मोदी सरकार ने आंदोलन कर रहे किसान संगठनों को बातचीत का न्योता भेजा

इस बुलावे को ज़्यादातर किसान संगठनों ने स्वीकार कर लिया है। इसके लिए 29 किसान संगठनों ने आपसी सलाह के बाद सात सदस्यों की एक टीम बनाई है ।

महिला किसान दिवस पर उनके ‘मन की बात’

'महिला किसान दिवस' पर सुनिए ख़ास बातचीत, आदिवासी महिलाओं के जल, जंगल और ज़मीन के अधिकार को लेकर उनके संघर्ष और तीनों विवादित कृषि क़ानून से क्या हैं महिला किसानों के लिए आगे की चुनौतियाँ, क्या हैं डर? हिंद किसान ने AIl India Union for forest working People (AIUFWP) और आदिवासी अधिकारों से जुड़ी ऐक्टिविस्ट- #RomaMalik और UN Secy General के Youth advisory group on Climate Change की भारत से सदस्य, उड़ीसा की #ArchnaSoreng से बातचीत की।

किसान आंदोलन में कितनी ऐक्टिव हैं महिलाएँ?

जब दिल्ली के बॉर्डर्ज़ पर किसान और जनता खेती के मुद्दों और तीन कृषि क़ानून की वापसी को लेकर डटे हुए हैं, हिंद किसान ने राजधानी दिल्ली के बॉर्डर से दूर, राजस्थान के झुनझुनू से एक महिला ऐक्टिविस्ट से बातचीत की। ये तमाम महिलाओं के साथ collectorate पर धरना दे रही हैं , उनसे जाना कि तीनों कृषि क़ानून पर बने गतिरोध पर उनकी क्या प्रतिक्रिया है, आंदोलन को लेकर उनकी क्या तैयारी है? सुनिए उनकी मोदी जी से सीधी माँग- बात सीधी, मगर तीखी।

सरकार दिखा रही बड़प्पन, फिर फ़ैसले में देरी क्यूँ?

'सीधी मगर तीखी बात' में पूर्व कृषि मंत्री, सोमपाल शास्त्री जी की कृषि क़ानून पर सरकार की तरफ़ से मामले को सुलझाने के रवैये पर बेबाक़ राय। 15 जनवरी को किसानों और सरकार के बीच 9वे राउंड की वार्ता में कृषि क़ानून पर एक बार फिर कोई सहमति नहीं बन पायी, अगली तारीख़ 19 जनवरी की तय हुई है। किसानों ने शांतिपूर्ण आंदोलन को और तेज़ करने का संदेश दे दिया है।मामले में नए पेंच जुड़ रहे हैं, सुनिए ये ख़ास बातचीत।

वार्ता की मिली नयी तारीख़, कब बनेगी बात?

१५ जनवरी को कृषि क़ानून को लेकर सरकार और किसान की वार्ता एक बार फिर बेनतीजा रही, नयी तारीख़ १९ जनवरी तय हुई है, MSP के मुद्दे पर सरकार बचती रही जबकि उसी पर निर्णायक फ़ैसला लेने के मन से आए थे संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य, आख़िर कब तक टलता रहेगा MSP का मुद्दा और MSP के अलावा भी क्यूँ ज़रूरी हैं बाक़ी मुद्दे? क्या होगा आगे?

SC के आदेश से सुलझेगा या उलझेगा मामला?

SC ने १२ जनवरी को ३ कृषि क़ानून को अमल में लाने पर अगले ऑर्डर तक रोक लगा दी है, एक कमेटी का भी गठन कर दिया है ताकि ज़मीनी हालात का जायज़ा लिया जा सके, एक तरह से जो काम सरकार तमाम बैठकों के बावजूद नहीं कर पायी, कृषि क़ानून पर बने डेड्लाक को ख़त्म नहीं कर पायी उस पर एक कदम आगे बढ़ते हुए, SC ने ऑर्डर जारी कर दिया, क्या किसानों को स्वीकार है ये ऑर्डर? कौन है इस समिति के सदस्य, कितना सही है ये फ़ैसला? सुनिए महाराष्ट्र के Farm Activist - Vijay Jawandhia जी से ये ख़ास बातचीत।

केंद्र के तीनों कृषि कानूनों को काला कानून बताने वाले पंजाब के 29 किसान संगठनों को मोदी सरकार ने बातचीत के लिए न्यौता भेजा है। यह दूसरा मौका है जब सरकार ने किसान संगठनों के सामने बातचीत की पेशकश रखी है। हालांकि, इसके पहले केंद्रीय कृषि सचिव ने रेल रोको आंदोलन चला रहे किसान संगठनों को दिल्ली आकर बात करने की चिट्ठी लिखी थी, जिसे किसानों ने नहीं माना था। लेकिन इस बार खास बात यह है कि यह चिट्ठी केंद्र सरकार की ओर से कृषि मंत्रालय ने भेजी है।

हिंद किसान को मिले आधिकारिक पत्र पर इसे भेजने की तारीख 10 अक्टूबर, 2020 दर्ज है। इस चिट्ठी में कृषि सचिव ने भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की तरफ से पंजाब की 29 किसान यूनियन को बुलाया है. यह बातचीत 14 अक्टूबर, 2020 को दिल्ली में सुबह 11:30 बजे कमरा संख्या-42 में होनी है। चिट्ठी में कहा गया है कि पंजाब में विगत दिनों से कृषि संबंधी विषयों को लेकर किसान आंदोलन कर रहे हैं, भारत सरकार कृषि को लेकर गंभीर है, इसलिए केंद्र सरकार वार्ता के लिए उत्सुक है।

