राज्य ऐसे हैं जहां ये इतने सालों बाद ठीक से विकसित नहीं हो पायी हैं. वहीं, बिहार, झारखंड और केरल ऐसे राज्य हैं, जहां एमपीएमसी मंडियों की व्यवस्था ही नहीं है। किसानों को ग्रामीण हाट और ई-नाम से जोड़ने का काम भी मंद गति से चल रहा था, वहीं अब नए क़ानून में सरकारी नीतियों की अलग प्राथमिकता नज़र आ रही है।

कृषि राज्यों का विषय है, इस लिहाज़ से एमपीएमसी मंडियां राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। ऐतिहासिक तौर पर देखें तो पंजाब देश का पहला राज्य है, जहां सबसे पहले मार्केट कमेटी का गठन किया गया। यह व्यवस्था स्वतंत्रता से भी पहले तब क़ायम हुई थीं, जब 1939 में पंजाब प्रांत के राजस्व विभाग के मंत्री सर छोटूराम ने मंडियों में किसानों को फ़सल का सही भाव दिलाने और उन्हें व्यापारियों व आढ़तियों के अनुचित व्यापारिक तौर-तरीक़ों और शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए पंजाब एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट एक्ट पास करवाया था। इसके दो तिहाई सदस्य किसान होते थे।

सन 1947 में आज़ादी मिलने के बाद इस दिशा में तेज़ी से काम हुआ, क्योंकि कृषि प्रधान देश में किसानों के अधिकारों का संरक्षण ज़रूरी था, साथ ही देश की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना भी ज़रूरी था। ऐसे में 1970 में सरकार ने एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट रेग्युलेशन एक्ट पास कराया, जिसके तहत कृषि विपणन समितियां बनी, जिसे शॉर्ट में एपीएमआर कहा जाने लगा। समय के साथ दूसरे राज्यों में भी एपीएमआर एक्ट के तहत मार्केट यार्ड्स विकसित हुए, जहाँ खुदरा भाव पर फ़सल की ख़रीद फ़रोख़्त होने लगी। इस तरह अलग-अलग राज्यों ने भी फ़सल और कृषि उत्पादों के बाज़ार रूप में मार्केटिंग के लिए संगठित तरीक़ा अपनाया और इस तरह मौजूदा एपीएमसी – एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी की शुरुआत हुई। इसके तहत फ़सलों की मार्केटिंग के लिए कुछ नियम तय किये गए। इन नियमों के आधार पर किसान अपनी फसल को लाइसेंसी व्यापारियों और रजिस्टर्ड आढ़तियों के ज़रिए बड़े व्यापारियों को बेचते हैं।

अब फ़सल किस भाव पर बिके कि किसान की लागत भी निकल जाए और उसे अपना मेहनताना भी मिल जाए? इसके लिए फ़सल की सरकारी ख़रीद का एक फार्मूला तय है, जिसे केंद्र सरकार के कृषि विभाग के अंतर्गत आने वाला एक आयोग – कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइसेज़ यानी सीएसीपी तय करता है। केंद्र सरकार सीएसीपी द्वारा सुझाए गए भाव को हर फ़सल चक्र यानी खरीफ और रबी की बुवाई से पहले फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का ऐलान करती है, ताकि किसान बाज़ार में मिलने वाले भाव के हिसाब से फसलों की बुवाई कर सकें। इसके अलावा एमएसपी मंडी में बिकने के लिए आने वाली फ़सलों के लिए एक स्केल या बेंचमार्क की तरह भी काम करता है। इससे किसानों को अंदाज़ा मिल जाता है कि उन्हें अपनी फ़सल किस भाव पर बेचनी है। मंडियों में लाइसेन्सधारी व्यापारी और रजिस्टर्ड आढ़ती फ़सलों की बोली लगाते है और सौदा तय करते हैं। नीलामी में किसान की उपज का भाव तय होने के बाद उसकी सफाई, तुलाई, भराई और ढुलाई जैसे कामों के लिए चार्ज या अपना कमीशन लेते है, तब जाकर फ़सल बड़े कारोबारी तक और फिर वहां से बाज़ार में पहुंचती है।

