किसानों के विरोध के बीच तीनों कृषि विधेयक कानून बने, राष्ट्रपति ने मुहर लगाई

इन कृषि कानूनों के खिलाफ 25 सितंबर को भारत बंद के तहत देश भर में प्रदर्शन हुए हैं. इसके अलावा पंजाब में 24 सितंबर से रेल रोको आंदोलन जारी है.

महिला किसान दिवस पर उनके ‘मन की बात’

'महिला किसान दिवस' पर सुनिए ख़ास बातचीत, आदिवासी महिलाओं के जल, जंगल और ज़मीन के अधिकार को लेकर उनके संघर्ष और तीनों विवादित कृषि क़ानून से क्या हैं महिला किसानों के लिए आगे की चुनौतियाँ, क्या हैं डर? हिंद किसान ने AIl India Union for forest working People (AIUFWP) और आदिवासी अधिकारों से जुड़ी ऐक्टिविस्ट- #RomaMalik और UN Secy General के Youth advisory group on Climate Change की भारत से सदस्य, उड़ीसा की #ArchnaSoreng से बातचीत की।

किसान आंदोलन में कितनी ऐक्टिव हैं महिलाएँ?

जब दिल्ली के बॉर्डर्ज़ पर किसान और जनता खेती के मुद्दों और तीन कृषि क़ानून की वापसी को लेकर डटे हुए हैं, हिंद किसान ने राजधानी दिल्ली के बॉर्डर से दूर, राजस्थान के झुनझुनू से एक महिला ऐक्टिविस्ट से बातचीत की। ये तमाम महिलाओं के साथ collectorate पर धरना दे रही हैं , उनसे जाना कि तीनों कृषि क़ानून पर बने गतिरोध पर उनकी क्या प्रतिक्रिया है, आंदोलन को लेकर उनकी क्या तैयारी है? सुनिए उनकी मोदी जी से सीधी माँग- बात सीधी, मगर तीखी।

सरकार दिखा रही बड़प्पन, फिर फ़ैसले में देरी क्यूँ?

'सीधी मगर तीखी बात' में पूर्व कृषि मंत्री, सोमपाल शास्त्री जी की कृषि क़ानून पर सरकार की तरफ़ से मामले को सुलझाने के रवैये पर बेबाक़ राय। 15 जनवरी को किसानों और सरकार के बीच 9वे राउंड की वार्ता में कृषि क़ानून पर एक बार फिर कोई सहमति नहीं बन पायी, अगली तारीख़ 19 जनवरी की तय हुई है। किसानों ने शांतिपूर्ण आंदोलन को और तेज़ करने का संदेश दे दिया है।मामले में नए पेंच जुड़ रहे हैं, सुनिए ये ख़ास बातचीत।

वार्ता की मिली नयी तारीख़, कब बनेगी बात?

१५ जनवरी को कृषि क़ानून को लेकर सरकार और किसान की वार्ता एक बार फिर बेनतीजा रही, नयी तारीख़ १९ जनवरी तय हुई है, MSP के मुद्दे पर सरकार बचती रही जबकि उसी पर निर्णायक फ़ैसला लेने के मन से आए थे संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य, आख़िर कब तक टलता रहेगा MSP का मुद्दा और MSP के अलावा भी क्यूँ ज़रूरी हैं बाक़ी मुद्दे? क्या होगा आगे?

SC के आदेश से सुलझेगा या उलझेगा मामला?

SC ने १२ जनवरी को ३ कृषि क़ानून को अमल में लाने पर अगले ऑर्डर तक रोक लगा दी है, एक कमेटी का भी गठन कर दिया है ताकि ज़मीनी हालात का जायज़ा लिया जा सके, एक तरह से जो काम सरकार तमाम बैठकों के बावजूद नहीं कर पायी, कृषि क़ानून पर बने डेड्लाक को ख़त्म नहीं कर पायी उस पर एक कदम आगे बढ़ते हुए, SC ने ऑर्डर जारी कर दिया, क्या किसानों को स्वीकार है ये ऑर्डर? कौन है इस समिति के सदस्य, कितना सही है ये फ़ैसला? सुनिए महाराष्ट्र के Farm Activist - Vijay Jawandhia जी से ये ख़ास बातचीत।

किसानों के भारी विरोध के बीच संसद से पारित हुए कृषि विधेयकों पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपनी मुहर लगा दी है. समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, रविवार को राष्ट्रपति ने तीनों कृषि विधेयकों को मंजूरी दे दी. इसके साथ किसान उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक-2020, किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन व कृषि सेवा समझौता विधेयक-2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक-2020 अब कानून बन गए हैं.

विपक्ष ने बीते हफ्ते राज्य सभा से विधेयकों को पारित करने के दौरान नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया था. उन्होंने इस मुद्दे पर राष्ट्रपति से मुलाकात की थी और इन विधेयकों को मंजूरी न देने की अपील की थी. इसके अलावा रविवार तक एनडीए में शामिल रहे अकाली दल ने भी राष्ट्रपति से इन विधेयकों को मंजूरी न देने की अपील की थी. इन विधेयकों के विरोध में केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे चुकी हरसिमरत कौर ने विवादित कृषि विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने को लोकतंत्र के लिए काला दिन बताया है. ट्विटर पर उन्होंने लिखा, ‘निश्चित तौर पर यह लोकतंत्र के लिए काला दिन है, क्योंकि राष्ट्रपति ने राज्य सभा से असंवैधानिक तरीके से पारित इन किसान विरोधी विधेयकों पर हस्ताक्षर न करने की 18 पार्टियों की अपील को मानने से इनकार कर दिया.’