बातचीत के इस बुलावे को ज़्यादातर किसान संगठनों ने स्वीकार कर लिया है। इसके लिए 29 किसान संगठनों ने आपस में सलाह के बादसात सदस्यों की एक टीम बनाई है जो केंद्र सरकार के सामने अपने तर्कों और मांगों को रखेगी।

13 अक्टूबर को चंडीगढ़ में हुई किसान संगठनों की बैठक में यह फ़ैसला लिया गया कि इस मुलाकात के दौरान किसान संगठनों का एक साझा मांगपत्र भी प्रधानमंत्री को सौंपा जाएगा, जिसमें तीनों कृषि क़ानून को वापस लेने और उसकी जगह पर सभी किसानों को उनकी फ़सलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी देने वाली नीति, योजना और क़ानून बनाने की मांग शामिल है।

किसानों ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के आधार पर फसल लागत के सी-2 (कॉप्रहेंसिव कॉस्ट) फॉर्मूले के हिसाब से अनाज और दूसरी फ़सलों की डेढ़ गुना एमएसपी तय करने की मांग की है। साथ ही कृषि उत्पादों के ‘गुणवत्ता मानकीकरण’ के लिए निजी एजेंसी की जगह एक निष्पक्ष सरकारी एजेंसी लाने की मांग उठाई है। इसके अलावा सरकार की ओर से किसान सहकारी खाद्य प्रसंस्करण यूनिट्स बनाने की भी मांग की गई है जो कृषि क्षेत्र को नॉन-प्रॉफ़िट (अलाभकारी) सेक्टर की जगह प्रॉफ़िट कमाने वाले (लाभकारी) सेक्टर में तब्दील कर सके।

केंद्र सरकार से बातचीत के लिए गठित किसान संगठनों की सात सदस्यीय टीम में शामिल भारतीय किसान यूनियन (डकौंदा) के सदस्य जगमोहन सिंह भट्टी ने हिंद किसान को फ़ोन पर बताया, ‘जब सरकार दबाव में है तो हमने फ़ैसला लिया है कि हमें जाना चाहिए और बातचीत करनी चाहिए।’ यह पूछे जाने पर कि उन्हें कितनी उम्मीद है कि उनकी बात सुनी जाएगी, उन्होंने कहा, ‘हम बहुत ज़्यादा उम्मीद लेकर नहीं जा रहे, अगर हमारी मांग नहीं मानी गयी तो प्रदर्शन जारी रहेगा, जगह- जगह रेल रोको, टोल प्लाज़ा, रिलायंस के पेट्रोल पंपों पर कब्जा करना, मोबाइल सेवा जियो का बहिष्कार और तेज़ी पकड़ेगा। लेकिन हम राजनीति का हिस्सा नहीं बनेंगे,  हम पूरे देश के किसान की लड़ाई और प्रतिनिधित्व करने जा रहे हैं, हम केवल पंजाब के लिए पैकेज की मांग करने नहीं जा रहे हैं, यह देश के किसानों और आम जनता की भी लड़ाई है।’

केंद्र सरकार से बातचीत को लेकर हिंद किसान ने जब पंजाब में रेल रोको आंदोलन की अगुवाई कर रहे किसान मज़दूर संघर्ष समिति के प्रदेश सचिव सरवन सिंह से फ़ोन पर प्रतिक्रिया ली तो उन्होंने सरकार के इस बुलावे को किसानों के बीच फूट डालने वाला बताया। उन्होंने कहा, ‘काले कृषि क़ानून को लेकर ना केवल पंजाब, बल्कि देश भर के किसान संगठन नाराज़ हैं। अगर सरकार को बातचीत के लिए बुलाना है तो सभी संगठनों को बुलाना चाहिए, एक साथ सलाह मशविरा करना चाहिए।’ सरवन सिंह ने यह भी कहा, ‘हमारा मानना है कि बड़ी-बड़ी बातें टेबल पर बातचीत से सुलझ सकती हैं, लेकिन जिस तरह से केंद्र सरकार के मंत्री इन क़ानून को लेकर बातें कर रहे हैं, उससे लग नहीं रहा कि यह मामले को बातचीत से सुलझाना चाहते हैं,  यह बातचीत कम, केंद्र की साज़िश ज़्यादा लगती है। बात तो तब बने जब ख़ुद पीएम बात करें, क़ानून के ख़िलाफ़ तो वही फ़ैसला ले सकते हैं।’

कृषि कानूनों को लेकर लगातार जारी किसान आंदोलनों से दबाव में आई केंद्र सरकार लगातार बैठकें कर रही है। सूत्रों से मिली जानकारी है कि मंगलवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के घर भी बैठक हुई, जिसमें कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी शामिल हुए. इसके अलावा सरकार कुछ चुनिंदा किसान संगठनों के साथ भी बैठक करके यह जताने की कोशिश कर रही है कि वह बातचीत से इस विवाद को सुलझाने में जुटी है। लेकिन आंदोलन कर रहे किसान संगठन इस पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार जिन किसानों या किसान संगठनों से बात कर रही है, क्या वे वाकई किसान हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं?

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