दिल्ली में भुखमरी से मौतें: कैसे ध्वस्त हुई खाद्य सुरक्षा?

पाम ऑयल मिशन को लेकर नॉर्थ-ईस्ट में उपजी आशंकाएं

“हमसे कोई सलाह-मशविरा नहीं लिया गया। नॉर्थ ईस्ट में पाम ऑयल मिशन ठीक नहीं है क्योंकि मेघालय में हम आदिवासियों का जीवन...

Palm Oil की खेती से क्या हैं नुक़सान?

National Mission on Edible oils- Oil Palm को सरकार ने 18 August 2021 को हरी झंडी दिखाई, खाने के तेल,Palm oil को...

MSP का खेल निराला, क्या है कुछ काला?

सरकार ने किसान आंदोलन के बीच रबी मार्केटिंग सीज़न 2022-23 के लिए फसलों की MSP का एलान किया है, सरकार फसलों के...

Karnal: किसानों ने सचिवालय पर डाला डेरा, सुनेगी सरकार?

मुज़फ़्फ़रनगर 5 September और फिर 7 September को हफ़्ते में दूसरी बड़ी किसान महापंचायत, किसानों ने अपनी माँग को पुरज़ोर तरीक़े से...

UP – Muzaffarnagar किसानों की हुंकार से होगा बदलाव?

5 September,2021, UP के मुज़फ़्फ़रनगर में किसानों की महापंचायत किन किन मायनो में अहम रही? ये किसानों का खुद का शक्ति परीक्षण...

पांच साल पहले देश की संसद में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून पास हुआ तो हेडलाइंस बनी थीं — देशवासियों को मिला भोजन का अधिकार। पिछले दिनों इसी संसद से महज 12-13 किलोमीटर दूर पूर्वी दिल्ली के मंडावली इलाके में तीन बच्चियों ने भुखमरी से दम तोड़ दिया। पोस्टमार्टम से पता चला कि 8 साल की मानसी, 4 साल की शिखा और 2 साल की पारुल के पेट में अन्न का दाना नहीं था। भूख को तीनों की मौत की वजह करार दिया गया। जिस दौर में केंद्र और दिल्ली की सत्ता देश के दो सबसे लोकप्रिय नेताओं के हाथ में है, वहां भुखमरी की खबर ने सुशासन के तमाम दावों की पोल खोल दी।

इस मामले पर दिल्ली रोजी रोटी अधिकार अभियान ने अपनी फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट जारी की है, जो देश की राजधानी में भुखमरी की वजहों की तलाश करती है। इस रिपोर्ट में खाद्य सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्थाओं में कई खामियां उजागर हुई हैं।

आर्थिक बदहाली

इसमें कोई दोराय नहीं कि जिन बच्चियों की भूख से मौत हुई, उनका परिवार आर्थिक रूप से बेहद बदहाल है। कुछ साल पहले बच्चियों के पिता मंगल की चाय-पराठे की ठेली थी, जिससे ठीक-ठाक गुजारा हो रहा था। लेकिन मंगल की शराबखोरी और कई दूसरी वजहों से काम-धंधा चौपट हुआ तो वह किराये पर रिक्शा चलाने लगा। कुछ दिन पहले रिक्शा चोरी होने की वजह से परिवार की माली हालत इतनी बिगड़ गई कि सिर छुपाने के लिए किसी परिचित के यहां आश्रय लेना पड़ा। आश्रय क्या, दिल्ली की बेहद बदहाल बस्ती में छोटे-छोटे 28 कमरों वाली एक इमारत है, जिनमें तकरीबन इतने ही परिवार रहते हैं। वहां सिर्फ एक कॉमन टॉयलेट है। स्वच्छ भारत अभियान वहां बस इतन ही पहुंचा है। मृतक बच्चियों का परिवार तीन दिन पहले ही मंडावली के इस पंडित चौक इलाके में रहने आया था।

सच्चाई से मुंह चुराने की कोशिश

फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट के अनुसार, तीनों बच्चियां देखने से ही बहुत कमजोर नजर आती थीं। कई दिनों से उनके कमरे में किसी ने खाना बनते नहीं देखा था। बच्चियों की मां इतनी कमजोर है कि देखकर हैरानी होती है। उनकी मानसिक स्थिति भी कुछ ठीक नहीं लगती। ऊपर से पिता की आर्थिक बदहाली और शराबखोरी की आदत। खाने-पीने की चीजों और देखभाल के लिए ये बच्चियां आसपास के लोगों पर निर्भर थीं। कुछ लोगों ने बताया कि सबसे बड़ी बच्ची मानसी घटना से एक दिन पहले यानी 23 जुलाई को स्कूल गई थी, लेकिन उसी दिन शाम को बीमार पड़ गई। कई मीडिया रिपोर्ट में एडीएम की रिपोर्ट के हवाले से बच्चियों की मौत की वजह पिता द्वारा कोई अज्ञात या गलत दवाई देने को बताया गया। हालांकि, फैक्ट फाइंडिंग टीम को इन दावों के पुख्ता करने वाली जानकारियां नहीं मिली।

