पाम ऑयल मिशन को लेकर नॉर्थ-ईस्ट में उपजी आशंकाएं

बड़े पैमाने पर ताड़ की खेती से पूर्वोत्तर भारत में जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा और परंपरागत खेती के भविष्य को लेकर कई तरह की चिंताएं जताई जा रही हैं।

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“हमसे कोई सलाह-मशविरा नहीं लिया गया। नॉर्थ ईस्ट में पाम ऑयल मिशन ठीक नहीं है क्योंकि मेघालय में हम आदिवासियों का जीवन प्रकृति से जुड़ा है और पर्यावरण पर इसका बुरा असर पड़ेगा। आपने किससे पूछकर यह मिशन लागू किया? यहां के मुख्यमंत्री की बहन और तुरा संसदीय क्षेत्र से सांसद अगाथा संगमा, पर्यावरण मंत्री, विपक्षी दलों के सदस्य और किसानी से जुड़े हम जैसे लोग मना कर रहे हैं फिर आपने किस आधार पर यह फैसला लिया?”

मेघालय में किसानों के साथ काम करने वाले भोगतोराम मावरोह नॉर्थ ईस्ट स्लो फूड एंड एग्रो बायोडायवर्सिटी सोसायटी (NESFAS) के सीनियर एसोसिएट एंड रिसर्चर हैं। केंद्र सरकार के नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल – ऑयल पाम को लेकर उनकी कई आशंकाएं और आपत्तियां हैं। ‘हिंद किसान’ के साथ हुई एक खास बातचीत में उन्होंने बताया कि देश की खाद्य सुरक्षा बहुत हद तक जंगलों पर निर्भर करती है। हमारे सामने उदाहरण है कि किस तरह मलेशिया और इंडोनेशिया के जंगल ताड़ की खेती के कारण बर्बाद हो गए।

नॉर्थ ईस्ट स्लो फूड एंड एग्रो बायोडायवर्सिटी सोसायटी द्वारा दो साल पहले की गई एक रिसर्च को सामने रखते हुए भोगतोराम बताते हैं कि नागालैंड और मेघालय में औसतन हर एक गांव में परंपरागत तौर पर करीब 200 तरह के पौधे और कई तरह की फसलें होती हैं। फल, सब्जियों और मशरूम के रूप में जंगलों से भोजन प्राप्त होता है। जहां धान उगाया जाता है उसके आसपास भी इतना पानी होता है कि बहुत सारी झाड़ियां और फसलें उगाई जाती हैं। ऐसा ही कुछ इंडोनेशिया में भी सालों पहले होता था लेकिन जब से वहां पाम ऑयल के लिए ताड़ की खेती का अंधाधुंध विस्तार हुआ और कैमिकल फार्मिंग को बढ़ावा मिला तब से प्रकृति के साथ पूरा तालमेल बिगड़ गया है।

ताड़ की खेती खासतौर से कॉरपोरेट और इंडस्ट्रियल प्लांटेशन के तौर पर बड़े पैमाने पर होती है। इसमें फल आने में समय लगता है यानि जेस्टेशन पीरियड 3-4 साल का होता है जो कि सामान्य फसलों के मुकाबले अधिक है। इसलिए किसानों को हैंड होल्डिंग की जरूरत पड़ती है। यही कारण है कि बड़े पैमाने पर किसी मदद के बिना किसान के लिए ताड़ की खेती करना संभव नहीं है। इस खेती में कैमिकल, पेस्टिसाइड का इस्तेमाल, बड़ी मशीनों का उपयोग, अधिक जल दोहन के साथ-साथ तेल निकालने के बाद वेस्ट मैनेजमेंट और रीसाइक्लिंग के लिए भी काफी निवेश की जरूरत पड़ती है।

भारत सरकार ने 18 अगस्त, 2021 को नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल – ऑयल पाम को मंजूरी दी थी। इसके लिए पूर्वोत्तर भारत के राज्यों और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में ताड़ की खेती के लिए 11,040 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना है। इसमें केंद्र सरकार 8,844 करोड़ रुपये और राज्य सरकारें 2,196 करोड़ रुपये खर्च करेंगी। योजना का मकसद देश में पाम ऑयल का उत्पादन बढ़ाकर खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता को कम करना है। पिछले साल भारत के करीब 75 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के खाद्य तेलों का आयात हुआ है। ऐसे में भारत सरकार की सोच है कि इंपोर्ट बिल को कम करने के लिए देश में ही ताड़ की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाए। इससे देश खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भर बन सकेगा। भारत में फिलहाल लगभग 3.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ताड़ की खेती होती है जिसे 2025-26 तक बढ़ाकर 10 लाख हेक्टेयर करने का लक्ष्य रखा गया है। बताया जा रहा है कि पाम ऑयल मिशन से कृषि में निवेश बढ़ेगा और छोटे किसानों की आय, क्षमता और रोजगार के अवसरों में इजाफा होगा।

अन्य तिलहन फसलों जैसे मूंगफली, सरसों, नारियल के मुकाबले ताड़ की खेती में 10-46 गुना ज्यादा तेल प्रति हेक्टेयर निकलता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इंपोर्ट बिल कम करना और उत्पादकता बढ़ाना ही एकमात्र लक्ष्य है जिसके लिए इतना बड़ा नीतिगत फैसला ले लिया गया? क्या इस योजना के जैव विविधता, पर्यावरण, खाद्य सुरक्षा और जन स्वास्थ्य पर प्रभाव का आकलन किया गया है?