सरकार भी खाद्य सुरक्षा कानून के तहत सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए अपनी एजेंसियों के जरिए गेहूं, चावल, चना और दाल जैसी फसलों को इसी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीदती है।

सभी राज्य के मंडी बोर्ड के अपने क़ानून और नियमावली होती हैं. लेकिन सभी मंडी बोर्ड का दायित्व होता है कि मंडी में किसानों की फ़सल तय भाव के नीचे ना बिके, किसान और व्यापारी के बीच सौदा ठीक से हो, सही तौल हो और भुगतान भी सही समय पर हो। ऐसे में अगर कोई व्यापारी किसान को भुगतान किए बगैर ग़ायब हो जाए तो मंडी प्रशासन की ज़िम्मेदारी होती है कि कैसे भी करके उस रक़म को वसूला जाए और किसान को तय अवधि में भुगतान किया जाए। मंडी बोर्ड का अध्यक्ष ख़ुद एक किसान होता है, जिसका चुनाव होता है जो मंडी में किसानों के पक्ष को मज़बूती से रखता है।

मंडियों के संचालन के लिए मंडी शुल्क लेने का भी प्रावधान है। इस सुविधा शुल्क का व्यापारी भुगतान करते हैं। इस शुल्क से मंडी परिसर में किसानों, हम्मालों, तौल करने वालों, मजदूरों और व्यापारियों के लिए पानी, शेड, विश्राम घर, फ़सलों के रखरखाव के लिए गोदाम और दूसरी बुनियादी सुविधाएं जुटाई जाती है। मंडी शुल्क से जुटने वाली राशि से खेत से मंडी तक सड़क बनाकर ट्रान्सपोर्ट की सुविधा को भी दुरुस्त करने का काम होता है। साथ ही मंडी में फ़सल की तौल और क्वालिटी जांचने की आधुनिक मशीन और लैब जुटाने का भी काम होता है।

इस तरह सरकार के रोडमैप में मंडियों का किसान हितैषी होने का मक़सद साफ़ था। लेकिन समय के साथ मंडी की इस व्यवस्था में भ्रष्टाचार ने सेंध मारी। व्यापारी और मंडी कर्मचारियों की सांठगांठ के चलते मंडियों में कामकाज में विसंगतियां घर कर गईं। केंद्र सरकार का कहना है कि एपीएमसी मंडियों में आढ़ती और बिचौलिये किसानों का शोषण करते हैं। कुछ हद तक किसान भी इस बात को मानते हैं। मिसाल के तौर पर सरकार 23 फ़सलों के लिए एमएसपी का एलान तो करती है, लेकिन सभी फ़सलें एमएसपी पर नहीं बिकती हैं। कुछ की बोली तो एमएसपी से नीचे शुरू होकर नीचे ही ख़त्म हो जाती है।

हालांकि, ख़ामियों की ये तस्वीर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग ढंग से उभरकर सामने आयी है। बिहार जैसे राज्य में 2006 में एपीएमसी एक्ट को बंद कर दिया गया। ऐसा करते वक्त दावा किया गया था कि नया निवेश आएगा और कृषि व्यापार के नए मॉडल उभरेंगे। लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। एपीएमसी ना होने के कारण बिहार के किसानों को दूसरे राज्यों की तुलना में कृषि उपज का बहुत कम मूल्य मिल पाता है। वहां के अधिकतर किसान दूसरे राज्यों में अपनी फसलें बेचने को मजबूर होते हैं या खेती को छोड़कर मज़दूरी के लिए दूसरे शहरों में पलायन कर गए हैं।

