केंद्रीय कृषि कानून और पंजाब के कृषि विधेयकों में क्या है अंतर, समझिए कुछ प्वाइंट्स में

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केंद्र सरकार के कृषि कानून के खिलाफ पंजाब विधान सभा के विशेष सत्र में कुल चार विधेयक पारित किए गए। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि केंद्र के कृषि कानून किसानों और मजदूरों के हितों के खिलाफ हैं और उनकी सरकार किसानों को बचाने के लिए हर संभव कोशिश करेंगी। पंजाब सरकार ने केंद्र सरकार के कानूनों को बेअसर करने के लिए ये विधेयक विधान सभा में पेश किये और पारित कराए। आसान भाषा में समझते हैं कि केंद्र के कृषि कानूनों से पंजाब सरकार के कृषि से जुड़े विधेयक किस तरह से अलग हैं।

  1. केंद्र सरकार का मंडी से जुड़ा कानून एपीएमसी मंडी के बाहर फसलों की खरीद फरोख्त को बढ़ावा देते हुए बिना किसी शुल्क के व्यापार की अनुमति देता है। लेकिन पंजाब सरकार के विधेयक में मंडी के बाहर खरीद फरोख्त में राज्य सरकार को शुल्क लगाने का प्रावधान शामिल है। मंडी के बाहर शुल्क न लगने से केंद्र सरकार के कृषि कानूनों को एपीएमसी मंडियों को खत्म करने वाला बताया जा रहा था, लेकिन पंजाब के विधेयकों में मंडी के बाहर भी शुल्क लगाने के प्रावधान से यह आशंका कम होती है।
  2. केंद्र सरकार के कृषि कानून में न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी का जिक्र नहीं है। वहीं पंजाब सरकार के कृषि से जुड़े विधेयकों में यह प्रावधान किया गया है कि कोई भी व्यापारी या कंपनी अगर किसानों से जबरदस्ती या बिना उनकी अनुमति के एमएसपी से कम पर धान या गेहूं की खरीद करती है तो उन पर कम से कम तीन साल की सजा या जुर्माना लग सकता है।
  3. कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा देने वाले केंद्र के कृषि कानून में कंपनी और किसान के बीच कॉन्ट्रैक्ट में फसल की कीमत का जिक्र नहीं है। वहीं पंजाब सरकार के कृषि से जुड़े विधेयक में यह प्रावधान किया गया है कि कोई भी कंपनी या व्यापारी किसानों के साथ कॉन्ट्रैक्ट फसल की एमएसपी से कम पर नहीं कर सकता। ऐसा करने पर कम से कम तीन साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
  4. केंद्र सरकार के कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से जुड़े कानून में विवाद की स्थिति में अपील के लिए एसडीएम और डीएम के पास निपटारे की प्रक्रिया की जिम्मेदारी देने से किसानों के लिए विवाद निपटाना लंबे वक्त वाला और खर्चीला होने की बात कही जा रही थी। पंजाब सरकार के कृषि विधेयकों में एसडीएम और डीएम को इस प्रक्रिया से हटा दिया गया यानी विवाद की स्थिति में किसान सीधे न्यायालय जा सकते हैं।
  5. बीते कई सालों से किसान और किसान संगठन ये मांग कर रहे थे कि कर्ज न चुका पाने की स्थिति में छोटे किसानों को खेत की कुर्की से मुक्ति दिलाई जाए। हालांकि इससे संबंधित केंद्र सरकार का कोई कानून नहीं है लेकिन पंजाब की अमरिंदर सिंह की सरकार ने 2.5 एकड़ तक जमीन के मालिक किसानों के लिए यह प्रबंध कर दिया है। अब पंजाब में 2.5 एकड़ तक खेत के मालिक किसान के कर्ज न चुका पाने की स्थिति में जमीन की कुर्की नहीं की जा सकेगी।
  6. केंद्र सरकार के आवश्यक वस्तु अधिनियम में किए गए संशोधन को भी पंजाब सरकार ने विधेयक के जरिए निष्प्रभावी बनाने की कोशिश की है। केंद्र सरकार के कानून के मुताबिक अब किसी भी कंपनी या व्यापारी को वस्तुओं की भंडारण की सीमा का पालन नहीं करना होगा। यानी सरकार आपातस्थिति के अलावा वस्तुओं के भंडारण की लिमिट तय नहीं करेगी। केंद्र सरकार के संशोधन के बाद खाद्य उत्पादों की कालाबाजारी बढ़ने की आशंका जताई जा रही थी। पंजाब सरकार के विधेयक में यह प्रावधान है कि राज्य की सरकार खाद्य उत्पादों के स्टॉक लिमिट पर नियंत्रण रखेगी। यानी कोई भी कंपनी या व्यापारी अपनी मनमर्जी के मुताबिक खाद्य उत्पादों का भंडारण नहीं कर सकता।

पंजाब विधानसभा से पारित हो कर ये विधेयक राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजे गए हैं। सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा है कि अगर राज्यपाल या राष्ट्रपति इन विधेयकों को मंजूरी नहीं देते हैं तो उनकी सरकार के पास अदालत में जाने का भी विकल्प है। पंजाब की तर्ज पर राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की कांग्रेस सरकारें भी अपनी विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ विधेयक लाने की तैयारी कर रही है।

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