वायु प्रदूषण पर नए अध्यादेश से आमने- सामने सरकार और किसान

दिल्ली- एनसीआर और आस-पास के इलाकों में वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए केंद्र सरकार ने नया अध्यादेश लागू किया है। अध्यादेश में प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ सख्त प्रावधान किए गए हैं। लेकिन किसान संगठन इस अध्यादेश को किसान विरोधी बताते हुए इसका जोरदार विरोध कर रहे हैं।

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राजधानी दिल्ली- एनसीआर में वायु प्रदूषण एक गंभीर मामला है। आम जनता और सरकार इस मुद्दे से जूझती रही हैं लेकिन कोई ठोस उपाय नहीं खोजा जा सका, जिससे वायु प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सके। सर्दियां शुरू होते ही दिल्ली-एनसीआर की हवा और जहरीली हो जाती है। इसके लिए हर साल पंजाब और हरियाणा के खेतों में जलने वाला धान का अवशेष यानी पराली को बड़ी वजह करार दिया जाता है। जबकि वायु प्रदूषण में पराली से बड़ी वजह सड़क की धूल, निर्माण कार्यों से निकलते सूक्ष्म कण, औद्योगिक और वाहनों का प्रदूषण हैं।

इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच केंद्र सरकार एक नया अध्यादेश ‘वायु गुणवत्ता प्रबंधन अध्यादेश, 2020’ लेकर आई। जिसे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंड की स्वीकृति भी मिल गई है, यानी अब यह एक कानून बन गया है। कानून के मुताबिक दिल्ली-एनसीआर और आस-पास के इलाकों में प्रदूषण फैलाने के दोषी पाए जाने पर पांच साल तक की जेल की सजा और एक करोड़ रुपये जुर्माने का प्रावधान किया गया है। मौजूदा नियमों में जेल की सजा एक साल थी और जुर्माना एक लाख था लेकिन अब दोनों बढ़ा दिए गए हैं। इसके लिए कानून में वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए एक आयोग बनाने का भी प्रावधान है, जो दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण पर लगातार निगरानी बनाए रखेगा।

अध्यादेश के मुताबिक दिल्ली और एनसीआर से जुड़े इलाके, आसपास के क्षेत्र जहां यह लागू होगा उसमें पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश हैं। आयोग के पास वायु गुणवत्ता, प्रदूषणकारी तत्वों के बहाव के लिए मानक तय करने, कानून का उल्लंघन करने वाले परिसरों का निरीक्षण करने, नियमों का पालन नहीं करने वाले उद्योगों, संयंत्रों को बंद करने के आदेश देने का अधिकार होगा। विधि और न्याय मंत्रालय ने 29 अक्टूबर को जारी अध्यादेश के तहत पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम और नियंत्रण) प्राधिकरण (ईपीसीए) को भंग कर दिया और और इसकी जगह 18 सदस्यों वाले एक आयोग का गठन किया है।

हालांकि इससे पहले भी पंजाब और हरियाणा के कई किसानों पर पराली को आग लगाने के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई हैं जिसका किसानों ने जमकर विरोध किया। केंद्र सरकार यह कानून ऐसे मौके पर लेकर आई है जब पंजाब और हरियाणा में पहले से ही कृषि कानूनों के खिलाफ जबरदस्त विरोध हो रहा है।

किसान संगठन कर रहे हैं अध्यादेश का विरोध

वायु प्रदूषण में सुधार के लिए सरकार इस अध्यादेश को बड़ा फैसला बता रही है लेकिन इसका विरोध भी शुरू हो गया है। खासकर किसान संगठनों ने इस कानून को किसानों के खिलाफ बताया है। साथ ही कानून में जिस आयोग की बात कही गई है उसकी संरचना पर भी सवाल उठ रहे हैं। स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने ट्वीट के जरिए कहा कि आयोग में किसानों का कोई प्रतिनिधि नहीं है, जबकि आयोग 5 राज्यों के किसानों को कभी भी कोई आदेश दे सकता है।

