कृषि कानूनों पर राजनैतिक नुकसान से परेशान सरकार ढूंढ़ रही बीच का रास्ता

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केंद्र सरकार ने कृषि उत्पादों की मार्केटिंग, आवश्यक वस्तु अधिनियम में भारी बदलाव और ठेके पर खेती के लिए तथाकथित तीन ‘क्रांतिकारी’ कानूनों के लिए पांच जून को अध्यादेश जारी करने से लेकर उनको संसद में पारित कराने और राष्ट्रपति की मंजूरी तक बहुत ही तेजी और तत्परता से काम किया, लेकिन अब उसे इनके राजनीतिक नुकसान का डर सताने लगा है। शायद सरकार के शीर्ष नेतृत्व व संबंधित मंत्रियों और भाजपा के पदाधिकारियों को यह उम्मीद नहीं थी कि इन कानूनों के खिलाफ देश भर में किसान इतना बड़ा विरोध आंदोलन खड़ा कर देंगे। केवल आंदोलन खड़ा होना ही नहीं बल्कि यह लंबे समय तक टिका भी रहेगा। यही वजह कि शुरू में जिस आक्रामकता के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कृषि मंत्री ने विरोध प्रदर्शनों पर प्रहार किया था वह अब कुछ कमजोर पड़ता दिखाई पड़ रहा है। भले ही सरकार केवल यह कहे कि यह आंदोलन पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित लेकिन हकीकत उसे भी दिख रही है कि यह आंदोलन देशभर में फैल रहा है और अगर यह लंबा खिंचता है तो उसे भारी राजनीतिक नुकसान भुगतना पड़ सकता है। यही वजह है कि अब इस मुद्दे पर किसानों और किसान संगठनों के साथ बातचीत की कोशिश की जा रही है।

हालांकि कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर शुरू से ही कह रहे हैं जिसे भी इन कानूनों से दिक्कत है वह उनसे मिल सकते हैं और स्थिति साफ की जा सकती है। लेकिन इनको वापस लेने का सवाल ही नहीं उठता है क्योंकि यह किसानों के हित में हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद सार्वजनिक मंचों पर इन कानूनों को ऐतिहासिक बताते हुए किसानों की आजादी का कदम कहते हैं।

लेकिन हाल की कुछ घटनाएं सरकार की चिंता बता रही हैं। मसलन केंद्र की एनडीए सरकार से शिरोमणि अकाली दल की अकेली मंत्री हरसिमरत कौर बादल का इस्तीफा और उसके बाद अकाली दल का एनडीए से नाता तोड़ने का फैसला, पंजाब में किसानों के इन कानूनों के विरोध के दबाव को समझने के लिए काफी था। वहीं दूसरी ओर पिछले दिनों केंद्रीय खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति और उपभोक्ता मामले मंत्री रामविलास पासवान के निधन के बाद अब एनडीए की सरकार में केवल रामदास अठावले ही ऐसे मंत्री हैं जो भाजपा के बाहर के हैं। यानी अठावले को छोड़ दें तो अब केंद्र की एनडीए सरकार में बाकी सब मंत्री भाजपा के ही रह गये हैं। इसलिए अब यह उस तरह की गठबंधन की सरकार नहीं मानी जा सकती है जिसमें देश के सभी हिस्सों और अन्य दलों का बड़ा प्रतिनिधित्व हो। इसलिए अब इसके फैसलों के विरोध का जिम्मा भी केवल भाजपा को ही उठाना होगा।

यही वजह है कि पिछले दिनों केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को सक्रिय किया गया कि वह किसानों के साथ बातचीत शुरू करें। किसान संगठनों के सूत्रों के मुताबिक इस तरह की दो बैठकें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के आवास पर हुई। इनमें से कम से कम एक बैठक में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी मौजूद थे। पहली बैठक में शामिल हुए किसान संगठनों के कुछ प्रतिनिधि कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के मौजूदा आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। उनमें से एक प्रतिनिधि ने हिंद किसान के साथ बातचीत में बैठक की बात स्वीकारते हुए कहा कि हमने दो टूक कह दिया था कि कृषि कानूनों की वापसी या न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की सभी तरह के बाजार और खरीद पर लागू करने की शर्त से कम हमें कुछ भी मंजूर नहीं है।

दूसरी बैठक कुछ सरकारिया संगठनों की थी। इसकी अगुवाई एक ऐसे व्यक्ति ने की जिसका किसानों या उसके संगठनों से कुछ भी सीधे लेना देना नहीं है लेकिन यह व्यक्ति पावर कॉरिडोर में बरसों से और खासतौर से भाजपा सरकार के दौर में सक्रिय रहता है। इस बैठक में जहां भाजपा से जुड़े और उसकी राय रखने वाले लोग शामिल थे। वहीं इक्का-दुक्का लोगों के जरिये कथित किसान संगठन चलाने वाले लोग शामिल हुए, जिनका कोई जमीनी आधार ही नहीं है। हालांकि बैठक में कुछ लोगों ने कानूनों के विरोध और एमएसपी की वकालत की। लेकिन इन बैठकों का कोई मतलब नहीं है और यह केवल विरोधियों का पक्ष सुनने की कोशिश करते हुए दिखने की कवायद भर है।

