महाराष्ट्र से पंजाब तक कपास की एमएसपी को तरसे किसान

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केंद्र सरकार हर मौके पर कृषि कानूनों से किसानों को फायदे होने के दावे कर रही है। उसका यह भी कहना है कि इन नए कानूनों की वजह से किसान देश में कहीं भी अच्छी कीमत देखकर अपनी फसल बेच सकते हैं। लेकिन महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक कपास की खेती करने वाले फसल की कम कीमत मिलने से परेशान हैं।

खरीफ सीजन में कपास खेतों से निकलकर मंडियों में पहुंचने की दर अब बढ़ गई है। सरकार ने इस साल मध्यम रेशे वाली कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी 5,515 रुपये प्रति क्विंटल, जबकि लंबे रेशे वाली कपास की एमएसपी 5,825 रुपये क्विंटल घोषित किया है। लेकिन पंजाब से लेकर महाराष्ट्र तक किसानों को 4000 से 5000 रुपये प्रति क्विंटल पर कपास की फसल बचनी पड़ रही है।

सरकार किसानों से एमएसपी पर कपास की सरकारी खरीद करने के तमाम दावे कर है। उसका कहना है कि खरीफ सीजन 2020-21 में कपास की सरकारी खरीद 1 अक्टूबर से शुरू हो चुकी है और 16 अक्टूबर तक 1,50,654 बॉल्स कपास खरीदी भी जा चुकी है। सरकार ने इसके लिए किसानों को 425.55 करोड़रुपये से ज्यादा का भुगतान करने और इससे 30,139 से ज्यादा किसानों को फायदा होने का दावा किया है।

देश के सबसे ज्यादा कपास पैदा करने वाले राज्य महाराष्ट्र में अब तक कपास की सरकारी खरीद शुरू ही नहीं हो पाई है। महाराष्ट्र में भारी बारिश ने पहले ही किसानों की नींद उड़ा रकी है। इससे किसानों को लगभग आधी फसल का नुकसान उठाना पड़ा है। इस पर सरकारी खरीद शुरू न होने की वजह से किसानों को एमएसपी तो दूर लागत भर के पैसे भी नहीं मिल पा रहे हैं। इस समय यहां खुले बाजार में कपास का भाव 4,000 से 5,000 के बीच अटका हुआ है। परभनी जिले में अरवी गांव के किसान मानिक कदम ने हिंद किसान से बातचीत में बताया कि ‘बारिश की वजह से सोयाबीन और कपास दोनों ही फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। सरकार ने अभी तक एमएसपी पर खरीद शुरू नहीं की है और व्यापारी कपास खरीदने में मनमानी कर रहे हैं।’ उन्होंने यह भी बताया कि ‘बारिश की वजह से कपास को खेत से निकालने की लागत भी बढ़ रही है। पहले कपास को खेत से घर तक लाने में 700 रुपये प्रति क्विंटल का खर्च आता था, जो अब यह बढ़कर 1000 से 1500 रुपये के बीच पहुंच गया है. लेकिन व्यापारी 4,000 से 4,200 रुपये प्रति क्विंटल का दाम ही दे रहे हैं।’

नए कृषि कानून से किसानों को कहीं फसल मिलने के दावे पर सवाल उठाते हुए किसान मानिक कदम ने कहा कि ‘सरकार इसके जरिए एमएसपी से भागना चाहती है। खेत से घर तक कपास लाने में ही अगर 1,500 रुपये प्रति क्विंटल का खर्च आ रहा है तो दूसरे राज्य तक ले जाने का खर्च निकालने के बाद हमें क्या बचेगा?’ बाजार में कम कीमत और ज्यादा लागत का यही सवाल यवतमाल में सात एकड़ जमीन में कपास की खेती करने वाली किसान संगीता को भी सता रहा है। हिंद किसान को उन्होंने बताया कि ‘पहले ही बारिश की वजह से फसल खराब हो गई, लेकिन अब जो बाजार में कपास की कीमत मिल रही है उससे लागत कैसे निकलेगी, पता नहीं?’

महाराष्ट्र के किसान नेता विजय जावंधिया ने हिंद किसान से बातचीत में एक और चुनौती की तरफ ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि ‘जलगांव में गुजरात के व्यापारी किसानों से 4,000 से 5,000 हजार रुपये क्विंटल के भाव पर कपास खरीद रहे हैं। किसान कम कीमत मिलने की समस्या से तो जूझ ही रहे हैं, उन्हें यह डर भी सता रहा है कि कहीं व्यापारी उनको पैसे लटका न दें।’ केंद्र सरकार के कृषि कानूनों पर सवाल उठाते हुए विजय जावंधिया ने आगे कहा कि ‘सरकार कह रही है कि किसान अब किसी को भी अपनी फसल बेच सकते हैं, व्यापारियों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी जिससे किसानों को अच्छी कीमत मिलेगी। लेकिन मेरा सवाल यह है कि जब किसानों को अच्छी कीमत मिल रही है तो आपको क्यों साबित करना पड़ रहा है कि हमारी एमएसपी पर धान की खरीद इतने लाख टन हो गई. क्यों नहीं व्यापारी आकर किसानों से एमएसपी से ज्यादा भाव पर कपास की खरीद कर रहे हैं? क्यों नहीं किसानों को खुले बाजार में अच्छी कीमत मिल पा रही है?’ उन्होंने आगे कहा, ‘जैसा हाल मध्य प्रदेश में सोयाबीन का हुआ है कि बाजार में किसानों को बेहद कम कीमत मिल रही है, राजस्थान में बाजरे और बिहार में मक्के के किसानों को सही कीमत नहीं मिल रही है, ऐसा ही हाल यहां पर कपास किसानों का है।’

