आखिर कितना असरदार है छत्तीसगढ़ सरकार का मंडी संशोधन विधेयक

पंजाब के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने भी केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ कदम उठाने वाला दूसरा राज्य बन गया है। लेकिन सवाल यह है कि भूपेश बघेल सरकार का ये कदम कितना असरदार है और किसानों को कितनी राहत देने वाला है।

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माना जा रहा था कि जैसे पंजाब सरकार ने तीन कानून के असर को निष्क्रिय करने के लिए अपने खुद के नए तीन विधेयक पेश किए हैं ठीक उसी तरह बाकी के कांग्रेस शासित राज्य भी उसी मॉडल का अनुसरण करेंगे, इस दिशा में छत्तीसगढ़ ने मौजूदा मंडी कानून में संशोधन का प्रस्ताव पेश किया है। 27- 28 अक्टूबर को हुए विधान सभा के विशेष सत्र में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की कैबिनेट ने छत्तीसगढ़ कृषि उपज मंडी समिति (संशोधन) विधेयक, 2020 सामने रखा जो ध्वनिमत से पारित हो गया। 

इस विधेयक को लेकर छत्तीसगढ़ के कृषि मंत्री रविंद्र चौबे ने कहा कि जो प्रस्तावित अधिनियम है यह किसानों की रक्षा करेगा और केंद्र द्वारा पेश कानूनों से किसी भी लड़ाई में नहीं उलझेगा। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस विधेयक के किसान हितैषी होने का दावा किया है। अगर यह विधेयक कानून बन जाता है तो ये 5 जून से पूरे राज्य में लागू माना जाएगा।

इस विधेयक के उद्देश्य को सामने रखते हुए सरकार ने कहा कि प्रदेश में 80% लघु और सीमांत किसान हैं, जिनके पास खेती बाड़ी से उपजी फ़सल का उचित भंडारण और मोल-भाव करने  की क्षमता नहीं है , उन्हें बाजार के उतार चढ़ाव से उपजे जोखिम से बचाना जरूरी है। उपज की गुणवत्ता के आधार पर सही क़ीमत मिले, सही तोल हो और समय पर भुगतान दिलाने के लिए पूरे राज्य को नोटिफ़ायड कृषि बाज़ार के साथ-साथ डीम्ड मंडी का कॉन्सेप्ट और इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लैटफॉर्म की स्थापना आवश्यक हो गई है इसलिए कृषी उपज मंडी अधिनियम, 1972 में संशोधन करने का निश्चय किया गया है।

पंजाब ने जहां पूरे इलाके को मंडी यार्ड घोषित करने का प्रस्ताव सामने रखा है। वहीं सेक्शन 4 के तहत छत्तीसगढ़ सरकार राज्य के किसी भी हिस्से को एक नोटिफ़िकेशन के द्वारा मंडी घोषित कर सकती है, ये इलाका मंडी का इलाका जहां कृषि उपज की खरीद बिक्री, प्रसंस्करण या विनिर्माण हो रहा हो या फिर वेयरहाउस, साइलोज, भंडार घर, इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लैटफॉर्म या डीम्ड मंडी हो सकती है। एक तरह से कृषि जोकि संघीय ढांचे में राज्य सरकार का विषय है, यहां छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने आप को और सशक्त बना दिया है। साथ ही डीम्ड मंडियां भी बना दी है जिसका मकसद यही है कि नोटिफिकेशन लाकर उस इलाके को भी मंडी के नियमों के अधीन लाया जाए, इस तरह निजी मंडियों को मंडी नियमन के अधीन लाने की तैयारी की गयी है।

इसके लिए मंडी बोर्ड या मार्केट कमेटी सेक्रेटेरी या उपयुक्त अधिकारी को तमाम तरह की शक्तियां दी गयी हैं, नए सेक्शन 20 (A) को जोड़ा गया है। जिसके तहत  कृषि उपज की बिक्री, खरीद फरोख्त, भंडारण या व्यावसायिक दृष्टि से इस काम में लगा है उसे अपने अकाउंट्स और रजिस्टर दिखाने होंगे, सारी एंट्रीज़ चेक की जा सकती हैं, यहां तक की गाड़ियों का औचक निरीक्षण हो सकता है और जरूरत पड़ने पर अभिग्रहण यानी  सीजर की शक्ति भी प्रदान की गयी है।

कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर, 1973 के सेक्शन 100 के तहत राज्य सरकार की तरफ से मंडी बोर्ड या मंडी सचिव को तलाशी लेने की इजाजत है। अगर कोई व्यापारी या व्यक्ति जो कृषि उपज की ख़रीद बिक्री से जुड़ा है वह जानबूझकर गलत जानकारी दे रहा है, या उसे छिपा रहा है या फिर खरीद से जुड़ी सही जानकारी अकाउंट बुक्स में दर्ज नहीं कर रहा या दर्ज की गयी जानकारी से ज्यादा या कम उपज अपने पास रख रहा है। अगर ऐसा करते हुए कोई दोषी पाया जाता है तो उसे तय समय के लिए जेल हो सकती है। जो कि 3 महीने आगे बढ़ाई जा सकती है, साथ में 5000 रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है। अगर इस सजा का उल्लंघन होता है या ऐसी गलती दोबारा की जाती है तो ये सजा 6 महीने के लिए बढ़ सकती है और जुर्माने की रकम भी पहले से बढ़कर 10 हजार रुपये हो सकती है या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

हालांकि जिस तरह से पंजाब द्वारा लाए गए विधेयकों से इसकी तुलना की जा रही है उस लिहाज से किसानों की सबसे बड़ी मांग यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी के मसले पर यह विधेयक चुप है। पंजाब की तर्ज पर एमएसपी से नीचे खरीद को दंडनीय बनाने या उसे बाध्यकारी बनाने के मुद्दे पर इस विधेयक में कोई ज़िक्र नहीं है। इस पर छत्तीसगढ़ किसान सभा के प्रदेश अध्यक्ष संजय पराते की तीखी प्रतिक्रिया आयी है। उनका कहना है कि ‘ राज्य सरकार ने कृषि कानून पर पूरी लफ्फाजी पेश की है। एमएसपी की गारंटी लाने के लिए कुछ नहीं किया है। अपना राजस्व बढ़ाने के लिए मंडी शुल्क इकट्ठा करने का इंतजाम राज्य सरकार ने जरूर कर लिया है। सुना तो यह भी था कि एक दिन पहले तक समर्थन मूल्य को बाध्यकारी बनाने का ड्राफ्ट तैयार हुआ था लेकिन जब विधेयक पेश हुआ तो उसमें ऐसा कुछ भी नहीं निकला।’  

उन्होंने कहा कि ‘डीम्ड मंडियों के नाम पर निजी मंडियों के नियमन करने को और एमएसपी के सवाल पर यह चुप्पी सरकार का कॉर्पोरेट परस्त रुख दर्शाता है और यह सरकार द्वारा राज्य के किसानों के साथ धोखाधड़ी है।’

जब पूछा गया कि क्या केंद्र के कृषि कानून से तकरार की स्थिति से बचने के लिए विधेयक का यह प्रारूप पेश किया है, तो उस पर संजय पराते कहते हैं कि ‘उल्टा राज्यों के साथ केंद्र ने टकराव लिया है, यदि केंद्र के कानून के प्रभावों को निष्प्रभावी करना है तो निश्चित रूप से राज्यों को बोल्ड स्टेप्स उठाने होंगे और केंद्र के साथ टकराव की स्थिति में जाना ही पड़ेगा।‘

जहां तक बिल में 20 (A) सेक्शन के तहत सजा के प्रावधान जोड़े जाने की बात है उस पर उनका कहना है कि राज्य सरकार घोषित एमएसपी पर ही खरीद नहीं कर पाती है, सरकारी मंडी के अंदर ही एमएसपी नहीं मिल पाता है, खरीदे हुए माल का भुगतान समय पर नहीं हो रहा है। बड़े पैमाने पर किसानों में असंतोष है, उन्हें लूटा जा रहा है। जब सरकारी मंडियों का नियमन ठीक से नही हो पा रहा है तो निजी मंडियों के नियमन के नाम पर डीम्ड मंडी लाकर उन की मॉनिटरिंग का दावा कैसे कर सकते हैं?’

विधेयक में क्वालिटी पर ध्यान देते हुए किसानो को ई-ट्रेड प्लैटफॉर्म के जरिए पारदर्शी नीलामी प्रक्रिया से भी फायदा दिलाने का प्रस्ताव पेश किया गया है। क्वालिटी के आधार पर किसानो को बेहतर भाव मिले, समय पर ऑनलाइन भुगतान हो इसका प्रावधान किया गया है। पंजाब से ही तुलना की जाए तो कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग और आवश्यक वस्तु अधिनियम को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार ने अभी तक इस दिशा में कोई फैसला नहीं लिया है।

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