दुनिया को रोशनी देकर अपनी जिंदगी का अंधेरा दूर करने वाली महिलाओं की कहानी

दिवाली के मौके पर रंग बिरंगी मोमबत्तियां तैयार कर रही हैं महिलाएं.

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‘मेरे पिताजी जमीन किराए पर लेकर खेती करते हैं, खेती की हालत तो आप जानती ही हैं। आर्थिक तंगी की वजह से मैंने 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी। लेकिन अब मैं ये मोमबत्ती बनाने का काम कर रही हूं तो यहां से अपनी पढ़ाई के लिए पैसे जुटाऊंगी।’ बीस साल की सुंदरी शर्मा ने हिंद किसान से बातचीत में अपनी कहानी सुनाई। सुंदरी, उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर जिले के नैथला हसनपुर गांव में रहती है और लॉकडाउन के वक्त से सिद्धि महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ी है। इस समूह से गांव की और भी महिलाएं जुड़ी हैं। जहां इन्हें मोमबत्ती बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही है। सरकार की मदद से चलाए जा रहे इस समूह में 35 महिलाएं मोमबत्ती बनाने का काम कर रही हैं।

गांव की प्रधान कविता शर्मा ने हिंद किसान से बातचीत में कहा कि ‘ये महिलाओं के लिए एक बेहतरीन जरिया है। यहां कई महिलाएं ऐसी हैं जिनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। लेकिन अब खुद काम करके ये महिलाएं आत्मनिर्भर हो रही हैं।’

अपने घरों का काम निपटा कर ये महिलाएं गांव की प्रधान कविता के यहां इकट्ठा हो जाती है। 12 बजे से 4 बजे तक ये महिलाएं मोमबत्ती बनाती है। महिला समूह में काम करने वाली सुमन बताती हैं कि ‘समूह में पहले हमें ट्रेनिंग दी गई और अब हम मोमबत्ती बना रहे हैं। इससे हमें बहुत फायदा हो रहा है, एक तो हम अपने खाली वक्त में काम कर लेते हैं और हम आत्मनिर्भर बन गए हैं।’ उन्होंने हिंद किसान से बातचीत में कहा कि ‘हमें गांव से बाहर नहीं जाना पड़ता और घर का काम निपटा कर यहां आ जाते हैं। यहां काम करने से परिवार की आर्थिक मदद भी हो जाती हैं।’

समूह में महिलाएं सादी मोमबत्ती से लेकर फूल और अलग-अलग डिजाइन की मोमबत्ती तैयार कर रही है। समूह से जुड़ी महिला निशा ने हिंद किसान से बातचीत में कहा कि ‘हमें बहुत अच्छा लगता है, हम घर बैठे क्या करते, हमें समूह में काम करके दो पैसे भी बचते हैं। गांव में रह कर ही हमें काम मिल रहा है। महिलाएं बाहर जा कर क्या काम कर पाती हैं, अब दिवाली के वक्त पर हम भी कुछ पैसे कमा लेंगे। हम परिवार की भी मदद कर पाएंगे।’

कोरोना काल में लॉकडाउन को याद करते हुए निशा कहती है कि ‘अगर स्वयं सहायता समूह में लॉकडाउन के दौरान मास्क बनाने का काम न मिलता तो बहुत मुश्किल हो जाती। पति भी काम पर नहीं जा रहे थे, ऐसे में जो काम मिला उससे घर खर्च निकला।’

गांव की प्रधान कविता शर्मा ने हिंद किसान से बातचीत में कहा कि ‘समूह से जुड़ी ज्यादातर महिलाओं की पारिवारिक हालात बेहद खराब है। किसी के पति शराब पीकर हंगामा करते हैं तो किसी का रोजगार बेहद कम है। हमने जून में इस समूह की शुरुआत की और अब इसके जरिए इन महिलाओं को गांव में ही काम मिल रहा है।’

समूह में काम करने वाली 35 साल की सरोज के पति डेयरी में काम करते हैं। हिंद किसान से बातचीत में उन्होंने बताया कि ‘हमने पहले मास्क बनाए और अब हम मोमबत्ती बना रहे हैं। हमें इस काम से फायदा हो रहा है। हमारी जिंदगी में भी बदलाव आ रहा है।’

कविता के मुताबिक समूह में तैयार की गई मोमबत्तियों को अच्छा रिस्पोंस मिल रहा है, उन्हें मोमबत्ती बनाने के कई ऑर्डर मिल रहे हैं। समूह में तैयार इन मोमबत्तियों की कीमत अलग-अलग है। जैसे, छोटी और सादी मोमबत्ती की कीमत 150 रुपये और मीडियम मोमबत्ती की कीमत 200 रुपये प्रति किलो है। बड़े डिजाइन वाली मोमबत्तियों की कीमत 250 रुपये किलो है, जबकि फूल वाली मोमबत्ती की कीमत 300 रुपये प्रति किलो है।

महिला समूह में तैयार की जा रही मोमबत्तियां न सिर्फ दिवाली में लोगों के घरों को रोशन करेंगी बल्कि यहां काम करने वाली महिलाओं के परिवार में फैले आर्थिक अंधेरे को भी दूर करने में भी मददगार साबित होंगी।  

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