राष्ट्रीय महिला किसान दिवस पर खास, कहां गुम हैं महिला किसान

महिलाओं को संपत्ति पर मालिकाना हक मिलने का कानूनी आधार तो है, लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों से अब तक यह सही से लागू नहीं हो पाया है

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ग्रामीण आबादी में 73 फीसदी कामकाजी महिलाएं किसान हैं लेकिन इनके पास खेती लायक सिर्फ 12 फीसदी जमीन है। यह आंकड़ा कृषि जनगणना 2015 का है। यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड और नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लायड इकोनॉमिक रिसर्च के संयुक्त अध्ययन के मुताबिक, देश के कुल कृषि मजदूरों में महिलाओं की संख्या 42 फीसदी है, जबकि सिर्फ दो फीसदी जमीन पर उनका मालिकाना हक है। यानी खेती में लगी महिलाओं की बड़ी आबादी भूमिहीनता की शिकार है। इसका सीधा खामियाजा है कि वे सरकारी योजनाओं में गुमनामी का शिकार होकर उसके लाभ से वंचित हो जाती हैं। दरअसल, राष्ट्रीय किसान नीति-2007 में किसान की परिभाषा को व्यापक रखते हुए इसमें भूमिहीनों, बंटाईदारों और दूसरे मजदूरों को भी शामिल किया गया है, लेकिन सरकार की परिभाषा अभी भी जमीन के मालिकाना हक पर आधारित है। इससे महिलाओं के लिए बैंक से खेती के लिए कर्ज या दूसरी मदद नहीं मिल पाती है। जैसे किसानों को सालाना 6000 रुपये की मदद देने वाली किसान सम्मान निधि योजना का लाभ किसी भी भूमिहीन महिला किसान को नहीं मिल रहा है, क्योंकि किसान साबित करने के लिए कृषि योग्य जमीन का मालिक होना जरूरी है।

इतना ही नहीं, केंद्र सरकार जिन नए कृषि कानूनों से कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव के दावे कर रही है, उसमें भी महिला किसानों को कोई खास तरजीह नहीं दी गई है। खास तौर पर किसान उत्पादक समूह बनाने या कृषि उत्पादों का कारोबार करने में उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं लाए गए हैं। हालांकि, राष्ट्रीय महिला किसान दिवस पर केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने भारतीय अर्थव्यवस्था में उनके योगदान को याद किया। ट्विटर पर उन्होंने लिखा, ‘भारतीय अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने में महिला कृषकों का योगदान सराहनीय है, उनके इस योगदान को मान्यता प्रदान करने और उन्हें सम्मानित करने के लिए सरकार द्वारा वर्ष 2017 से 15 अक्टूबर को राष्ट्रीय महिला किसान दिवस रूप में मनाया जाता है। समस्त महिला कृषकों को हार्दिक शुभकामनाएं.’ लेकिन केंद्रीय मंत्री ने अपने इस ट्वीट के साथ जो फोटो साझा की, वह एक साल पुरानी यानी 2019 की है।

बीते एक साल में कोरोना महामारी, लॉकडाउन और नए कृषि कानूनों से बनते नए ढांचे के बीच जब महिला किसानों से उनका हाल पूछा गया तो जवाब बहुत उत्साहजनक नहीं आया। महिला किसान अधिकार मंच (मकाम) की सदस्य सीमा कुलकर्णी ने हिंद किसान से बातचीत में कहा कि ‘राष्ट्रीय महिला किसान दिवस फिलहाल सिर्फ नाम के लिए ही है। अभी इस पर काम नहीं हो रहा है। देश में 70 फीसदी से ज्यादा महिलाएं खेती-किसानी से जुड़ी हैं, लेकिन अनपेड होने की वजह से उनकी कहीं पर भी गिनती ही नहीं हो पाती।’ उन्होंने आगे कहा, ‘सिर्फ महिला किसान दिवस को सेलिब्रेट करना जरूरी नहीं है, बल्कि महिला किसानों के मुद्दों पर बात भी होनी चाहिए और उनके मुद्दों पर काम होना चाहिए। हम डिजिटल इंडिया की बात करते हैं लेकिन महिला किसानों का जमीन का मालिकाना हक कितना है, इसके सटीक आंकड़ें तक नहीं मिल पाते।

