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आर्थिक मोर्चे पर अधिकांश मामलों में नाकामी झेल रही केंद्र सरकार उर्वरक सब्सिडी में कमी करने का रास्ता ढ़ूंढ़ रही है। इसके तहत किसानों को आने वाले दिनों में कई तरह की नई पाबंदियों का सामना करना पड़ सकता है। यह कदम सीधे किसानों के खाते में उर्वरक सब्सिडी देने के लिए जमीन तैयार करने के लिए उठाये जाएंगे। इसके लिए सरकार कई साल से मन बनाकर बैठी है लेकिन इस पर अभी तक अमल नहीं हो पाया है। साथ ही यूरिया की कीमत में चरणबद्ध तरीके से अच्छी खासी बढ़ोतरी पर भी विचार किया जा रहा है। वहीं सरकार द्वारा उर्वरक उद्योग को सब्सिडी भुगतान में पिछले कई साल से लगातार देरी की नीति के चलते उद्योग भी चाहता है कि सब्सिडी सीधे किसानों के खाते में दी जाए। इससे उसे अपनी वित्तीय हालत सुधारने का मौका मिलेगा। फिलहाल सरकार पर उर्वरक उद्योग की करीब पचास हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी बकाया है। यही नहीं पिछले वित्त वर्ष (2019-20) की भी पूरी सब्सिडी उद्योग को अभी तक नहीं मिल पाई है। हालांकि कृषि कानूनों के विरोध में किसानों के तेज होते आंदोलन के चलते सीधे सब्सिडी और यूरिया की कीमत में बढ़ोतरी जैसे कदमों में कुछ देरी हो सकती है।

सरकार में उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक सरकार किसानों के खाते में सीधे सब्सिडी के मसौदे को लगभग अंतिम रूप दे चुकी है। इस लेखक के साथ एक बातचीत में केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने किसानों के खाते में सीधे सब्सिडी देने के विचार पर सहमति की बात स्वीकार की है। इस मुद्दे पर कुछ किसान संगठनों के साथ भी सरकार ने करीब दो माह पहले चर्चा की थी। यह बात अलग है कि जिस तरह सरकार ने कृषि उत्पादों की मार्केटिंग, कांट्रेक्ट फार्मिंग और आवश्यक वस्तु अधिनियम के लिए लागू किये गये कानूनों पर किसी की राय को तवज्जो नहीं दी, लगभग उसी तरह का उसका रवैया किसानों के खाते में सीधे उर्वरक सब्सिडी के मुद्दे पर भी है। इसके पीछे मकसद सब्सिडी बचाना है। यह बात इस चर्चा में हिस्सा लेने वाले एक किसान संगठन के प्रतिनिधि ने इस लेखक के साथ एक बातचीत में स्वीकार की।

असल में सरकारी अधिकारियों का कहना है कि यूरिया की खपत घटाने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाने पर विचार किया जा रहा है। साथ ही यूरिया का गैर-कृषि क्षेत्रों में डायर्जन रोकना इसकी वजह बताया जा रहा है। इसलिए आने वाले दिनों में किसी एक किसान के लिए एक समय में खरीदे जाने वाले कुल यूरिया व दूसरे उर्वरकों के बैग की संख्या सीमित की जा सकती है। साथ ही किसान नहीं होने पर उर्वरक खरीदने की पात्रता पर रोक लग सकती है। यही नहीं एक खरीफ या रबी सीजन में किसान को कितने बैग उर्वरक मिल सकता है उसकी भी सीमा तय की जा सकती है। साथ ही आधार कार्ड और फिंगर प्रिंट की मैचिंग जैसी शर्तें जोड़ी जा सकती हैं। शुरू में यह सब मौजूदा व्यवस्था के तहत होगा और बाद में इसी डाटा का उपयोग सब्सिडी के सीधे खाते में डालने के लिए किया जाएगा। वैसे भी सरकार कह रही है कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के जरिये किसानों को पैसा भेजा जा रहा है तो उनका रिकार्ड तो तैयार हो ही रहा है।

