उत्तर प्रदेश: मंडी शुल्क में कटौती से किसानों को फायदा मिलने का दावा कितना सही

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने मंडी शुल्क में कटौती करने के फैसले के साथ किसानों को फायदा मिलने का दावा किया है। लेकिन सवाल यह है कि जो शुल्क किसान देते ही नहीं उसे घटाने से कैसे किसानों को फायदा होगा।

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देश भर में कृषि कानूनों के खिलाफ किसान लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। किसान केंद्र सरकार पर मंडियों को खत्म करने का आरोप लगा रहे हैं। इस बीच उत्तर प्रदेश की आदित्यनाथ सरकार ने मंडी शुल्क में कटौती का फैसला लिया है। राज्य सरकार का दावा है कि इस फैसले से किसानों को बेहतर सुविधा और व्यापारियों का प्रोत्साहन मिलेगा।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंडी शुल्क को 2 प्रतिशत से घटाकर 1 प्रतिशत करने का आदेश दिया है। हालांकि इसके साथ ही लगने वाले आधा फीसदी विकास शुल्क में कोई कटौती नहीं की गई है। यानी पहले मंडी शुल्क 2.5 फीसदी था जो इस फैसले के बाद 1.5 फीसदी हो गया है।

मंडियों में फसलों की खरीद-बिक्री पर यह शुल्क लगता है। इसे मंडी के विकास और सुविधाओं के लिए खर्च किया जाता है। दरअसल मंडी शुल्क व्यापारियों के द्वारा दिया जाता है और किसानों से इसका कोई सीधा संबंध नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई इस फैसले से किसानों को फायदा होगा, जिसका दावा राज्य सरकार कर रही है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि किसानों के नाम पर मंडी शुल्क घटाने का कदम असल में किसके लिए फायदेमंद है।

इस मुद्दे पर हिंद किसान के खास कार्यक्रम ‘विशेष चर्चा’ में हमने किसान नेताओं से बातचीत की। भारतीय किसान यूनियन के मीडिया कॉर्डिनेटर धर्मेंद मलिक ने कार्यक्रम में कहा, ‘इस सरकार को जो भी काम करना होता है वो किसानों और शहीद का झूठा नाम लेकर बात करती है। बीजेपी प्रतीक की राजनीति करती है।‘ उन्होंने कहा कि ‘उत्तर प्रदेश में पहले ढ़ाई प्रतिशत मंडी शुल्क था जो ज्यादा नहीं था। यह शुल्क व्यापारियों पर लगता है न कि किसानों पर। मंडी शुल्क घटाने से मंडी के कर्मचारियों को तनख्वाह तक नहीं मिल पाएगी। इस मंडी शुल्क से बच्चों को छात्रवृत्ति भी मिलती है। सरकार पर दवाब है, कृषि कानून आने के बाद मंडियों में फसल की आवक बहुत घट गई है। केंद्र सरकार ने अपने कानून थोप दिए हैं। इसका अब तक जो असर हुआ है उसे देखते हुए अगले साल तक राज्य में मंडियां खत्म हो जाएंगी। इसी वजह से मंडी शुल्क कम किया गया है।‘

विशेष चर्चा में शामिल हुए तिराई किसान संगठन के अध्यक्ष तजिंदर विक्र ने कहा, ‘यह सरकार छोटी सी बात को बड़ा बनाकर पेश करती है। किसानों पर पहले भी कहीं भी फसल बेचने पर कोई रोक नहीं थी। लेकिन इन तीनों कानूनों के बाद मंडियां खंडहर बन जाएंगी।‘

उन्होंने कहा कि ‘उत्तर प्रदेश में किसानों की धान की फसल की खरीद नहीं पा रही है। किसान अपनी फसल को खेतों में ही बर्बाद करने को मजबूर हैं। यह एक फीसदी मंडी शुल्क घटाने का फैसला किसानों के लिए कोई मदद नहीं करने वाला। सरकार धान खरीद के लिए बेहतरी करती तो किसानों को कुछ फायदा होता। इस फैसले से व्यापारियों को फायदा होगा इसीलिए हम कहते हैं कि यह सरकार किसानों की नहीं, व्यापारियों की सरकार है।‘

दरअसल केंद्र सरकार के तीन कानूनों में से एक कानून मंडी से संबंधित है। जिसमें मंडी के बाहर बिना किसी शुल्क के खरीद बिक्री की छूट दी गई है। तभी से यह सवाल उठ रहा था कि व्यापारी शुल्क से बचने के लिए मंडी के बाहर ही व्यापार करेंगे और ऐसे में एपीएमसी मंडियों का क्या होगा। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था कि एपीएमसी मंडियां राज्य सराकारों के अधीन हैं और राज्य सरकारें चाहें तो मंडी में लगने वाले शुल्क को कम कर सकती हैं। इससे पहले मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने भी मंडी शुल्क में कटौती की थी।

उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने बयान में मंडी शुल्क में कटौती को लेकर किसानों को फायदे की बात कही है। लेकिन हकीकत यही है कि मंडी शुल्क किसान नहीं देते ऐसे में उसके कम होने से किसानों को कैसे फायदा होगा। एक बात यह भी है कि मंडियों को चलाने के लिए मंडी शुल्क बहुत जरूरी होता है, यह कम होगा तो मंडियों की आमदनी कम होगी और फिर मंडियों का संचालन प्रभावित होगा।

जानकारों का कहना है कि किसानों को फायदा देने के लिए उनकी फसल का उचित दाम और फसल की खरीद की अच्छी व्यवस्था होना जरूरी है। उत्तर प्रदेश की ही बात करें तो अभी धान की खरीद में किसानों को बहुत दिक्कतें आ रही हैं। वहीं गन्ने की खरीद कीमत को बीते तीन सालों से नहीं बढ़ाया गया। इसके साथ ही अगर किसानों के लिए खेती की लागत कम करने पर भी सरकार ध्यान दे तो किसानों को कुछ फायदा मिल सकता है जैसे डीजल, बिजली, खाद किसानों को कम कीमत पर दी जाए।

लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल मंडियों का है, जिसका संचालन मंडी शुल्क से होता है। ऐसे में मंडी शुल्क को ही कम करके उसके संचालन को कैसे बेहतर बनाया जाएगा? कैसे मंडी कर्मचारियों का वेतन दिया जाएगा? क्या सरकार किसी और तरीके से इस आर्थिक कमी को पूरा करेगी? इन सभी सवालों का जवाब फिलहाल नहीं है और न सरकार दे रही है। ऐसे में मंडी शुल्क में कटौती कैसे किसानों को फायदा पहुंचाएगी, इस पर संदेह करना जायज है।

देखिए विशेष चर्चा- किसानों के नाम पर मंडी शुल्क घटाने का कदम किसके लिए

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