अब बिना जलाए होगा पराली का समाधान

पूसा संस्थान के बनाए बायोडीकंपोजर कैप्सूल के जरिए 20 दिन में पराली खाद में बदल जाएगी। दिल्ली सरकार किसानों की सहमति के साथ 700 एकड़ जमीन पर इसका छिड़काव करेगी। इसका पूरा खर्च सरकार उठाएगी।

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दिल्ली में हवा की गुणवत्ता खराब होने के पीछे पराली जलाने को वजह माना जाता है। किसान पराली न जलाएं, इसके लिए अब दिल्ली सरकार एक नई तकनीक को बढ़ावा दे रही है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के मुताबिक, राज्य में किसानों को बायो-डिकंपोजर तकनीक से पराली को खाद में बदलने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इसके लिए दिल्ली सरकार ने बड़े पैमाने पर बायो डिकंपोजर का घोल बनाने की शुरूआत की है। मंगलवार को सीम केजरीवाल ने नजफगढ़ स्थित केंद्र का दौरा किया और वहां पर मौजूद पूसा इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों और किसानों से भी बात की।

दिल्ली सरकार पूसा रिसर्च इंस्टीट्यूट की निगरानी में धान की पराली को खेत में गलाकर खाद बनाने के लिए बायोडिकंपोजर घोल को तैयार करा रही है। इसे देखने आए केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली सरकार इस घोल का छिड़काव करीब 700 हेक्टेयर जमीन पर अपने खर्चे पर कराएगी और इससे किसानों पर कोई आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा। किसानों को सिर्फ अपने खेत में इस घोल के छिड़काव के लिए अपनी सहमति देनी होगी। 11 अक्टूबर से दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में घोल का छिड़काव किया जाएगा।

पराली के निपटारे का यह प्रदूषणमुक्त समाधान पूसा रिसर्च इंस्टीट्यूट ने तैयार किया है। यह किफायती और इस्तेमाल करने में सरल भी है। पूसा रिसर्च इंस्टीट्यूट ने बायो डिकंपोजर कैप्सूल बनाए हैं, जिनके जरिए घोल बनाया जाता है। एक हैक्टेयर जमानी के लिए 4 कैप्सूल को गुड़ और बेसन के घोल के साथ छिड़काव करने पर पराली गल जाती है और खाद में बदल जाती है। इन कैप्सूल को पूसा डीकंपोजर के नाम से भी मशहूर हो रहे हैं। पूसा के मुताबिक करीब 20 दिनों में ये घोल पराली को खाद में बदल देगा।

दिल्ली सरकार के मुताबिक से तकनीक बेहद सस्ती और टिकाऊ है। जिससे न सिर्फ पराली जलाने की समस्या का समाधान होगा बल्कि किसानों के लिए तैयार खाद मिट्टी की उर्वरक क्षमता को भी बढ़ाएगी।

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