यह तस्वीर तो उस महाराष्ट्र की है, जहां पर एमएसपी पर फसल की खरीद शुरू ही नहीं हो पाई है। लेकिन पंजाब और हरियाणा में एक अक्टूबर से कपास की सरकारी खरीद शुरू हो गई है। लेकिन, खुले बाजार में कपास की कीमत के मामले में यहां के किसानों का हाल महाराष्ट्र से अलग नहीं है।

हरियाणा के हिसार में रहने वाले किसान सुरेंद्र सिं ने हिंद किसान को बताया कि ‘सरकार ने एमएसपी पर खरीद तो शुरू कर दी है लेकिन किसानों को इसका कोई फायदा नहीं हो रहा है, क्योंकि सरकारी खरीद केंद्रों पर खरीद बेहद सुस्त है।’ उन्होंने आगे कहा कि ‘पहले तो किसानों का रजिस्ट्रेशन नहीं होता, फिर टोकन नहीं मिलता और टोकन मिलने के बाद भी किसानों को फसल बेचने के लिए मैसेज नहीं आता। लिहाजा किसान अपनी कपास को 4,500 से 5,000 रुपये प्रति क्विंटल के दाम पर खुले बाजार में कपास बेचने को मजबूर हैं।’

दूसरे राज्य में फसल ले जाकर बेचने की छूट के सवाल पर हरियाणा के किसान सुरेंद्र सिंह भी महाराष्ट्र के किसान मानिक कदम से मिलता-जुलता ही जवाब देते हैं। उनका कहना है कि ‘हम लोग ट्रैक्टर को किराये पर लेकर खेत से मंडी तक फसल लाते हैं, उसमें ही फसल की लागत बढ़ जाती है, अब दूसरे राज्यों में फसल ले जाने से लागत तो बढ़ेगी ही, और कीमत सही मिलने की कोई गारंटी भी नहीं है।’

हालांकि, किसानों की इस शिकायत पर हिंद किसान ने कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) की प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की। कॉटन सीजन 2020-21 के लिए घोषित एमएसपी सेल में शामिल उत्तरी जोन के डिप्टी मैनेजर मोहित शर्मा के आधिकारिक नंबर पर मंगलवार दोपहर को बार-बार संपर्क किया गया, लेकिन उनकी तरफ से फोन नहीं रिसीव किया गया। उनका जवाब मिलने पर उसे इस खबर को अपडेट कर दिया जाएगा।

सरकारी खरीद के दावों और जमीनी हकीकत में इस अंतर को समझने के लिए हिंद किसान ने पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री और कृषि मामलों के जानकार सोमपाल शास्त्री से बात की। इस बारे में उनका साफ कहना है कि अगर किसानों को गिरती कीमत की मार से बचाना है तो सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य को वैधानिक (कानूनी) बनाना ही होगा। पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि सरकार 2014 में किसानों से स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने का वादा करके साथ सत्ता में आई थी लेकिन सरकार ने इस मामले में किसानों से झूठ बोला।

नए कृषि कानूनों और किसानों को फसलों की सही कीमत दिलाने के दावे पर पूर्व कृषि मंत्री सोमपाल शास्त्री ने कहा, ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य को प्रत्येक उत्पाद का वैधानिक अधिकार बनाया जाए, सीएसीपी को संवैधानिक दर्जा देकर स्वायत्तशासी संस्था बनाया जाए, किसानों और व्यापारियों के बीच विवाद को सुलझाने के लिए जो भी प्राधिकरण बने, वो वर्तमान न्यायाधिकरण से अलग बने, उनको मामलों को निपटाने की समय सीमा दी जाए। तय समय सीमा में विवाद न सुलझाने पर इस मामले में नियुक्त अधिकारियों के खिलाफ सजा का प्रावधान भी होना चाहिए।’ उन्होंने कहा कि ‘अगर सरकार इन तीनों बातों को अपनाती है तो कृषि कानून से किसानों को लाभ होगा। लेकिन सरकार की ये कोई चाल है कि पूंजीपतियों के चक्कर में आकर एमएसपी प्रणाली और मंडी समिति को श्रद्धांजलि दे दी जाए तो इससे बहुत भयावह दृश्य उत्पन्न होगा।’

भारत दुनिया में सबसे ज्यादा कपास की खेती और उत्पादन करने वाला देश है। इसके अलावा कपास की खपत और निर्यात में दूसरे नंबर है। इसके बावजूद इसकी खेती करने वाले किसान कर्ज में डूबे और आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 में किसानों की खुदकुशी वाले शीर्ष के छह राज्य कपास की खेती जुड़े हैं। इसमें महाराष्ट्र (2,680) कर्नाटक (1,331), आंध्र प्रदेश (628), तेलंगाना (491), पंजाब (239) और मध्य प्रदेश (142) शामिल हैं। इन राज्यों में कपास की खेती करने वाले किसानों के कर्ज में डूबे रहने के मामले ज्यादा है, जिसकी वजह खेती की बढ़ती लागत और उसके मुकाबले सही कीमत न मिलना है।

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