न मंडी, न दाम! क्या करें बाजरा उगाने वाले किसान

सरकारी खरीद न होने से किसानों के सामने नुकसान पर फसल बेचने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं है। बाजरा उगाने वाले एक किसान कहते हैं कि पहले साग के साथ रोटी खाते थे, अब चटनी या छाछ के साथ खाएंगे। हो सकता है कि रूखी रोटी भी खानी पड़े।

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अच्छी सेहत के लिए मोटे अनाज की मांग लगातार बढ़ रही है। शहरों में लोग मोटे अनाज की खूबियों से प्रभावित हो रहे हैं, बाजरा इसमें प्रमुख है। उत्तर प्रदेश में बड़ी तादाद में किसान बाजरे की खेती करते हैं। राज्य सरकार की माने तो गेहूं, धान, मक्का के बाद बाजरा की फसल मुख्य है। गौतमबुद्ध नगर के खेतों से बाजरा अब मंडियों में पहुंचने लगा है या किसान कटाई की तैयारी में लगे हैं। लेकिन इन सबके बावजूद किसानों के हाथ खाली हैं। इसकी वजह है बाजरा का भाव।

बाजरा का न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी 2,150 रुपये प्रति क्विंटल है। लेकिन किसानों को हर एक क्विंटल पर हजार से 1100 रुपये तक का नुकसान हो रहा है। पिछले साल किसानों को बाजरा का अच्छा भाव मिला तो उनके चेहरे खिल गए लेकिन इस बार उन्हीं किसानों के चेहरों की हवाईयां उड़ी हुई हैं।

जेवर तहसील के मंगरौली गांव में रहने वाले मुकेश शर्मा ने करीब एक एकड़ जमीन पर बाजरे की खेती की है। फसल खेत से कट कर घर पर रखी है लेकिन मुकेश चाह कर भी उसे बेच नहीं रहे। हिंद किसान से फोन पर बातचीत में मुकेश शर्मा ने बताया कि, ‘हमारे इलाके में सरकारी दाम पर खरीद नहीं हो रही है।  न तो सरकारी खरीद केंद्र है और न ही मंडी, निजी व्यापारी खरीद करते हैं और दाम तय करने में उनकी मनमानी चलती है। बाजरा का सरकारी भाव 2150 रुपये है लेकिन हमें मुश्किल से 1300 से 1350 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है। हम परिवार और बच्चों को कैसे पालें? अगली फसल की तैयारी कैसे करें? कुछ समझ नहीं आ रहा। किसानों के पास आखिरी विकल्प तो आत्महत्या का ही है। मैंने अभी तक बाजरा नहीं बेचा है। हम बस इतना चाहते हैं कि कम से कम हमें अपनी फसल का सरकारी भाव ही मिल जाए।‘

मुकेश अकेले नहीं हैं, मथुरा के भेरई बांगर गांव के बनवारी लाल ने 14 बीघा जमीन पर बाजरा की खेती की। उन्होंने हिंद किसान को बताया, ‘1200 रुपये प्रति क्विंटल से भी कम भाव मिल रहा है। पिछले साल यही बाजरा 1700 रुपये प्रति क्विंटल में बेचा था। हमारे यहां से सरकारी मंडी दूर है निजी व्यापारी ही विकल्प हैं। किसान बहुत परेशान हैं, नुकसान में है। परिवार पालने के लिए अब मजदूरी ही करनी पड़ेगी।‘

बाजरा की सरकारी खरीद न होने से किसान अपने इलाके के निजी व्यापारियों को फसल बेचने के लिए मजबूर हैं। व्यापारी मांग में कमी होने का हवाला देकर किसानों को कम भाव दे रहे हैं। किसानों के सामने दूसरा कोई विकल्प नहीं है, मजबूरन वह उसी भाव में फसल बेच देते हैं।

जेवर के ही रामनेर गांव में रहने वाले संजय खेत में बाजरे की कटाई करा रहे हैं, लेकिन दाम की चिंता उन्हें भी सता रही है। उन्होंने हिंद किसान को बताया, ‘अभी तो बाजरा खेत में खड़ा है कटाई चल रही है। लेकिन जिन किसानों ने बाजरा बेचा है उन्हें बहुत कम भाव मिल रहा है। पिछले साल भाव ठीक मिला था। लेकिन इसबार व्यापारी कम बोली लगा रहे हैं। फसल कटने के बाद ज्यादा इंतजार नहीं कर सकते। पता नहीं किस भाव पर बेचना पड़ेगा।‘