इसके साथ ही अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने भी इस अध्यादेश के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। एआईकेएससीसी की तरफ से कहा गया है कि यह एक और अलोकतांत्रिक और किसान विरोधी अध्यादेश है। केंद्र ने एक बार फिर से राज्यों की बात नहीं सुनी और किसानों को दंडित करने की शक्ति प्राप्त कर ली।

पंजाब में कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के महासचिव सरवन सिंह पंढेर ने हिंद किसान से बातचीत में कहा, ‘केंद्र सरकार ने किसानों से बदला लेने की भावना से यह कानून बनाया गया है। किसान लगातार कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं और सरकार इस विरोध को कुचलना चाहती है। सरकार ने बगैर वैज्ञानिक तथ्यों, जांच और उस पर चर्चा किए यह कानून बनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कहा था कि पराली के निपटारे के लिए किसानों को 2,500 प्रति एकड़ रुपये दिए जाएं लेकिन यह आदेश सरकार ने लागू नहीं होने दिया। अब सरकार किसानों को सजा और एक करोड़ रुपये का जुर्माना वसूलने की तैयारी कर रही है जो बेहद गलत है। सरकार किसानों से बात करे फसल चक्र में बदलाव कराए, वैकल्पिक फसल किसानों को दे तो किसान भी सरकार के साथ होंगे। यह कानून किसानों को भड़काने वाला कानून है। हम इसे वापस लेने की मांग करते हैं।‘

कृषि कानूनों को लेकर पंजाब के किसान इस वक्त केंद्र सरकार से बेहद खफा हैं। ऐसे में सरकार के लिए इस कानून को जमीन पर उतार पाना आसान नहीं होगा। ऐसे में अगर किसानों को सजा और जुर्माना लगाया गया तो विरोध और तेज हो सकता है।

भारतीय किसान यूनियन (डकौडा) के महासचिव जगमोहन सिंह भट्टी ने हिंद किसान से बातचीत में कहा, ‘इस अध्यादेश में जो सजा का प्रावधान है, वो समस्या के समाधान का नहीं बल्कि सरकार की हिटलरशाही है। ये किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने वाली बात है। अध्यादेश को लेकर राज्य सरकारों से कोई बात नहीं की गई। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू नहीं कराया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को किसानों को मुआवजा देने का फैसला दिया था उसी से बचने के लिए केंद्र सरकार ये कानून लाई है। सरकार बकायदा बातचीत करती इसके बाद एक विस्तृत कानून बनाती। हवा तो वाकई जहरीली है लेकिन इस तरह का कानून बनाना गलत है। हम इसका विरोध करेंगे।‘

पंजाब की ही तरह हरियाणा के किसान भी केंद्र सरकार के इस अध्यादेश का विरोध कर रहे हैं। स्वामीनाथन संघर्ष समिति के अध्यक्ष विकल पचार ने हिंद किसान से कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा था कि किसानों पर जुर्माना लगाने की बजाय उनती मदद करनी चाहिए। किसान  एक करोड़ रुपये का जुर्माना कभी नहीं चुका पाएगा। 5 साल की सजा का प्रावधान भी बहुत सोच समझ कर किया गया है। सरकार की कोशिश है कि किसान खेती करना छोड़ दे। तीन कृषि कानूनों की तरह यह भी किसानों को बर्बाद करने का एक तरीका है। धान की खेती किसानों के लिए ठीक-ठाक कमाई करा देती है, लेकिन सरकार उसे भी बर्बाद करना चाहती है। सरकार की नीतियों की वजह से धान का निर्यात कम हुआ है और उसी वजह से सरकार इसका उत्पादन कम कराना चाहती है।‘

हालांकि इस बीच दिल्ली- एनसीआर ही हवा भी लगातार खराब हो रही है। लेकिन इस अध्यादेश पर किसानों के सीधे विरोध से यह साफ है कि आने वाले वक्त में कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों के लिए ‘वायु गुणवत्ता प्रबंधन अध्यादेश, 2020’ भी अहम मुद्दा बनने वाला है।

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