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने पाम ऑयल मिशन के बारे में कहा है कि ताड़ की खेती साइंटिफिक स्टडी पर आधारित है। इससे प्रकृति में संतुलन बैठेगा। कुल 28 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होने वाली खेती में से नॉर्थ ईस्ट में लगभग 9 लाख हेक्टेयर में ही ताड़ की खेती प्रस्तावित है। इसलिए इसमें डर कैसा? इस पर भोगतोराम मावरोह कहते हैं, “हमारा इलाका पूरे भारत के सामने बहुत छोटा है, उस लिहाज़ से 9 लाख हेक्टेयर में ताड़ की खेती करना हमारे लिहाज से बहुत बड़ा रकबा होगा। भारत में 33 फीसदी वन क्षेत्र होना चाहिए लेकिन पर्वतीय क्षेत्र होने की वजह से पूर्वोत्तर भारत में 60 फीसदी वन क्षेत्र है। ऐसे में ताड़ की खेती के लिए जमीन कहां से आएगी? पहाड़ी इलाकों में अभी भी खेती होती है। क्या उस जगह पर ताड़ की खेती होगी? इसका जैव-विविधता और खाद्य सुरक्षा पर क्या असर पड़ेगा? किसी ने सोचा है?’’

भोगतोराम आगे मानते हैं, “इंडस्ट्रीयल प्लांटेशन लाकर आप मोनोकल्चर यानी एक ही तरह की फसल को बढ़ावा देंगे जो कि पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा के लिए हानिकारक है। एक तरफ नीति आयोग कहता है कि सतत विकास लक्ष्य (SDG) की तरफ अगो बढ़ना है। जलवायु परिवर्तन का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। ऐसे में पर्यावरण को बचाने की जरूरत है या फिर बड़े पैमाने पर ताड़ की खेती को बढ़ावा देकर मोनोकल्चर अपनाने की? इस मामले में सरकारी नीतियों में विरोधाभास क्यों है?”

यह सवाल यह भी उठता है कि जो किसान जैव-विवधता वाली परंपरागत खेती से अपना गुजारा कर रहे हैं उन्हें पौष्टिक खान-पान और फसल विविधता से दूर क्यों किया जा रहा है? भोगतोराम के मुताबिक, “हम झूम खेती में दर्जनों तरह की फसलें उगाते हैं। हमारे छोटे किसानों को एमएसपी का लाभ क्यों नहीं मिलता? जो हम उगाते हैं उसी खेती को लाभकारी बनाने को लेकर सरकार गंभीर क्यों नहीं है? ताड़ की खेती के भरोसे सतत विकास लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा समाज और पर्यावरण पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा।”

मेघालय की सांसद अगाथा संगमा ने भी पाम ऑयल मिशन को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। इस बारे में उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को चिट्ठी लिखकर इस फैसले पर दोबारा विचार करने का अनुरोध किया है। पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में अधिकतर खेती की जमीन गांव की होती है और ग्राम पंचायत से जमीन पट्टे पर लेकर किसान खेती करते हैं। किसानों को आशंका है कि अगर ताड़ की खेती बड़े पैमाने पर होगी तो जमीन कॉरपोरेट्स के हाथों में चली जाएगी। इस तरह भूमि पर समुदाय का स्वामित्व खत्म हो जाएगा। पाम ऑयल मिशन के कारण किसानों को उनकी जमीन से बेदखल किए जाने का डर है।

इंडोनेशिया के आदिवासी समाज ‘दायक’ का अनुभव भी कुछ इसी तरह का रहा है। वहां के आदिवासियों से ताड़ की खेती के लिए जमीन ली गई थी। बाद में खेती की रखवाली के लिए उसी समाज के लोगों को सुरक्षा गार्ड की नौकरी पर रखा गया। पाम ऑयल का उत्पादन बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ने से पहले इंडोनेशिया के अनुभवों पर गौर करना चाहिए। इस साल अप्रैल में श्रीलंका ने पाम ऑयल के आयात पर पाबंदी लगा दी है और धीरे धीरे ताड़ की खेती की बजाय रबर की खेती को बढ़ावा देने की बात कही जा रही है। यूरोपीय संघ भी 2018 में इसी तरह का कदम उठा चुका है। जबकि भारत सरकार ताड़ की खेती को बढ़ावा देने के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर रही है। इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) जैसी व्यवस्था लागू करने की तैयारी है। इसके अलावा प्रति हेक्टेर सहायता राशि जैसे प्रोत्साहन देने की योजना है।

उत्तर पूर्वी राज्यों में चाय बागान की स्थिति पर शोध कर रहे जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के स्कॉलर अंगशुमान सरमा कहते हैं, “भले ही सरकार ने ताड़ की खेती के मामले में पूर्वोत्तर में एमएसपी जैसी व्यवस्था देने का वादा किया है लेकिन यह सब एक दिखावा है। किसानों ने ऐसा कुछ मांगा नहीं और आगे यह मिलेगा इसकी गारंटी भी नहीं है। सरकार कई फसलों के लिए एमएसपी की घोषणा करती है लेकिन किसानों को एक तो यह मिलता नहीं, दूसरी यह नाकाफी है।” अंगशुमान बताते हैं कि चाय की खेती कर रहे छोटे किसानों के लिए भी मिनिमम बेस प्राइस घोषित है लेकिन वो भी किसान को नहीं मिलता है। कुछ ऐसा ही हाल ताड़ की खेती करने वाले किसानों का भी हो सकता है।” वह मानते हैं कि देश की खाद्य सुरक्षा, खाद्य संप्रभुता और जैव विविधता पर इस मिशन का प्रतिकूल प्रभाव होगा।

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