हालांकि, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के कृषि विधेयकों पर मुहर लगाने के बाद सबसे ज़्यादा विवाद कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून पर हो रहा है। इसे कई विशेषज्ञ एपीएमसी एक्टट को बायपास करने वाला अधिनियम भी बता रहे हैं। दरअसल, केंद्र सरकार ने एपीएमसी एक्ट को बरक़रार रखते हुए उसके बाहर निजी मंडियों या कृषि उपजों की खरीद फरोख्त को हरी झंडी दे दी है। अब कोई भी पैनकार्ड धारक, चाहे वह व्यक्ति हो या कम्पनी हो या कोई फ़र्म, किसान उत्पादक समूह (एफपीओ) या संग्राहक (एग्रीग्रेटर), किसान से उनकी फ़सलों को खेत से, घर से यानी अब मंडी में लाये बिना ही ख़रीद सकता है।

इस लिहाज़ से जो काम अभी तक ग़ैरक़ानूनी था, अब उसे सरकार ने क़ानूनी बना दिया है। सरकार के मुताबिक़, इससे ‘एक देश एक मंडी’ व्यवस्था बनी है और किसानों को अब तक की सबसे बड़ी आज़ादी मिल गयी है, क्योंकि अब वे कहीं भी कभी भी किसी को भी मनचाहे तरीक़े से अपनी फ़सलें बेच सकते हैं और अच्छा भाव पा सकते हैं। जबकि इसके उलट अधिकतर किसान ‘एक देश एक MSP’ की मांग कर रहे हैं।

इसमें दिक़्क़त की बात यह है कि जहां मंडी में फ़सल की ख़रीद-फ़रोख़्त के लिए व्यापारियों को मंडी शुल्क और ग्रामीण विकास के नाम पर फ़ीस चुकानी पड़ती है, वहीं नए कानून के तहत इन मंडियों के बाहर फसलों की खरीद-फरोख्त करने वालों को ऐसा कोई शुल्क नहीं चुकाना पड़ेगा। यानी मंडी परिसर के बाहर टैक्स फ्री मंडी की व्यवस्था बनेगी। इसका असर एमपीएमसी मंडी की आमदनी और यहां काम करने वाले आढ़तियों पर पड़ेगा। उन्हें बाहर की टैक्स फ्री मंडियों से मुकाबले में घाटा झेलना पड़ेगा। इस कानून के चलते उत्तर प्रदेश में जून और जुलाई के महीने में मंडी शुल्क से आने वाला राजस्व 36 फीसदी घट गया, क्योंकि व्यापारियों और किसानों दोनों ने ही मंडी आना बंद कर दिया है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह समस्या गहराएगी।

लेकिन इसके भी कई जोखिम हैं। जब मंडी परिसर में कोई सौदा होता है तो वहां पर एमएसपी एक बेंचमार्क की तरह काम करता है। लेकिन मंडी के बाहर की खरीद-फरोख्त में एमएसपी जैसा कोई मानक नहीं होगा। सिर्फ किसान और व्यापारी के बीच की बात होगी, इसमें सौदा कितना खरा होगा, इसका आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

किसी भी कम्पनी का लक्ष्य साफ़ होता है, बिज़नेस करना और मुनाफा कमाना। नए क़ानून में उन पर कोई सरकारी नियंत्रण भी नहीं होगा। ऐसे में किसानों को यह समझ नहीं आ रहा कि उन्हें वाजिब दाम कैसे मिलेंगे, अच्छे भले विकसित मंडियों के तंत्र से छेड़छाड़ क्यों की गयी? मुक़ाबला तो बराबरी का होता है, समांतर व्यवस्था के अभाव में कैसी प्रतिस्पर्धा? मंडी के बाहर कितनी फ़सल, किसे बेची गई, इसका लेखा-जोखा कौन रखेगा? रक़म की अदायगी हो रही है या नहीं, इस पर किसकी नज़र रहेगी? अगर एपीएमसी मंडियां धीरे-धीरे कमज़ोर होती चली गईं और निजी मंडियों में व्यापार आबाद होने लगा तो हो सकता है कि आगे चलकर निजी कम्पनी फ़सलों के भाव गिरा दें और फिर किसानों को मनमाने दाम पर फसलें बेचने के मजबूर करने लगें।

