आधी अधूरी तैयारी की वजह से एमएसपी से कम पर धान बेचने को मजबूर यूपी के किसान

किसानों से एमएसपी से कम पर धान ना बेचने की अपील तो की गई है, लेकिन सवाल ये है कि क्या वाकई किसान ऐसा कर पाएंगे। राज्य में धान खरीद के बीते सालों के आंकड़े इस सवाल और आशंका को बढ़ाते हैं। तो वहीं अभी किसानों को एमएसपी के मुकाबले हर एक क्विंटल पर औसतन 800 रुपये तक का नुकसान हो रहा है।

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धान उत्पादन में देश में दूसरे पायदान पर काबिज उत्तर प्रदेश में इसकी सरकारी खरीद 1 अक्टूबर से शुरू हो गई है। लेकिन क्या सरकार ने इसके हिसाब से सरकारी खरीद के लिए तैयारियां की हैं। इसे समझने के लिए दूसरे धान उत्पादक राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के मुकाबले उत्तर प्रदेश में किस तरह के इंतजाम किए गए हैं, यह जानना जरूरी है। पंजाब और तेलंगाना में जहां हर 2 से 3 गांवों पर धान के लिए एक सरकारी खरीद केंद्र है, वहीं उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 26 गांवों पर एक खरीद केंद्र का है। सामान्य धान की एमएसपी 1,868 रुपये होने के बावजूद उत्तर प्रदेश में धान उत्पादक किसानों को मुश्किल से 1000 से 1,100 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है। ऐसे में राज्य को धान उत्पादन में नंबर दो बनाने वाले किसानों को कैसे न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल पाएगा, यह बड़ा सवाल है।

धान की सरकारी खरीद शुरू होने की जानकारी देते हुए मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी से नीचे कहीं भी धान न बेचने की अपील भी की है।

उत्तर प्रदेश सरकार का दावा है कि इस साल के प्रस्तावित 4,000 खरीद केंद्रों में से 3,118 केंद्र चालू हो गए हैं। इसके अलावा अभी तक ‘ई-उपार्जन’ पोर्टल पर 2,07,280 किसानों का पंजीयन हो चुका है। सरकार ने ग्रेड-ए के धान का न्यूनतन समर्थन मूल्य 1,888 रुपये प्रति क्विंटल और सामान्य धान का समर्थन मूल्य 1,868 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है।

मुख्यमंत्री योगी ने किसानों से एमएसपी से कम पर धान ना बेचने की अपील तो कर डाली है, लेकिन सवाल यह उठता है कि सरकार के अलावा किसानों से एमएसपी पर धान खरीदेगा कौन? बीते तीन सालों में उत्तर प्रदेश में कुल धान उत्पादन के मुकाबले इसकी सरकारी खरीद के आंकड़े अलग ही हकीकत बयान कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में 2017-18, 2018-19 और 2019-20 में कुल जितना धान पैदा हुआ, हर साल उसके एक-चौथाई धान की भी सरकारी खरीद नहीं हुई। केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के मुताबिक, साल 2019-20 में उत्तर प्रदेश में 155 लाख टन से ज्यादा धान पैदा हुआ, लेकिन एमएसपी पर सरकारी खरीद सिर्फ 40 लाख टन की ही हुई। इसके मुकाबले पंजाब में 118 लाख टन धान पैदा हुआ, जिसमें से 108 लाख टन से ज्यादा धान की सरकारी खरीद की गई। वहां तेलंगाना में 76 लाख टन धान उत्पादन में से करीब साढ़े 74 लाख टन को सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद लिया।

(आंकड़े- लाख टन में, स्रोत-खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग )

अब सवाल उठता है कि सरकार ने ऐसी कौन सी व्यवस्था बनाई है जिससे किसानों को अपना धान एमएसपी से कम कीमत पर नहीं बेचना पड़ेगा। हकीकत यह है कि जब ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है, तो फिर किसानों से ही एमएसपी से कम पर फसल न बेचने की अपील करना कितना असरदार साबित होगा।

