नया पेराई सत्र 8,447 करोड़ रुपये गन्ना मूल्य बकाया के साथ शुरू

उत्तर प्रदेश सरकार लगातार दावा करती रही है कि नया पेराई सीजन शुरू होने के पहले ही किसानों को पूरा भुगतान कर दिया जाएगा। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है।

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केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ पारित विधेयकों पर क्या कहते हैं किसान नेता

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देश के सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश के करीब चालीस लाख गन्ना किसानों के लिए अच्छे दिन लगातार दूर होते जा रहे हैं। अप्रैल-मई में जब चीनी मिलों ने पिछले सीजन (2019-20) के लिए गन्ने के पेराई बंद की तो उनके ऊपर किसानों का गन्ना मूल्य भुगतान का रिकार्ड बकाया था। वहीं, एक अक्तूबर से नया पेराई सीजन (2020-21) शुरू हो गया है, लेकिन गन्ना किसानों का पूरा भुगतान तो दूर की बात है, अभी भी करीब 8447.10 करोड़ रुपये का बकाया चीनी मिलों पर है। इनमें राज्य सरकार द्वारा संचालित सहकारी चीनी मिलों के साथ निजी क्षेत्र की चीनी मिलों तक सभी शामिल हैं।

हालांकि, राज्य सरकार लगातार दावा करती रही है कि नया पेराई सीजन शुरू होने के पहले किसानों को पूरा भुगतान कर दिया जाएगा। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। हिंद किसान के पास उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, कई चीनी मिलों पर तो पिछले पेराई सत्र का करीब 50 फीसदी भुगतान बकाया है, जबकि कानूनी रूप से गन्ना किसानों को गन्ना आपूर्ति के 14 दिन के भीतर भुगतान हो जाना चाहिए और उसके बाद बकाया राशि पर ब्याज दिया जाना चाहिए। इस बात पर उच्च न्यायालय भी अपनी मुहर लगा चुका है।

गन्ने का सबसे अधिक बकाया पश्चिमी उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों पर है। खास बात यह है कि राज्य के गन्ना विकास मंत्री सुरेश राणा के गृह जिले शामली और उनकी विधानसभा की चीनी मिलें बकाया के मामले में सबसे ऊपर हैं। वहीं, राज्य में गन्ना मूल्य में पिछले सात साल में केवल 35 रुपये प्रति क्विंटल की ही बढ़ोतरी हुई है। समाजवादी पार्टी की सरकार ने अपने कार्यकाल में तीन साल गन्ने के राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) में कोई बढ़ोतरी नहीं की थी और मौजूदा भाजपा सरकार ने भी तीन साल में केवल एक ही साल गन्ने के एसएपी को बढ़ाया है। नये सीजन में दाम बढ़ेगा या नहीं, इसको लेकर अभी तक स्थिति साफ नहीं है।

जहां तक चीनी मिलों पर बकाया को लेकर जानकारी की पारदर्शिता की बात है तो उसको लेकर भी स्थिति साफ नहीं हैं। राज्य के गन्ना आयुक्त कार्यालय ने सार्वजनिक रूप से जारी की जाने वाली जानकारी की प्रक्रिया को बंद कर दिया है। उत्तर प्रदेश की निजी चीनी मिलों के संगठन के एक पदाधिकारी से जब हिंद किसान ने इस बारे में जानकारी मांगी तो उनका कहना था कि यह जानकारी यूपी इस्मा के पास उपलब्ध नहीं है। राज्य की चीनी मिलों ने 2019-20 के पेराई सीजन में कुल 35898.15 करोड़ रुपये मूल्य के गन्ने की पेराई की थी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 30 सितंबर, 2020 तक चीनी मिलों ने 27,451 करोड़ रुपये का भुगतान किया और चीनी मिलों पर उस तिथि को किसानों का 8447.10 करोड़ रुपये का भुगतान बकाया था।

इसके साथ ही गन्ना किसानों के लिए संकट का एक दूसरा पहलू भी है। उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है, जहां सात साल में गन्ना मूल्य में केवल दो बार ही बढ़ोतरी हुई है। राज्य की पूर्ववर्ती अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी की सरकार ने 2012-13 से लेकर 2016-17 तक अपने पांच साल के कार्यकाल में गन्ने के राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) में केवल दो बार इजाफा किया। सरकार के पहले साल और अंतिम साल में गन्ने का दाम बढ़ाने के बीच के तीन सालों तक इसकी कीमत को स्थिर रखा। इसी तरह योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्रित्व वाली मौजूदा भाजपा सरकार ने अपने कार्यकाल के केवल पहले साल में गन्ने के दाम में दस रूपये प्रति क्विंटल की मामूली बढ़ोतरी की थी। इसके बाद दो साल से एसएपी में कोई बढ़ोतरी नहीं की है।