हैरानी की बात है कि भूखमरी के स्पष्ट प्रमाण होने के बावजूद इस कड़वी हकीकत से मुंह चुराने के भरसक प्रयास किए। हालांकि, दो अलग-अलग अस्पतालों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भूख को इन बच्चियों की मौत की वजह बताया गया है। रोजी रोटी अधिकार अभियान की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट भी तीनों बच्चियों को पर्याप्त भोजन न मिलने और भुखमरी के हालत की ओर इशारा करती है। मौके पर पहुंचे फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्यों सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर, अंजलि भारद्वाज, अमृता जौहरी, अनिर्बान भट्टाचार्य, विदित वर्मा और अशोक कुमार ने जितने भी लोगों से बात उनमें से किसी ने भी पिता द्वारा बच्चों को किस तरह की दवाई देने का जिक्र नहीं किया है।

बहरहाल, भुखमरी से हुई ये मौतें कई सवाल छोड़ गई हैं। सबसे बड़ा सवाल ये है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून और उससे जुड़ी तमाम व्यवस्थाएं इन बच्चियों को भुखमरी से बचाने में क्यों नाकाम रहीं? अपनी फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में रोजी रोटी अधिकार अभियान ने इस बारे में कई महत्वपूर्ण बातें सामने रखी हैं।

28 में से सिर्फ एक-दो परिवारों के पास राशन कार्ड

फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट के अनुसार, आर्थिक रूप से बेहद कमजोर स्थिति में होने के बावजूद बच्चियों के परिवार के पास राशन कार्ड नहीं था। जिस मकान में बच्चियों की मौत हुई, वहां एक दो नहीं 28 परिवार रहते हैं। लेकिन इनमें से बमुश्किल एक या दो परिवारों के पास राशन कार्ड है। इलाके में मंगल की तरह रिक्शा चलाने वाले जिन 25 लोगों ने फैक्ट फाइंडिंग टीम ने बात की उनमें से सिर्फ एक रिक्शा चालक के पास राशन कार्ड था। इनमें से ज्यादातर दूरदराज से आए दिहाडी मजदूर हैं जो आईडी प्रूफ, एड्रेस प्रूफ या फिर जानकारी न होने की वजह से राशन कार्ड नहीं बनवा पाते। राशन कार्ड बनवाने में आधार की अनिवार्यता इस दिक्कत को और बढ़ा रही है।

आंगनबाडी भी नदारद

जिस कमरे में तीनों बच्चियों की मौत हुई वहां से 30 या 40 कदम की दूरी पर ही एक आंगनबाडी केंद्र है। कायदे से चार साल की शिखा और दो साल की पारुल को आंगनबाडी केंद्रों से खाने को कुछ मिलना चाहिए था, लेकिन यह परिवार कुछ ही दिन पहले वहां रहने आया था, इसलिए आंगनबाडी से संपर्क नहीं होने की वजह समझी जा सकती है। लेकिन इससे पहले कई साल से यह परिवार मंडावली की जिस रेलवे कॉलोनी में रहता था, वहां कोई आंगनबाडी केंद्र चालू हालत में नहीं मिला। लोगों का कहना है कि आंगनबाडी केंद्र सिर्फ कागजों पर चल रहा है। जहां साल भर पहले तक आंगनबाडी केंद्र था, वहां अब मवेशियों को बांधने का इंतजाम है। आसपास के अधिकांश बच्चे और परिवार आंगनबाडी जैसी किसी व्यवस्था से अंजान हैं।

किसी भी आंगनबाडी में बच्चियों का नाम दर्ज नहीं था, जिसके चलते खाद्य सुरक्षा से जुड़ी सरकारी योजना का लाभ इन मासूमों का निवाला न बन सका। देश में कुपोषण मिटाने का बड़ा जिम्मा इन आंगनबाडी केंद्रों और अक्सर पारिश्रमिक को लेकर धरने-प्रदर्शन को मजबूर आंगनबाडी कार्यकर्ताओं के कंधों पर है।

कानून हक से वंचित था परिवार

रोजी रोटी अधिकार अभियान की रिपोर्ट के मुताबिक, राशन कार्ड न होने, आंगनबाडी केंद्रों तक पहुंच न होने और खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की नाकामियों के के चलते भुखमरी का शिकार हुईं बच्चियों का परिवार भोजन संबंधी कानून हक से भी वंचित था। खाद्य सुरक्षा कानून के तहत इस परिवार को 25 किलो अनाज, बड़ी बच्ची को मिड डे मील का भोजन और छोटी बच्चियों को आंगनबाडी केंद्रों पर आहार मिलना चाहिए था। मानसिक रूप से अस्वस्था बच्चियों की मां को भी इलाज मुहैया मिलना चाहिए था।