पीलीभीत में धान की खेती बड़े स्तर पर होती है। पूरनपुर में धान की खेती करने वाले किसान गुरप्रीत सिंह ने हिंद किसान से कहा कि, ‘हमारे यहां करीब 80% किसान धान की खेती करते हैं। यहां पीआर-126, 121 और 113 किस्म के धान की खेती होती है। एमएसपी 1,888 रुपये है लेकिन हमें मुश्किल से 1,050 रुपये का भाव मिल रहा है। हालात यह है कि किसानों को धान मंडी में ही छोड़ कर जाना पड़ रहा है, बिना भाव तय किये। पिछले साल इसी धान का हमें 1,600-1,700 रुपये भाव मिल गया था। यहां राइस मिलर भी मनमानी कर रहे हैं।’

बीते साल (2019-20) उत्तर प्रदेश में करीब 3000 खरीद के लिए क्रय केंद्र बनाए गए थे। अब अगर बीते साल से ज्यादा धान उत्पादन की बात मान लें, जैसा कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने अपने ट्वीट में दावा किया है, तो महज 4000 खरीद केंद्रों से कितना धान खरीदा जा सकेगा। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश, देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है जहां बीते साल धान की खेती करने वाले करीब 8 लाख किसानों ने पंजीकरण कराया था। लेकिन धान की सही कीमत के लिए किसानों को भटकना पड़ता है। अभी कुछ ही दिन पहले उत्तर प्रदेश से धान बेचने के लिए हरियाणा जा रहे किसानों को सीमा पर रोक दिया गया था। हालांकि, ऐसा हर साल होता है, अगर किसानों को राज्य में ही फसल की सही कीमत मिलती तो उन्हें दूसरे राज्यों में नहीं जाना पड़ता।

क्रय केंद्रों की हालत के बारे में पीलीभीत में मरोरी खास के किसान अनिल सिंह ने हिंद किसान को बताया कि, ‘हमारे इलाके के आस-पास कुछ किलोमीटर में करीब 5 क्रय केंद्र बनाए गए हैं लेकिन कहीं भी खरीद शुरू नहीं हुई है। धान लेकर जाते हैं तो कहा जाता है कि नमी ज्यादा है और ये मानक के अनुरूप नहीं है। मंडी में धान 900 से 1,200 रुपये पर बिक रहा है लगातार नुकसान हो रहा है लेकिन कोई सुनवाई नहीं है।’

अनिल सिंह ने किसानों की एक और समस्या बताई। उन्होंने कहा कि, ‘हमारे खेतों में प्रति हैक्टेयर कम से कम 75 क्विंटल उत्पादन होता है। लेकिन क्रय केंद्र एक हैक्टेयर पर 65 क्विंटल की ही खरीद करेंगे। ऐसे में हमें प्रति हैक्टेयर कम से कम 10 क्विंटल धान बाजार में बेचना होगा। उस पर भी क्रय केंद्रों में खरीद शुरू नहीं हो रही है।’

राज्य में धान की खरीद 1 अक्टूबर, 2020 से 31 जनवरी, 2021 तक होगी। उत्तर प्रदेश सरकार के मुताबिक धान खरीद के लिए सरकार 5,100 करोड़ रुपये का कर्ज भी ले रही है। इसमें खाद्य विभाग द्वारा 3,000 करोड़ रुपये, पीसीएफ द्वारा 1,100 करोड़ रुपये, पीसीयू द्वारा 800 करोड़ रुपये और यूपीएसएस द्वारा 200 करोड़ रुपये का कर्ज बैंक से लिया जा रहा है।

फोटो- @UPGovt

गांव की संख्या के हिसाब से देखें तो जनगणना, 2011 के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 1,07,106 गांव, पंजाब में 12,715 गांव, और तेलंगाना में 12,751 गांव हैं। खरीद केंद्रों और गांवों के अनुपात को समझें तो उत्तर प्रदेश में 26 गांवों पर एक खरीद केंद्र है जबकि पंजाब में करीब 3 और तेलंगाना में 2 गांव पर एक खरीद केंद्र।

उत्तर प्रदेश में बीते साल करीब 155 लाख टन धान का उत्पादन और सरकारी खरीद करीब 38 लाख टन हुई थी। इस बार धान के बंपर उत्पादन की संभावना है ऐसे में क्या बीते सालों का रिकॉर्ड देखते हुए ये उम्मीद की जा सकती है कि किसानों को उनकी उपज की सही कीमत मिल पाएगी। ये सवाल इस बार और बड़ा होगा क्योंकि केंद्र सरकार के खेती से जुड़े नए कानून लागू हो चुके हैं और सरकार का दावा है कि ये कानून किसानों को अच्छी कीमत दिलाने में मदद करेंगे।

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