इसके अलावा कृषि सचिव संजय अग्रवाल ने पंजाब के किसान संगठनों को बैठक के लिए बुलावा भेजा है। इस पर किसान संगठनों का कहना है कि फैसला राजनैतिक नेतृत्व ने लिया है तो वह अधिकारियों के साथ बैठक करके क्या करेंगे। वहीं पंजाब की कांग्रेस सरकार ने खुद आंदोलनकारियों के साथ खुद को खड़ा कर रखा है और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी पंजाब में किसान न्याय यात्रा निकाल कर किसानों को इन कानूनों के खिलाफ खड़ा करने का काम कर चुके हैं। यही हालत अकाली दल की है और वह भी इनका विरोध कर रहा है।

हरियाणा में उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के सिरसा स्थिति पुश्तैनी घर का किसान घेराव कर चुके हैं और वहां इनके इस्तीफे के लिए धरना जारी है। सिरसा में किसानों के आंदोलन का नेतृत्व कर रहे स्वराज इंडिया के संस्थापक योगेंद्र यादव ने हिंद किसान के साथ बातचीत में कहा कि चौधरी देवीलाल की विरासत पर दावा करने वाले दुष्यंत चौटाला को तय करना होगा कि वह सरकार के साथ हैं या किसान के साथ। इसलिए उनके इस्तीफे तक हमारा आंदोलन जारी रहेगा।

वहीं भाजपा के राजस्थान में मुखर सहयोगी हनुमान बेनीवाल के लिए भी दिक्कत खड़ी हो गई है। वह खुद को किसान नेता कहते हैं लेकिन सरकार द्वारा लाये गये तीन कृषि कानूनों पर कहते हैं कि वह इन कानूनों में बदलाव के लिए प्रधानमंत्री के साथ बात करेंगे। फिलहाल जिस तरह से किसान और खासतौर से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जाट किसान इनके खिलाफ लामबंद होते जा रहे हैं उसके चलते बेनीवाल की स्थिति कमजोर होती जा रही है क्योंकि वह राजस्थान में खुद को जाट नेता भी प्रोजेक्ट करते हैं और उसके चलते ही वह भाजपा के साथ गठबंधन में आये थे।

हालांकि भाजपा नेतृत्व ने अपने तमाम संगठनों, मंत्रियों व सांसदों को कानूनों के पक्ष में प्रचार के लिए लगा रखा। उनको अखबारों में इन कानूनों के पक्ष में लेख लिखने के लिए कहा जा रहा है। एक वरिष्ठ भाजपा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री ने हिंद किसान के साथ बातचीत कहा कि ऊपर से इन कानूनों के पक्ष में मीडिया में राय रखने व लिखने के लिए कहा जा रहा है। वहीं हरियाणा में सांसदों को इनके पक्ष में रैलियां निकालने के लिए कहा गया है। इसके लिए कई सांसदों को किसानों के विरोध का सामना करना पड़ा है। इनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह के सांसद पुत्र बृजेंद्र सिंह को भी किसानों के विरोध का सामना करना पड़ा। खास बात यह है कि बीरेंद्र सिंह उन सर छोटूराम के नाती हैं जिन्होंने देश में 1939 में पहली बार किसानों के हित में मंडियां स्थापित करने वाले पंजाब एग्रीकल्चर मार्केटिंग एक्ट को लागू किया था। हरियाणा के एक किसान नेता का कहना है कि किसानों के लिए कितने दुर्भाग्य की बात है कि किसानों के मसीहा कहे जाने वाले सर छोटूराम के परिवार का व्यक्ति आज ऐसे कानून की वकालत कर रहा है जो मंडियों को खत्म कर देगा और किसानों को पूंजीपतियों के हवाले कर देगा।

यही वजह है कि आत्मविश्वास से भरी दिख रही केंद्र सरकार और भाजपा को कहीं न कहीं इन कानूनों के विरोध के चलते राजनीतिक नुकसान की आशंका सता रही है। इसके चलते ही किसानों के हितैषी की छवि रखने वाले पार्टी नेताओं के जरिये बीच का रास्ता निकालने की कवायद हो रही है। लेकिन लगातार बढ़ते आंदोलन के चलते फिलहाल इस मोर्चे पर सरकार को आसानी से कामयाबी मिलती नहीं दिख रही है। वैसे भी जैसे योगेंद्र यादव कहते हैं कि किसान आंदोलन हाथी की चाल से चल रहा है। यह है तो धीमा लेकिन आने वाले दिनों में पूरे देश में फैल जाएगा। वहीं तमाम किसान संगठनों ने एक बार फिर तीन नवंबर को देशव्यापी चक्का जाम ऐलान करने के साथ ही उसके बाद दिल्ली कूच का भी ऐलान कर रखा है। दूसरी ओर सरकार के कड़े रुख को देखते हुए यह मुद्दा जल्दी हल होता नहीं दिखता है।

(लेखक हिंद किसान के एडिटर-इन-चीफ हैं)

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