किसान आंदोलन को लेकर एसबीआई की टिप्पणी अनर्गल : किसान संगठन

किसान नेताओं ने एसबीआई रिसर्च के इस दावे को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर और सरकार के दबाव में की गई टिप्पणी बताया है।

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केंद्र के कानूनों के खिलाफ पूरे देश में जारी किसान आंदोलनों को राजनीति से प्रेरित बनाने वाली एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट को लेकर किसान संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया आई है। भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) के प्रधान बलवीर सिंह राजेवाल ने हिंद किसान से फोन पर बातचीत में कहा कि यह किसानों के आंदोलन को गुमराह करने की कोशिश के तहत किया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा, ‘एसबीआई (रिसर्च) अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम कर रहा है, उसे राजनीतिक बयानबाजी करने का अधिकार नहीं है.’ बलबीर सिंह राजेवाल ने यह भी कहा, ‘क्या एसबीआई जैसी संस्थाओं को लेकर भी किसानों को सोचना होगा? किसान आंदोलन पर टिप्पणी करने से पहले एसबीआई यह बताए कि उसने बैड लोन (फंसा हुआ कर्ज) या एनपीए कहकर कॉरपोरेट्स का कितना कर्ज माफ किया और किसानों का कितना कर्ज बट्टे खाते में डाला?’ उन्होंने आगे कहा कि एसबीआई (रिसर्च) को नहीं भूलना चाहिए कि खेती से देश की 80 फीसदी आबादी का रोजगार जुड़ा है, इसलिए उसे ऐसी अनर्गल टिप्पणी करने से बचना चाहिए।

दरअसल, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की रिसर्च डेस्क एसबीआई रिसर्च ने 12 अक्टूबर, 2020 को जारी रिपोर्ट में कहा है कि ‘हमारा विश्वास है कि किसानों का आंदोलन एमएसपी की वजह से नहीं, बल्कि निहित राजनीतिक स्वार्थों की वजह से है, क्योंकि कुछ राज्य सरकारें मंडी कर और शुल्क से होने वाले राजस्व के नुकसान को लेकर चिंतित हैं, जो अभी पंजाब में 8.5 फीसदी (छह फीसदी मंडी शुल्क और केंद्रीय खरीद करने के लिए 2.5 फीसदी शुल्क) से लेकर कुछ राज्यों में एक फीसदी से भी कम है। इसके साथ पंजाब पूरे साल में 3500 करोड़ रुपये राजस्व जुटाता है।’

12 अक्टूबर, 2020 को जारी एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट का अंश

दरअसल, केंद्र के नए कानून कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम-2020 के तहत कृषि उपज मंडी समिति (एमपीएमसी) की मंडियों को छोड़कर बाकी जगहों पर कृषि उत्पादों की खरीद-बिक्री को टैक्स फ्री बना दिया गया है। टैक्स में इस अंतर की वजह से एपीएमसी मंडियों का राजस्व ढांचा चरमराता दिखाई दे रहा है। किसानों को डर है कि टैक्स में इस इंतर की वजह से मंडियों का मौजूदा ढांचा खत्म हो जाएगा और सरकार इसका बहाना लेकर अनाजों की सरकारी खरीद करने से इनकार कर देगी।

इसके उलट एसबीआई रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में एमएसपी की जरूरत और किसानों की आशंका दोनों को ही खारिज किया है। ‘एमएसपी नहीं, बाजार जरूरी है’ उपशीर्षक के साथ उसने कहा है कि, ‘किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए विधेयकों को लाने की सरकार की कोशिशों के बावजूद विपक्ष की अगुवाई में किसान पूरे देश में प्रदर्शन कर रहे हैं और एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) को कानूनी बनाने और निजी क्षेत्र पर भी फसलों को एमएसपी पर खरीदने के लिए लागू करने की मांग कर रहे हैं.’

12 अक्टूबर, 2020 को जारी एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट का अंश

एसबीआई रिसर्च ने रिपोर्ट में कहा है कि सरकार हर साल 23 फसलों की एमएसपी घोषित करती है, लेकिन सभी फसलों की सरकारी खरीद नहीं करती है, क्योंकि सरकार इस काम के लिए नहीं है। एसबीआई रिसर्च ने आगे कहा है कि ‘कुछ पक्षों ने यह व्याख्या दी है कि विधेयकों के पारित होने से एमएसपी का पूरा ढांचा खत्म हो जाएगा. लेकिन यह साफ तौर पर गलत है।’

इस पर कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन की अगुवाई कर रहे भारतीय किसान यूनियन हरियाणा के प्रधान गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा कि एसबीआई रिसर्च एक तरह से सरकार की संस्था है तो यह भी किसानों के आंदोलन को दबाने का एक तरह का हथकंडा है. उन्होंने कहा, ‘किसान एसबीआई से कर्ज लेते हैं, उसे तो देश के किसानों की हालत पता है. लेकिन वह सरकार के दबाव में यह (राजनीतिक आरोप लगा) कर रही है।’ गुरनाम सिंह चढूनी ने आगे कहा, ‘ऐसा कोई कथकंडा कामयाब नहीं होगा, ये लोग नुकसान उठाएंगे।’

इस बीच केंद्र सरकार कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसान संगठनों से बातचीत करने की कोशिश कर रही है। 14 अक्टूबर को भी पंजाब के 29 किसान संगठनों को बातचीत के लिए दिल्ली बुलाया था। हालांकि, कृषि सचिव के साथ यह बातचीत बेनतीजा रही है। किसान संगठनों ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने और इसकी जगह पर फसलों की एमएसपी को कानूनी बनाने की मांग दोहराई है। उनका साफ कहना है कि सरकार अगर किसानों को कहीं भी अपनी फसल बेचने की आजादी देने के दावे कर रही है तो इन कानूनों में कहीं भी न्यूनतम समर्थन मूल्य का जिक्र क्यों नहीं किया है?

नए कानून के तहत मंडियों के बाहर खरीद-फरोख्त को कर और शुल्क मुक्त किए जाने से एपीएमसी मंडियों के भीतर कारोबार घटा है। इससे किसान ही नहीं, बल्कि आढ़ती और मंडी समिति के कर्मचारियों को भी रोजगार छिनने का डर सताने लगा है। बीते दिनों हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश में आढ़ती और कर्मचारी कई बार किसानों के साथ हड़ताल और प्रदर्शन में शामिल रह चुके हैं।

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