हरियाणा: बरोदा उपचुनाव में कितना भारी पड़ेगा किसानों का गुस्सा

बरोदा विधान सभा सीट पर 3 नवंबर को मतदान होगा। सभी पार्टियां जीत के लिए पूरी ताकत लगा रही हैं लेकिन कृषि कानून के खिलाफ चल रहे विरोध के बीच किसानों के मन में आखिर क्या चल रहा है।

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हरियाणा: बरोदा उपचुनाव में कांग्रेस की जीत, किसानों ने जो कहा था वही हुआ

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हरियाणा: खट्टर सरकार ने बढ़ाए गन्ने के दाम, किसानों ने कहा दस रुपये बेहद कम

हरियाणा की खट्टर सरकार ने गन्ने की कीमत में बढ़ोतरी का ऐलान किया है। सोमवार को सीएम मनोहर लाल खट्टर ने गन्ने...

हरियाणा में केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ लगातार विरोध जारी है। राज्य की खट्टर और केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ किसानों का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसे में राज्य की बरोदा विधान सभा सीट के लिए तीन नवंबर को होने वाला उपचुनाव सत्ताधारी बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। कृषि कानूनों के खिलाफ 27 सितंबर को हुई 54 गांवों की महापंचायत के बाद ऐसा लग रहा है कि किसानों ने बीजेपी के खिलाफ इस इलाके में कमर कस ली है। किसानों को यह भी दिखाना है कि कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन सड़क से ईवीएम मशीन तक कैसे बीजेपी सरकार के लिए नुकसान पहुंचाने वाला बन सकता है।

चुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिए प्रत्येक प्रत्याशी और पार्टी जोरशोर से प्रचार प्रसार कर रही है। राज्य में दोबारा सीएम बने मनोहर लाल खट्टर की इस सरकार ने एक साल भी पूरा कर लिया है। बरोदा विधान सभा क्षेत्र के कुछ गांवों के लोगों और किसान संगठनों से बातचीत करके हमने यह जानने की कोशिश की कि आखिर उपचुनाव में कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का गुस्सा कितना असर डाल सकता है।

बरोदा विधान सभा के अंतर्गत 54 गांव आते हैं। इन गांवों में किसान केंद्र की मोदी सरकार के कृषि कानूनों से नाराज हैं और लगातार इन्हें वापस लेने की मांग कर रहे हैं। कृषि कानूनों के खिलाफ इन गांवों ने 27 सितंबर को एक महापंचायत भी बुलाई थी, जिसमें बीजेपी नेताओं के बहिष्कार की बात कही गई थी। राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन इस इलाके में गांव गांव जाकर महापंचायत के फैसले के बारे में लोगों को बता रहा है साथ ही कृषि कानूनों के बारे में भी जागरुकता फैलाई जा रही है।

सोनीपत के गोहाना तहसील में गढ़वाल गांव के रहने वाले अमरजीत सिवास ने हिंद किसान से बातचीत में कहा, ‘अब इस सरकार पर हमें भरोसा नहीं है तो हम बीजेपी को वोट क्यों देंगे। कृषि कानूनों से किसानों को बहुत नुकसान होने वाला है लेकिन हमारी बात कोई नहीं सुन रहा। सरकार एमएसपी पर खरीद की बात कह रही है, लेकिन पिछले साल हमें धान का भाव 3500 से 3600 रुपये प्रति क्विंटल मिला था और इस बार 1700 से 1800 रुपये प्रति क्विंटल। किसानों को लगातार नुकसान हो रहा है। खाद, बिजली, तेल के दाम बढ़ गए हैं लेकिन किसानों की आमदनी कम होती जा रही है। बीजेपी सरकार ने किसानों की नाक में दाम कर दिया है।‘

अमरजीत के बयान से उनकी नाराजगी साफ समझी जा सकती है। उनकी ही तरह गांव के अन्य लोग भी सरकार से अपनी नाराजगी बयां करते हैं। बरोदा विधान सभा के गिवाना गांव में रहने वाले मोहित खरब ने हिंद किसान से बातचीत में कहा, ‘हम महापंचायत का फैसला मानेंगे और जो किसानों के हित में बात करेगा इस बार वोट उसी को देंगे। बीजेपी सरकार की कोशिश है कि आने वाले समय में किसानों की पीढ़ी खत्म कर दी जाए। मोदी जी बार-बार ट्वीट करके कह रहे हैं कि एमएसपी पर खरीद जारी रहेगी तो यह बात सरकार लिखित में क्यों नहीं देती यही तो हमारी मांग है।‘