अब पहला सवाल तो यह है कि जब सरकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर उनकी कैबिनेट के मंत्री लगातार नीम लेपित यूरिया की अनिवार्यता को यूरिया के गैर कृषि उपयोग रोकने की उपलब्धि गिनाते रहे हैं तो फिर अब डायर्जन का सवाल कहां से खड़ा हो गया है। दूसरे किसानों को किसी भी फसल के लिए सीजन के शुरू में यूरिया खरीदने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया जाता रहा है। सहकारी समितियों से क्रेडिट पर यूरिया या दूसरे खाद एक साथ ही किसान खरीदता है। साथ ही फसल वार उर्वरकों की खपत भी अलग होती है। ऐसे में एक समान मात्रा सभी किसानों के लिए कैसे लागू की जा सकती है। वहीं फसल इनपुट के लिए क्रेडिट लेने की प्रक्रिया को बार-बार कैसे दोहराया जाएगा। इस तरह की अव्यवहारिक नीति किसानों के लिए रोजमर्रा के लिए अनिश्चिता अलग से पैदा करेगी। साथ ही किसानों की जोत के मालिकाना हक और रिकार्ड का हर खेती करने वाले व्यक्ति के नाम पर होना जरूरी नहीं है। ऐसे में सीधे सब्सिडी ट्रांसफर को लेकर व्यवहारिक दिक्कतें पैदा होना संभव है।

वहीं एक राय यह भी है कि आने वाले कुछ समय में यूरिया की कीमतों को चरणबद्ध तरीके से पचास फीसदी तक बढ़ा दिया जाए। इससे किसान यूरिया के उपयोग में कमी करेंगे। इसके जरिये उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन कीमतों में बढ़ोतरी का किसानों में विरोध होना है। पहले से ही कृषि कानूनों को लेकर आंदोलित किसान इस कदम से और नाराज हो सकते हैं।

वहीं जहां तक उर्वरक उद्योग का सवाल है तो उसका सीधे सब्सिडी ट्रांसफर को समर्थन देना जायज है क्योंकि सरकार के उपर उनका बकाया लगातार बढ़ता जा रहा है। उद्योग सूत्रों के मुताबिक इस समय यह करीब पचास हजार करोड़ रुपये बकाया है। यही नहीं अभी तक पिछले वित्त वर्ष का भी पूरा बकाया भुगतान नहीं हुआ है जो करीब चालीस हजार करोड़ रुपये था। वहीं 11 अक्तूबर, 2020 तक उर्वरकों की बिक्री पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि के मुकाबले 41 लाख टन ज्यादा रही है। सरकार ने चालू वित्त वर्ष (2020-21) के लिए 71 हजार 309 करोड़ रुपये की उर्वरक सब्सिडी का प्रावधान किया है। जिस तरह से बकाया बढ़ रहा है उसे देखते हुए साल के अंत तक करीब इतना ही सब्सिडी सरकार पर बकाया रहने का अनुमान है। ऐसे में उद्योग की वित्तीय हालात का बिगड़ना भी तय है। यही वजह है कि सरकार परोक्ष रूप से सब्सिडी कटौती करने के नये रास्ते ढ़ूंढ़ रही है। डायरेक्ट सब्सिडी ट्रांसफर इनमें से एक है।

वहीं सरकार ने डिस्पेच के आंकड़ों के आधार पर सब्सिडी देने की बजाय अब प्वाइंट ऑफ सेल यानी रिटेलर के स्तर पर बिक्री के आंकड़ों को इसका आधार बनाया है। इस पर उद्योग का कहना है कि यह सब्सिडी देने में देरी का कारण बन रहा है। वैसे इस साल अभी तक 41 लाख टन खाद की अधिक बिक्री रिटेलर के स्तर के आंकड़ों के आधार पर ही है। साथ ही पीओएस मशीन का उपयोग बढ़ाया जा रहा है और आने वाले दिनों में सब्सिडी का उर्वरक देने के लिए उसमें जरूरी बदलाव किये जा सकते हैं जो किसानों को मिलने वाली खाद की मात्रा और सब्सिडी का ब्यौरा इकट्ठा करने का काम करेगी। सरकार के यह संभावित कदम देश के किसानों के लिए एक और झटका लेकर आ सकते हैं क्योंकि यह व्यवस्था व्यवहारिक तो है ही नहीं सब्सिडी में कटौती का भी हथियार बनेगी। गरीबों को गैस सिलेंडर पर मिलने वाली सब्सिडी में कमी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

(लेखक हिंद किसान के एडिटर-इन-चीफ हैं)

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