आत्महत्या के बाद भी नहीं मिला मुआवजा, प्रशासन ने परिजनों से मांगे किसान होने के सबूत

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‘किसान बचाओ, देश बचाओ’

‘किसान आत्महत्या को सरकार तुम मान लो’

ओडिशा के जजपुर जिले में जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर बैठ कर किसानों ने एक दिन का सत्याग्रह किया और अपने साथी किसान रमाकांत मलिक की आत्महत्या के एवज़ में उसके परिवार को न्याय दिलाने और मुआवज़ा राशि देने की गुहार लगाई। बाढ़ के कारण फ़सल चौपट होने की वजह से जजपुर जिले के बरपदा गांव में रहने वाले किसान रमाकांत मलिक (53) ने फसल नुकसान और कर्ज के बोझ तले आत्महत्या कर ली। लेकिन प्रशासन रमाकांत को किसान मानने से इंकार कर रहा है और उसका प्रमाण मांग रही है।

जिलाधिकारी दफ्तर के बाहर प्रदर्शन करते किसान

परिजनों के मुताबिक बरपदा गांव में रहने वाले रमाकांत पांच एकड़ ज़मीन किराए पर लेकर खेती करते थे। लेकिन पिछले दिनों आई बाढ़ से पूरी खेती बर्बाद हो गई, उन्होंने बकायदा खेती के लिए साहूकार से 80 हजार रूपये का कर्ज लिया हुआ था, यहां तक की 2 बैल, गाय बेच डाली और बीवी के गहने समेत ये तमाम पूंजी खेती में लगा दी लेकिन जब रमाकांत को नुकसान से उबरने का कोई और रास्ता ना सूझा तो उन्होंने मायूस होकर मौत को गले लगा लिया। उनका एक बेटा होटल में काम करता है और दूसरा बच्चा विकलांग है, परिवार के पास जीवन यापन का और कोई दूसरा साधन भी नहीं है।

धरने पर बैठे राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष, सचिन महापत्रा ने हिंद किसान से फोन पर हुई बातचीत में ये जानकारी दी कि 12 अक्टूबर  को जिलाधिकारी रमाकांत की पत्नी से मिले और उन्हें एक अर्ज़ी देने के लिए कहा जिसके आधार पर प्रशासन की तरफ़ से 30 हज़ार रूपए देने की बात कही गई है। लेकिन संगठन मुआवज़े के तौर पर 10 लाख रूपये दिए जाने की वकालत कर रहा है।

किसान रमाकांत की पत्नी ने जिलाधिकारी से कहा कि ‘हमारे पास कुछ भी नहीं है। अगर सरकार हमे मुआवजा नहीं देती तो वह पूरे परिवार के साथ आत्महत्या कर लेंगी।’  

सचिन महापात्रा ने हिंद किसान से ज़मीन के वो काग़ज़ात भी साझा करे जिनमें साफ़ है कि रमाकान्त किराए पर ज़मीन लेकर खेती करते थे। सचिन महापत्रा ने प्रशासन पर सवाल उठाया कि ‘बिना जांच किए,  बिना किसान की ज़मीन देखे-भाले, बिना उसके घर जाए प्रशासन ने ये डेटा कैसे दिखा दिया कि वो किसान नहीं था’।

राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि ‘ ओडिशा सरकार किसान आत्महत्या के आंकड़े छुपाने में माहिर है, आज तक उड़ीसा में किसान आत्महत्या का कोई आंकड़ा  नहीं है,  ये कहा जाता है कि कोई किसान ने आत्महत्या नहीं की है जो कि एक जुमला है,  कुछ महीने पहले बरग़द जिला में भी ऐसे ही घटना घटी थी, किसान ने खेत पर आकर ज़हर खा लिया और मौक़े पर ही दम तोड़ दिया, उस मामले में भी प्रशासन ये प्रमाणित करने में सफल हो गया था कि वो किसान नहीं है, ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं, क्योंकि इसमें सरकार की बदनामी होती है, नाकामी दिखती है इसलिए सरकार छुपाती है और आलम ये है कि इस देश में किसान को किसान होने का प्रमाण देना पड़ता है।’

हालांकि जब हिंद किसान की टीम ने जिलाधिकारी चक्रवर्ती सिंह राठौर से बात की तो उन्होंने कहा कि ‘अभी तक की जांच में ये साबित नहीं हो पाया है कि रमाकांत किसान थे। पीएम किसान योजना से लेकर खेती से जुड़ी किसी भी योजना में उनका रजिस्ट्रेशन नहीं है। उन्होंने बताया कि सोमवार को दो लोगों ने लिखित में दिया है कि रमाकांत उनकी जमीन पर खेती करते थे लेकिन उन लोगों की जमीन कुल मिला कर डेढ़ एकड़ है जबकि परिजन रमाकांत के पांच एकड़ जमीन में खेती करने का दावा कर रहे हैं।’ जिलाधिकारी ने कहा कि ‘फिलहाल मामले की जांच की जा रही है।’

ग्रामीणों और किसान संगठनों ने 14 अक्टूबर को ब्लाक का घेराव करने का ऐलान किया है। किसानों ने राज्य की नवीन पटनायक सरकार पर नदियों के तटबंधन टूटने और उनके रख रखाव में लापरवाही बरतने का आरोप लगाया। किसानों का कहना है की प्रशासन बाढ़ से बचाव के लिए आई रकम का सही इस्तेमाल नहीं करता जिससे कितने ही तटबंध हर साल टूटते हैं और उसका खामियाजा किसानों को उठाना पड़ता है।

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