सीमा कुलकर्णी के मुताबिक, ‘फिलहाल 13-14 फीसदी महिलाओं को ही जमीन का मालिकाना हक मिला है। जमीन के मालिकाना हक का अभाव और उनके काम की गिनती न होने से महिलाओं को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता। हमारी मांग है कि जो जितनी मेहनत करता है, उसके हिसाब से उसे सरकारी योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए।’ उन्होंने सरकारी योजनाओं में महिलाओं के लिए बजट आवंटन पर भी सवाल उठाया। सीमा कुलकर्णी ने कहा, ‘सरकार कहती है कि कृषि बजट में से 30 फीसदी हिस्सा महिला किसानों के लिए है, लेकिन यह बजट उन पर ही खर्च होता है या नहीं, यह जानकारी ही नहीं है। जब 70 फीसदी महिलाएं खेती से जुड़ी है तो उनके लिए सिर्फ 30 फीसदी बजट ही क्यों, कृषि बजट में महिला किसानों की हिस्सेदारी बढ़नी चाहिए।’

राष्ट्रीय महिला किसान दिवस पर हिंद किसान ने उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर की महिला किसान ऊषा शर्मा से बात की, जो पति की मौत के बाद बीते नौ साल से खेती कर रही हैं। उन्होंने बताया, ‘खेती में कुछ बचना तो दूर, लागत तक निकाल पाना तक मुश्किल हो रहा है, लगातार लागत बढ़ रही है लेकिन फसल की कीमत बेहद कम बनी हुई है। मैंने 22 बीघा जमीन पर धान की खेती की है, जिसमें अब तक 2300 रुपये प्रति बीघा के हिसाब से लागत आई है, जबकि बाजार में धान की कीमत 1400 से 1500 रुपये से ज्यादा नहीं मिल पाती है।’ उन्होंने बताया कि ‘महिला किसान होने के बावजूद उन्हें किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल पाता।’

बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश की महिला किसान ऊषा शर्मा अपने दोनों बच्चों के साथ

महिला किसानों की इस कमजोर स्थिति की वजह केवल सरकारी नीतियों में नजरअंदाज किया जाना नहीं है, बल्कि समाज की सोच भी बड़ी भूमिका निभा रही है। इस बात को महसूस करते हुए बुलंदशहर के नैथला हशनपुर गांव की सरपंच कविता शर्मा कहती हैं कि ‘हमारा देश पुरुष प्रधान है। महिलाएं खेतों में कितना भी काम कर लें, लेकिन उन्हें कभी अपनी मेहनत का कोई नतीजा नहीं मिलता।’

दरअसल, भारत में जमीन का हस्तांतरण वंशानुगत है और इसमें धर्म केंद्रित कानून माध्यम बनते हैं। जैसे हिंदू उत्ताधिकार अधिनियम के तहत अगर किसी पुरुष का निधन होता है तो उसके नाम दर्ज जमीन को मां, विधवा और बच्चों में बांट दिया जाता है। यही नियम जैन, बौद्ध और सिख धर्म के परिवारों में भी लागू होता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मुस्लिम महिला को संपत्ति में एक तिहाई हिस्सा मिलता है, जबकि पुरुषों को दो-तिहाई। लेकिन कुछ राज्यों को छोड़कर यह खेती लायक जमीन पर लागू नहीं होता है। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम-1925 के तहत ईसाई महिला को पैतृक संपत्ति में एक तिहाई हिस्सा मिलता है।

लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक वजहों से कानूनी आधार होते हुए भी पैतृक या वंशानुगत संपत्ति पर महिलाओं को अब तक सही से अपना अधिकार नहीं मिल पाया है। महिला किसान अधिकार मंच (मकाम) की 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक, कृषि कर्ज के चलते खुदकुशी करने वाले किसानों में से 29 फीसदी की विधवाओं को उनकी जमीन पर मालिकाना हक नहीं मिला, जबकि 65 फीसदी विधवाओं के नाम पर उनके मकान का ट्रांसफर नहीं हो पाया।

खेती विरासत संस्था की एसोसिएट डायरेक्टर रूपसी गर्ग ने भी महिला किसानों को उनका वाजिब हक न मिलने की बात कही। हिंद किसान से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘समाज में महिला किसानों को जो हक मिलना चाहिए, वह नहीं मिल पा रहा है। महिला किसानों को भी अपने हक के लिए आगे आना पड़ेगा।’

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