धान की रिकॉर्ड सरकारी खरीद का दावा जमीन पर कहां खड़ा है

केंद्र सरकार उत्तर प्रदेश में बीते साल के मुकाबले इस साल एमएसपी पर धान की बंपर खरीद का दावा कर रही है। लेकिन किसान सरकारी खरीद की पूरी व्यवस्था पर ही सवाल उठा रहे हैं।

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केंद्र सरकार खरीफ विपणन सीजन 2020-21 में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान की रिकार्ड खरीद होने के अनुमान जता रही है। केंद्रीय उपभोक्ता खाद्य आपूर्ति मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, भारतीय खाद्य निगम और राज्य की एजेंसियां खरीफ फसल के चालू सीजन के दौरान रिकॉर्ड 742 लाख टन धान की सरकारी खरीद करने जा रही हैं। बीते साल 627 लाख टन धान की सरकारी खरीद हुई थी। केंद्र सरकार के मुताबिक, इस सीजन में धान खरीदने के लिए केंद्रों की संख्या को 39 हजार 122 कर दिया गया है, जिनकी संख्या बीते साल 30 हजार 709 थी।

केंद्र सरकार का कहना है कि इस साल पंजाब में अब तक 129 लाख टन धान खरीदा जा चुका है जो बीते साल लगभग 95 लाख टन था। केंद्र सरकार इस बार उत्तर प्रदेश में धान की बंपर सरकारी खरीद होने के दावे कर रही है। बीते साल 29 अक्टूबर तक 76 हजार टन धान की सरकारी खरीद के मुकाबले साल इस अवधि तक तीन लाख 90 हजार टन धान खरीदने का दावा कर रही है। राज्य सरकार के नागरिक आपूर्ति विभाग के मुताबिक, 31 अक्टूबर तक चार लाख 64 हजार टन धान खरीदा गया है। लेकिन सरकार के इन खुशनुमा आंकड़ों के बीच किसान पूरी व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। किसान सरकारी खरीद केंद्र न खुलने की शिकायतें कर रहे हैं।

आगरा में भारतीय किसान संघ के प्रदेश अध्यक्ष मोहन सिंह चाहर ने हिंद किसान से बातचीत में कहा, ‘सरकारी दावा जो भी हो लेकिन हमारे यहां धान का एक भी दाना एमएसपी पर नहीं बिक पाया है।’ उन्होंने कहा कि ‘हमारे आगरा जिले में महज एक ही धान खरीद केंद्र है। अछनेरा धान खरीद केन्द्र पर कर्मचारी किसानों का धान नहीं खरीद रहे, जिसके चलते उन्हें खुले बाजार में 1200 से 1500 रुपये प्रति क्विंटल में अपना धान बेचना पड़ रहा है।’

वहीं, आगरा के ही कचोरा गांव में रहने वाले किसान मुकेश चौधरी ने कहा, ‘मैं तीन से चार दिन तक खरीद केंद्र के बाहर अपनी धान की फसल लेकर इंतजार करता रहा, लेकिन हमारी फसल नहीं खरीदी गई। खरीद केंद्र के कर्मचारी कहते हैं कि आज और कल में खरीदने की बात करते हैं, लेकिन खरीद नहीं होती। अगली फसल की तैयारी करनी थी इसलिए मैंने अपना धान व्यापारियों को ही 1300 रुपये क्विंटल में बेच दिया।’ कृषि कानूनों पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा, ‘सरकार कहती है कि कहीं भी ले जाकर अपनी फसल बेचने की आजादी दे दी है, लेकिन मैं सिर्फ पांच बीघे जमीन पर धान की खेती करता हूं, अभी तक जो लागत लगाई है, वही निकल पाना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में और लागत लगाकर उसे दूर कहां बेचने ले जाऊंगा?’

किसान नेता मोहन सिंह चाहर की मानें तो जिले में बीते तीन साल से धान की खरीद का यही हाल है। उन्होंने कहा, ‘तीन साल से हमारे यहां धान की खरीद नहीं हो रही है। इसके लिए हम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर अधिकारियों तक सबसे मिल चुके हैं। लेकिन आश्वासन के सिवाय कुछ भी हाथ नहीं लगा।’ किसान नेता के मुताबिक, 29 अक्टूबर को जिलाधिकारी को जब इस समस्या के बारे में बताया गया तो उन्होंने सरकार से बात करके समस्या दूर करने का भरोसा दिया है।

यूपी में आदित्यनाथ सरकार ने इस साल 55 लाख टन धान खरीदने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए 4000 खरीद केंद्र बनाने का दावा किया है। हालांकि, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के मुताबिक, पूरे प्रदेश में अब तक 3,894 केंद्रों पर ही खरीद शुरू हो पाई है।

धान उत्पादन के मामले में उत्तर प्रदेश देश में दूसरे पायदान पर है, लेकिन धान की सरकारी खरीद में इसका रिकॉर्ड बेहद खराब है। केंद्र सरकार के ही आंकड़े बता रहे हैं कि पंजाब और हरियाणा के मुकाबले उत्तर प्रदेश में सरकार खरीद बेहद सुस्त है। भारतीय खाद्य निगम यानी एफसीआई के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 29 अक्टूबर 2020 तक 3.51 लाख टन धान की ही खरीद हो पाई है। जबकि, पड़ोसी राज्य पंजाब में 29 अक्टूबर तक ही सबसे ज्यादा 122 लाख टन से ज्यादा धान की खरीद हो चुकी है। वहीं, हरियाणा में इस तारीख तक 46 लाख टन से ज्यादा की खरीद हुई है।

अब अगर इस समस्या की जड़ में जाएं तो पता चलेगा कि दूसरे राज्यों के मुकाबले उत्तर प्रदेश में धान खरीद के सरकारी इंतजाम बेहद कमजोर और लचर हैं। पंजाब और तेलंगाना में जहां 2 से 3 गांवों पर धान के लिए एक सरकारी खरीद केंद्र है, वहीं उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 26 गांवों पर एक खरीद केंद्र का है। यानी किसान सरकारी खरीद के लिए अपना धान देना भी चाहें तो नहीं दे सकते हैं। ऐसे में धान की सरकारी खरीद न होने पर किसानों को एमएसपी का कितना लाभ मिल पाएगा, ये बड़ा सवाल है।

खास तौर पर, जब खुले बाजार में किसानों के साथ खुली लूट की शिकायतें आ रही हों। सामान्य धान की एमएसपी 1,868 रुपये क्विंटल घोषित है, लेकिन यूपी के खुले बाजार में किसानों को बमुश्किल 1000 से 1,100 रुपये प्रति क्विंटल का भाव ही मिल पा रहा है। अब अगर किसानों को अपनी फसलों का न्यूनतम मूल्य ही न मिल रहा हो तो आमदनी कैसे बढ़ेगी, इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं।

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