मंडी शुल्क से जुड़ी ग़ैर-बराबरी के सवाल पर कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का कहना है कि बराबरी की कमी तो है लेकिन यह जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है, वे ही अपने बजट में से मंडी के विकास और मंडी कर्मचारियों के वेतन का प्रावधान करें। लेकिन इस सलाह के बीच सवाल टाइमिंग का है। जब कोविड-19 के चलते राज्यों की माली हालत खराब है, केंद्र सरकार से जीएसटी का भुगतान होने में देरी हो रही है, तब राज्य सरकारें मंडियों के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ कैसे उठा पाएंगी? सवाल तो यह भी उठ रहा है कि आखिर केंद्र सरकार ने संघीय ढांचे में राज्यों की स्थिति कमजोर करने के लिए कोरोना महामारी का वक़्त ही क्यों क्यों चुना?

देश भर के किसान 5 जून को नोटिफ़ायड किए गए तीनों कृषि अध्यादेशों का लगातार विरोध कर रहे थे। किसान कई बार सड़क पर उतरे, हड़ताल की, ट्रैक्टर-ट्राली आंदोलन किया, अध्यादेश की प्रतियाँ जलाई , 25 सितंबर को ‘भारत बंद’ भी किया। इससे पहले 10 सितंबर को कुरुक्षेत्र की पिपली मंडी में किसानों ने “मंडी बचाओ-किसान बचाओ” आंदोलन किया। यहां तक कि भाजपा की किसान विंग ने भी इन अध्यादेशों की मौजूदा सूरत से नाख़ुशी जताई। पंजाब में भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी शिरोमणि अकाली दल ने भी कृषि विधेयकों को लेकर सरकार से गठबंधन तोड़ लिया। विपक्ष ने जमकर हंगामा किया और आवाज उठाई, बावजूद इसके ये तीनों अध्यादेश संसद में पारित हो गए और 27 सितंबर को राष्ट्रपति की मुहर के साथ क़ानून बना दिये गये।

इन कानूनों के प्रावधानों और उसके असर को लेकर देश भर के किसान सबसे ज्यादा एमएसपी की गारंटी को लेकर आशंकित है, जो कि मंडी के अस्तित्व से जुड़ी है। सरकार का कहना है कि इन क़ानूनों का एमएसपी से कोई वास्ता नहीं है और एमएसपी किसी क़ानून का विषय नहीं है। अगर सरकार इन क़ानूनों को किसान हितैषी बता रही है तो विकास की कहानी लिखने से पहले उनकी राय क्यों नहीं ली?

मंडी ना रहने से देश के सीमांत किसानों पर क्या गुज़रेगी, जो अपना उत्पाद बेचने के लिए इन पर विश्वास करते हैं और आश्रित हैं। अगर मंडी के सिस्टम को दुरुस्त करने की नीयत होती तो वह भी हो जाता। जब सरकार नोटबंदी जैसा कड़ा फ़ैसला सख़्ती से लागू कर सकती है तो एपीएमसी मंडियों में व्याप्त भ्रष्टाचार और विसंगतियों को क्यों कड़ाई से दूर नहीं कर सकती है? लेकिन हाथ में अगर फोड़ा हो जाए तो पूरा हाथ तो नहीं काटा जाता।

खेती-किसानी में एपीएमसी मंडी की ख़ास भूमिका है और किसानों के विकास के लिए रची जा रही इस नई इबारत में मंडी को कमज़ोर करना सही नहीं है। सरकार लाख कहे कि एपीएमसी मंडियां चालू रहेंगी, लेकिन इन कानूनों से जो रोडमैप बनता नज़र आ रहा है, उसमें इनका अस्तित्व ख़तरे में है। हालांकि, अपनी मंडियों और इससे जुड़े अपने अस्तित्व को लेकर फिलहाल किसान एकजुट हो रहे हैं, आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर रहे हैं, इससे सरकार पर क्या असर पड़ेगा, क्या वह इन कानूनों में बदलाव करेगी या एमएसपी की गारंटी देने वाला नया कानून लाएगी या फिर किसानों के आंदोलन का उस पर कोई असर ही नहीं पड़ेगा, इस बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

(लेखक हिंद किसान की एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हैं)

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