दिल्ली में न फूड कमीशन बना, न सोशल ऑडिट

जरूरतमंदों को राशन कार्ड नहीं मिलने और आंगनबाडी केंद्रों के ठीक से काम न करने जैसे मामलों के समाधान के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में शिकायतों और इनके निवारण का प्रावधान किया गया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के निर्देशों के बावजूद दिल्ली सरकार ने फूड कमीशन और सोशल ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं लागू नहीं की हैं। खाद्य सुरक्षा को लेकर दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार का यह रवैया हैरान करने वाला है।

मिड डे मील भी छुटिटयों में बंद

भुखमरी से मौत के मुंह में गईं तीनों बच्चियों में सबसे बडी मानसी गर्मियों की छुटिटयों से पहले स्कूल जाती है। ऐसा पडोसियों ने बताया। जुलाई में वह एक दो दिन ही स्कूल गई। संभवत गर्मियों की छुटिटयों के दौरान स्कूल में दोपहर का भोजन नहीं मिलने की वजह से भी उसकी हालत बिगड़ी होगी।

अंडा, केला बस घोषणाओं में

मिड डे मील में अंडा वगैहरा अतिरिक्त पोषण मुहैरा कराए जाने की मांग उठाई जा रही है। पिछले साल के बजट में दिल्ली सरकार ने मिड डे मील के तहत केला और उबला अंडा देने का ऐलान किया था। लेकिन यह ऐलान, बस ऐलान ही रहा। आरटीआई से मिली जानकारी से पता चला कि इसके लिए सरकार ने फंड ही रिलीज नहीं किया है।

बुनियादी हक से वंचित प्रवासी मजदूर

दिल्ली जैसे महानगरों में बडी आबादी देश के कोने कोने से आए प्रवासी मजूदरों की है। फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट के मुताबिक, एक राज्य में बने राशन कार्ड दूसरे राज्यों में मान्य नहीं हैं। जिन मजदूरों के पास न रहने की जगह है, न रोजगार का ठिकाना, उन्हें राशन कार्ड बनवाने में बहुत दिक्कतें आती हैं। खाद्य सुरक्षा की मौजूदा व्यवस्था इस पहलु को पूरी तरह नजरअंदाज कर रही है।

सामुदायिक रसोईयों की कमी

कई राज्यों में गरीब और बेघरों को भोजन मुहैया कराने के लिए सामुदायिक रसोई शुरू की गई हैं। दिल्ली में बेघरों और प्रवासी गरीब मजदूरों की बडी तादाद होने के बावजूद इस तरह की व्यवस्था नहीं है।

दिल्ली में बच्चियों की मौत ने न सिर्फ सरकारी सिस्टम की लापरवाही बल्कि शहरी समाज की बेपरवाही को उजागर किया है। भारी उम्मीदों और बहुमत के साथ केंद्र और दिल्ली राज्य की सत्ता में आए नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल भी लोगों को खाद्य सुरक्षा देने में नाकाम साबित हो रहे हैं।

 

लोकप्रिय

कृषि विधेयकों के खिलाफ किसान आंदोलनों के बीच फसलों की एमएसपी में इजाफा

कृषि से जुड़े विधेयकों को लेकर किसान लगातार आंदोलन कर रहे हैं. विपक्ष संसद से पारित हो चुके इन विधेयकों को किसान...

कृषि कानूनों के खिलाफ 25 सितंबर को भारत बंद 

कृषि से जुड़े तीनों विधेयक भले ही संसद से पारित हो गए हों लेकिन किसानों ने इनके खिलाफ आंदोलनों को और तेज...

क्या एमएसपी के ताबूत में आखिरी कील साबित होंगे नए कृषि विधेयक

कोरोना संकट और लॉकडाउन के बीच मोदी सरकार ने जिस अफरा-तफरी में तीनों कृषि अध्यादेशों लाई, इन्हें विधेयक के रूप में संसद...

Related Articles

पाम ऑयल मिशन को लेकर नॉर्थ-ईस्ट में उपजी आशंकाएं

“हमसे कोई सलाह-मशविरा नहीं लिया गया। नॉर्थ ईस्ट में पाम ऑयल मिशन ठीक नहीं है क्योंकि मेघालय में हम आदिवासियों का जीवन...

Palm Oil की खेती से क्या हैं नुक़सान?

National Mission on Edible oils- Oil Palm को सरकार ने 18 August 2021 को हरी झंडी दिखाई, खाने के तेल,Palm oil को...

MSP का खेल निराला, क्या है कुछ काला?

सरकार ने किसान आंदोलन के बीच रबी मार्केटिंग सीज़न 2022-23 के लिए फसलों की MSP का एलान किया है, सरकार फसलों के...