गन्ने की एसएपी में कब और कितना इजाफा हुआ

इस समय राज्य में 310 रुपये, 315 रुपये और 325 रुपये प्रति क्विंटल की एसएपी की तीन दरें हैं। खास बात यह है कि राज्य में गन्ने की अधिक चीनी रिकवरी वाली किस्मों का रकबा बढ़ने से औसत रिकवरी 11.30 फीसदी पर पहुंच गई है, जिसका सीधा फायदा चीनी मिलों को मिल रहा है। साल 2014-15 में राज्य में गन्ने से चीनी की रिकवरी का स्तर 9.54 फीसदी था। राज्य सरकार द्वारा गन्ने की एसएपी नहीं बढ़ाए जाने से यह केंद्र द्वारा निर्धारित फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस (एफआरपी) के लगभग करीब आ गया है। अगर इसके आकलन में केंद्र द्वारा तय एफआरपी और उसमें रिकवरी के आधार पर मिलने वाले अतिरिक्त इंसेंटिव को जोड़ करें तो यह लगभग एक स्तर पर आ गया है।

खास बात यह है कि 1996-97 के पेराई सीजन में जब पहली बार राज्य की चीनी मिलों ने एसएपी को मानने से इनकार कर दिया था और राज्य सरकार के एसएपी तय करने के अधिकार को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। उस समय केंद्र सरकार द्वारा तय किये जाने वाले स्टेटूचरी मिनिमम प्राइस (एसएमपी) और एसएपी में करीब 20 फीसदी का अंतर था। लेकिन राज्य सरकार द्वारा लगातार एसएपी को स्थिर रखने से अब एसएपी और मौजूदा केंद्रीय मूल्य एफआरपी में अंतर ही न के बराबर रह गया है। एसएपी तय करने के राज्यों के अधिकार का विवाद करीब आठ साल तब सुलझा, जब 2004 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने राज्यों के एसएपी तय करने के अधिकार को कानूनी तौर पर मान्य करार दिया।

जहां तक पिछले पेराई सीजन के बकाया का सवाल है, तो इस पर चीनी उद्योग के पदाधिकारियों का कहना है कि राज्य और केंद्र सरकार पर चीनी मिलों का करीब चार हजार करोड़ रुपये का बकाया है। जहां राज्य सरकारों पर चीनी मिलों द्वारा उन्हें बेची गई बिजली का करीब 900 करोड़ रुपये का बकाया है वहीं केंद्र सरकार पर बफर स्टॉक की सब्सिडी, निर्यात सब्सिडी जैसे मदों में पैसे बकाया है। वहीं, उद्योग लगातार चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी की मांग कर रहा है। लेकिन मंत्री समूह की सिफारिश के बावजूद अभी तक दो रुपये प्रति किलो की संभावित बढ़ोतरी पर अब तक फैसला नहीं हो पाया है। गन्ना किसानों को बकाया भुगतान की देरी की वजह केवल चीनी मिलें ही नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारें भी हैं।

बहरहाल नया गन्ना पेराई सीजन एक अक्तूबर से शुरू हो गया है। लेकिन गन्ना किसान जहां करीब 8447.10 करोड़ रुपये के भुगतान का इंतजार कर रहे हैं वहीं नये सीजन में गन्ने का एसएपी क्या होगा, इसका कोई अता-पता नहीं है। शामली के किसान जितेंद्र सिंह हुड्डा का कहना है कि जहां राज्य सरकार ने बिजली की दरों को बढ़ा दिया और डीजल के दाम बढ़ने के साथ ही उर्वरकों के लिए भी किसानों को ज्यादा खर्च करना पड़ रहा वहीं दो साल तक दाम नहीं बढ़ना और भुगतान में देरी गन्ना किसानों का आर्थिक सेहत बिगाड़ रही है। ऐसे में हम इंतजार कर हैं कि सरकार गन्ना के एसएपी में कितनी बढ़ोतरी करती है।

(लेखक हिंद किसान के एडिटर-इन-चीफ हैं)

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