सिर्फ बाजरा ही नहीं इससे पहले किसान मक्का और धान में भी खासा नुकसान उठा चुके हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि बाजरे का भाव किसानों के लिए घाव में नमक का काम कर रहा है। रामपुर डांगर गांव के संजय शर्मा ने कुछ ही दिन पहले मक्का और धान बेचा था, अब बाजरा से भी बचीकुची उम्मीदें टूट रही हैं। वह हिंद किसान को फोन पर बताते हैं, ‘पिछले साल के मुकाबले बाजरा का आधा भाव मिल रहा है। हमारे यहां सरकारी मंडी है नहीं प्राइवेट व्यापारी ही खरीद कर रहे हैं। जो भाव वह तय करते हैं उसी पर बेचना पड़ता है। बाजरा का भाव मिल रहा है 950 रुपये प्रति क्विंटल। बीज के भाव, मजदूरी, डीजल की कीमत, बिजली, खाद सब महंगा हुआ लेकिन फसल के भाव गिरते जा रहे हैं। इस बार बारिश भी कम हुई सो लागत और बढ़ गई।‘

संजय शर्मा आगे बताते हैं कि, ‘एक महीने पहले मक्का बेचा था हर एक क्विंटल पर 1000-1100 रुपये तक का नुकसान हो रहा था। पुलिस से हाथ पैर जोड़ने के बाद हरियाणा में जाकर धान बेच पाए, भाव वहां भी कम ही मिला लेकिन कोई और रास्ता ही नहीं है। यहां सरकारी मंडी नहीं है तो भाव कैसे मिलेगा।‘

उन्होंने कहा कि निजी व्यापारी आपस में पहले से तय कर लेते हैं कि किस फसल की बोली किस भाव पर लगानी है। कीमत व्यापारी तय करता है किसान के पास तो दूसरा कोई रास्ता है नहीं। कृषि कानूनों के बारे में संजय कहते हैं, ‘सरकार कह रही है कि हमारी बात को सही मान लो, लेकिन कैसे मान लें? सरकार तो पल्ला झाड़ना चाह रही है किसानों से। किसानों ने इस सरकार को मन से सपोर्ट किया था लेकिन अब परेशान हैं और दुखी भी। पहले साग के साथ रोटी खाते थे लेकिन अब चटनी या छाछ के साथ खाएंगे हो सकता है कि रूखी रोटी भी खानी पड़े।‘

गौतम बुद्ध नगर के रामनेर गांव के ही 74 वर्षीय किसान चंद्रपाल शर्मा के खेत से करीब पंद्रह क्विंटल बाजरा पैदा हुआ। वह बताते हैं कि, ‘बाजरा मुश्किल से 1000-1200 रुपये प्रति क्विंटल पर बिक रहा है। उपज कम है वरना इसे हरियाणा ले जाते। ऐसा ही हाल मक्के का भी हुआ। न दूध के भाव मिल रहे हैं, न फसल के भाव किसानों के सामने कोई रास्ता नहीं है। अबकी बार किसानों की मट्टी पलीत है। यहां दूर-दूर तक कोई मंडी नहीं है, हरियाणा जाएं तो खर्च और बढ़ जाता है।‘ वह कहते हैं, ‘सरकार दावे खूब कर रही है लेकिन किसानों के जैसे हालात अभी हैं वैसे पहले कभी नहीं हुए।‘

फसलों का सही भाव न मिलना किसानों के लिए मुसीबत बनता जा रहा है। लेकिन इससे भी बड़ी समस्या जो उनके सामने आने वाली है वह है अपना परिवार पालने की है, बच्चों के स्कूल की फीस जमा कराने की है। किसानों की माने तो उनके लिए वही निजी व्यापारी परेशानी का सबब बने हुए हैं, जिन्हें लेकर केंद्र सरकार नए कृषि कानूनों के जरिए किसानों को अच्छी कीमत मिलने के दावे कर रही है।

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