मोहित कहते हैं कि ‘बीजेपी के नेता वोट मांगने के लिए आते हैं तो वे किसानों के सवालों का जवाब तक नहीं दे पाते। बीजेपी का कोई नेता ये तक नहीं कहता कि कृषि कानून किसानों के हित में हैं।‘ वे कहते हैं कि ‘विकास के मामले में भी खट्टर सरकार ने कुछ नहीं किया। हमारे गांव में न स्कूल है, न सड़क है हर जगह भ्रष्टाचार है। बीजेपी ने हर खेत में एग्रीकल्चर पावर लाइन का वादा किया था लेकिन अब तक किसी भी खेत में यह काम नहीं हुआ। गांव में पीने के पानी की भी किल्लत है।‘

राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के कार्यकर्ता 23 सितंबर से ही गांव गांव में जा कर कृषि कानूनों के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। संगठन के हरियाणा में प्रदेश अध्यक्ष अक्षय नरवाल ने हिंद किसान से फोन पर बातचीत में कहा, ‘सभी 54 गांवों में हम कृषि कानूनों के बारे में किसानों को जागरुक कर रहे हैं। किसानों को कानूनों से होने वाले नुकसान के बारे में बता रहे हैं। हमारे संगठन के साथी अभिमन्यु कोहाड़ ने एक किताब भी लिखी है जिसे हम किसानों को दे रहे हैं, ताकि वे इन कानूनों के बारे में बारीकी से समझ सकें।‘

अक्षय नरवाल से किसानों के रुख के बार में पूछने पर उन्होंने बताया, ‘किसान पूरी तरह से कृषि कानूनों से नाराज हैं। अभी किसान बाजरा की फसल लेकर मंडी जा रहा है तो किसान इस बात को समझ रहे हैं कि सरकार का एमएसपी का दावा कितना खोखला है। बाजरे की खरीद नहीं हो रही है और भाव लगातार गिरता जा रहा है। इन सब वजहों से किसान बीजेपी सरकार से नाराज हैं।‘

राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ के प्रवक्ता अभिमन्यु कोहाड़ ने केंद्र के कृषि कानूनों पर एक किताब लिखी है जिसका नाम है ‘तीन कृषि कानून किसानों की मौत के फरमान’। अभिमन्यु कोहाड़ ने हिंद किसान को बताया कि अभी तक उनकी 2 हजार से ज्यादा किताबें बांटी गई हैं। किताब में कृषि कानूनों से होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी दी गई है।

अभिमन्यु कोहाड़ कहते हैं, ‘हमने कृषि कानूनों को पढ़ कर और शोध करने के बाद इसे किताब की शक्ल में पेश किया है। हमारी मांग एमएसपी की गारंटी देने की है और यह लड़ाई चलेगी। इसके लिए हमें किसानों को पूरी तरह जागरुक करना होगा। इस किताब में मैंने पुरानी और मौजूदा सरकार की नीतियों और घटनाओं का जिक्र भी किया है। लंबे समय के बाद पूरे देश के किसानों में आंदोलन का उत्साह दिख रहा है। हमारी कोशिश है कि किसान हर तरह से जागरुक रहे।

वे कहते हैं कि ‘बरोदा में बीजेपी पहले ही हार मान चुकी है। वह किसानों के मुद्दे से इस चुनाव को भटकाना चाहती है लेकिन जातिवादी जहर फैलाने में उसकी अब तक की कोशिश नाकाम रही है। किसान इस बार किसानों के मुद्दे पर ही वोट डालेंगे।‘

करीब पौने दो लाख मतदाताओं वाली इस विधान सभा सीट से कुल 20 उम्मीदवार मैदान में हैं। लेकिन सीधा मुकाबला चार उम्मीदवारों के बीच है। बीजेपी की तरफ से अंतरराष्ट्रीय पहलवान योगेश्वर दत्त मैदान में हैं तो वहीं कांग्रेस की तरफ से इंदुराज नरवाल और इनेलो के जोगिंदर मलिक दावेदारी कर रहे हैं तो लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी के अध्यक्ष राजकुमार सैनी मैदान में हैं। कांग्रेस यहां छह बार चुनाव जीत चुकी है। कांग्रेस विधायक श्रीकृष्ण हुड्डा के निधन के बाद इस सीट पर उपचुनाव हो रहे हैं।

हालांकि हर पार्टी और प्रत्याशी जीत के लिए जोर लगा रहे हैं। लेकिन देखना होगा कि किसानों के विरोध और रुख का मतदान पर कितना असर पड़ता है।

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