कृषि क़ानून को लेकर अब ८ जनवरी को फिर से होगी वार्ता, सरकार करे तो बातचीत, किसान करें तो ढीटपंती! तारीख़ पर तारीख़ देने से किसका हो रहा है नुक़सान?
कृषि प्रधान देश में, लोकतंत्र में क्या ज़िद के आगे है जीत?