खेती से जुडे तीनों कानूनों का देश भर में किसान विरोध कर रहे हैं. 25 सितंबर के भारत बंद के दौरान पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश से लेकर कर्नाटक तक विरोध प्रदर्शन हुए हैं. किसान इन कानूनों से खेती में कारपोरेट्स की दखल बढ़ने और खेती-किसानी को नुकसान होने की आशंका जता रहे हैं. उनका कहना है कि सरकार के इन कथित कृषि सुधारों से कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) एक्ट के तहत चलने वाली मंडियां तबाह हो जाएंगी, फिर इसी का बहाना बनाकर सरकार फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद बंद कर देगी. दरअसल, एपीएमसी एक्ट के तहत चलने वाली मंडियों में सभी खरीद-फरोख्त पर टैक्स लगता है. लेकिन किसान उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) एक्ट-2020 के तहत एपीएमसी मंडी परिसर को छोड़कर बाकी जगहों पर होने वाली कृषि उपजों की खरीद-बिक्री को टैक्स फ्री कर दिया गया है. इससे एमपीएमसी मंडी परिसर में काम करने वाले कारोबारी बाहर के कारोबारियों का सामना नहीं कर पाएंगे और अंत में उन्हें मंडी के भीतर अपना कारोबार बंद करना पड़ेगा. इससे राज्य सरकार को मंडी टैक्स और किसानों को मंडी परिसर में मिलने वाली सुरक्षा का नुकसान उठाना पड़ेगा.

हालांकि, केंद्र सरकार एमएसपी पर फसलों की खरीद बंद होने की आशंका को लगातार खारिज कर रही है. रविवार को प्रसारित ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन कृषि कानूनों और इसके जरिए कृषि क्षेत्र में हो रहे सुधारों का जिक्र किया. उन्होंने कहा, ‘साथियों, देश का कृषि क्षेत्र, हमारे किसान, हमारे गाँव, आत्मनिर्भर भारत का आधार हैं. ये मजबूत होंगे तो आत्मनिर्भर भारत की नींव मजबूत होगी. बीते कुछ समय में इन क्षेत्रों ने खुद को अनेक बंदिशों से आजाद किया है, अनेक मिथकों को तोड़ने का प्रयास किया है.’

प्रधानमंत्री ने अपने कार्यक्रम में हरियाणा के एक किसान का उदाहरण दिया और बताया कि 2014 में राज्य में फल-सब्जियों को एपीएमसी एक्ट से बाहर करने का इस किसान को कैसे और कितना फायदा हुआ है. उन्होंने महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात और लखनऊ से भी एमपीएमसी एक्ट में छूट के बाद किसानों को मिली सफलता के उदाहरण दिए. तमिलनाडु के एक किसान उत्पादक समूह का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, ‘आप सोचिये, कितने नौजवानों को उन्होंने रोजगार दिया. और मज़ा ये है कि बिचौलियों के ना होने के कारण किसान को भी लाभ हुआ और उपभोक्ता को भी. ऐसा ही एक लखनऊ का किसानों का समूह है. उन्होंने नाम रखा है ‘इरादा फार्मर प्रोडयूसर’. इन्होंने भी लॉकडाउन के दौरान किसानों के खेतों से सीधे फल और सब्जियां ली और सीधे जा करके लखनऊ के बाज़ारों में बेची-बिचौलियों से मुक्ति हो गई और मन चाहे उतने दाम उन्होंने प्राप्त किये.’ प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा, ‘साथियों, आज की तारीख में खेती को हम जितना आधुनिक विकल्प देंगे, उतना ही वह आगे बढ़ेगी, उसमें नये-नये तौर-तरीके आयेंगे, नए इनोवेशंस जुड़ेंगे.’

लेकिन सरकार के इन तमाम दावों के बावजूद किसान अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं. रविवार को फिरोजपुर जंक्शन के रेलवे ट्रैक पर किसान मजदूर संघर्ष समिति की अगुवाई में सैकड़ों किसानों, मजदूरों और महिलाओं ने प्रदर्शन किया. यहां किसान 24 सितंबर से 29 सितंबर तक रेल रोको आंदोलन चला रहे हैं. किसानों ने केंद्र सरकार के इशारे पर हरियाणा सरकार द्वारा लालारू और शंभू बैरियर पर नाकाबंदी को संविधान के अनुच्छेद-19 का घोर उल्लंघन बताया और इसे तत्काल हटाने की मांग की. किसान नेता सतनाम सिंह पन्नू ने 28 सितंबर को भगत सिंह की 113वीं जयंती पर रेलवे ट्रैक पर विशाल रैली करने का ऐलान किया है.

अमृतसर में किसान मजदूर संघर्ष कमेटी का रेलवे ट्रैक पर धरना चौथे दिन जारी रहा. यहां भी संगठन की अपील पर किसानों के साथ महिलाएं और बेटियां भी केसरी चुनरी ओढ़कर अमृतसर रेलवे ट्रैक पर चल रहे आंदोलन में शामिल हुईं. किसानों का आरोप है कि इन विधेयकों (अब कानून) को अगर लागू कर दिया गया तो किसान निजी कंपनियों का गुलाम बन कर रह जायेगा, यही नहीं एमएसपी भी सरकार धीरे-धीरे ख़त्म कर देगी.

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