"> Reservation of local youth in employment

Unemployment

रोजगार में स्थानीय युवाओं को आरक्षण

राजस्थान की गहलोत सरकार निजी क्षेत्र में स्थानीय युवाओं को आरक्षण देने की पुरानी मांग को पूरा कर सकती है. राज्य सरकार इसके लिए कानून लाने पर विचार कर रही है. जयपुर से रामस्वरूप लामरोड़ की रिपोर्ट.

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मंदी में असंगठित क्षेत्र की अनदेखी

  • Team Hind Kisan
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  • Sep. 04, 2019
आर्थिक मंदी की चर्चा तब से शुरू हुई जब बड़ी- बड़ी कंपनियां और उद्योग इसकी चपेट में आए. सवाल ये है कि असंगठित क्षेत्र की हालत सुधरे बिना क्या आर्थिक मंदी के दौर से उबरा जा सकता है?

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किसान का किडनी बेचने का इश्तेहार

स्वरोजगार के सपने को साकार करने में नाकाम रहे एक किसान ने थक हार कर अपनी किडनी बेचने की ठानी है. आखिर ये नौबत क्यों आई कि किसान ने ये रास्ता चुना?

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कपास की खेती छोड़ रहे किसान

आर्थिक मंदी के चलते धागा मिलें बंद हो रही हैं. लोगों की नौकरियां जा रही हैं लेकिन इसका असर देश में कपास की खेती से जुड़े किसानों पर भी पड़ने वाला है जो पहले से ही इसकी खेती में घाटे से परेशान हैं. पंजाब के बठिंडा से अमित शर्मा की रिपोर्ट.

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कहां से आई आर्थिक मंदी

आर्थिक मंदी के इस दौर ने धीरे-धीरे सारे उद्योग धंधों को चपेट में लेना शुरू कर दिया है. वस्तुओं का उत्पादन तो हो रहा है लेकिन उसके खरीददार नहीं मिल रहे हैं.

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अधिग्रहण पूरा पर वादा अधूरा

  • Team Hind Kisan
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  • Aug. 19, 2019
विकास के नाम के लिए अक्सर किसानों से जमीने ली जाती हैं. मुआवजे और नौकरी से लेकर तमाम वादे भी किए जाते हैं लेकिन जब ये वादे पूरे नहीं होते तो किसान सालों प्रदर्शन करते हैं, धरने देते हैं.

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जमीन दे कर खाली हाथ बैठे किसान

दादरी में एनटीपीसी और सरकार के खिलाफ किसान कई सालों से प्रदर्शन कर रहे हैं. कई ऐसे भी किसान हैं जिन्हें एनटीपीसी ने नौकरी देने की पूरी प्रक्रिया से तो गुजार दिया लेकिन नौकरी नहीं दी.

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जमीन ने बदली जिंदगी

  • Team Hind Kisan
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  • Jun. 06, 2019
कभी खानाबदोश जीवन जीने वाले लोग आज बागवानी कर स्थायी जिंदगी जी रहे हैं. भूमिहीनों को जमीन देने का सरकार का फैसला कैसे बड़े सामाजिक बदलाव की वजह बना है. पुष्पेंद्र वैद्य की रिपोर्ट.

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ना के बराबर बढ़ी मनरेगा मजदूरी

मनरेगा के तहत रोजगार की मांग में तेजी आई है लेकिन मांग के हिसाब से आपूर्ति नहीं हुई.

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गांवों में बेरोजगारी बढ़ने के संकेत

पिछले साल मनरेगा के तहत रोजगार की मांग बीते आठ सालों में सबसे ज्यादा रही लेकिन इन आंकड़ों के क्या मायने है ?

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किन मुद्दों पर होंगे लोक सभा चुनाव

"मेरा वोट, मेरा देश, मेरा मुद्दा" पर स्वराज इंडिया के संयोजक योगेंद्र यादव से बात की हमारे संवाददाता प्रशांत त्यागी ने।

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अच्छे दिन को तरसते गांव

मोदी सरकार के पांच साल में ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था बदहाल हुआ है। यूपीए के पांच साल के मुकाबले बेशक मोदी राज में महंगाई काबू में रही लेकिन ग्रामीण इलाकों में मजदूरी महज 0.5 फीसदी की रफ्तार से बढ़ी।

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दो करोड़ के बदले पांच लाख रोज़गार

  • Team Hind Kisan
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  • Jul. 31, 2018
सालाना दो करोड़ युवाओं को रोज़गार का वादा करके मोदी सरकार सत्ता में आई, लेकिन राज्यसभा में सरकार ने कहा कि 2016 के बाद उनके पास बेरोज़गारी के आंकड़े नहीं हैं। देखिए किस तरह ख़ुद सरकार के आंकड़े बताते हैं कि देश में रोज़गार की हालत कितनी ख़राब है।

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ज़मीन भी छीनी और रोज़गार भी नहीं दिया

छिंदवाड़ा में दस साल पहले विशेष आर्थिक ज़ोन या सेज़ के नाम पर किसानों से आठ हज़ार एकड़ ज़मीन ली गई थी। वादा किया गया था उद्योग धंधे से इलाक़े का कायाकल्प हो जाएगा।

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मिथिलांचल के गांवों में पलायन का दर्द

कटिहार में रोज़गार की हालत इतनी खराब है कि रोज़ी-रोटी की तलाश में लोग घर-बार छोड़ने को मजबूर हैं। हालत इतनी बदतर है कि कई गांवों में तो पुरुष ढूंढने से नहीं मिलते। पलायन का दर्द लोगों के चेहरे पर देखा जा सकता है, लेकिन और कोई चारा भी नहीं है।

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कटिहार में कालीन कारीगरों के बुरे दिन

साल भर पहले 30-40 घरों में कालीन बनाई जाती थी, अब ये काम 2-4 घरों तक सीमित हो गया है। कुटीर उद्योग की हालत पस्त हुई तो कारीगर काम की तलाश में दूसरे शहर चले गए। ख़स्ताहाल उद्योग की सुध लेने वाला फ़िलहाल कोई नहीं दिख रहा।

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ख़त्म हो जाएंगी स्थायी नौकरियां?

हाल में सरकार ने औद्योगिक रोज़गार (स्थायी आदेश) अधिनियम-1946 से जुड़े एक नियम को बदल दिया। इसके ज़रिये अब ‘निश्चित अवधि के लिए अनुबंध पर रोजगार’ का प्रावधान किया गया है। यानी कोई कंपनी किसी कर्मचारी को एक तय और सीमित समय के लिए ठेके पर रख सकेगी।

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रसातल में रोज़गार

  • Mar. 30, 2018
इस खबर ने सहज ही ध्यान खींचा है कि भारतीय रेलवे ने लगभग 90 हज़ार खाली पदों को भरने के लिए अर्ज़ियां आमंत्रित की गईं, तो ढाई करोड़ से ज़्यादा लोगों ने फ़ॉर्म भर दिए। साफ़ तौर पर यह देश में रोज़गार के बदतर होते हालात की एक झलक है। वैसे अब हमारे पास ऐसे ठोस आंकड़े भी हैं जो बताते हैं कि भारत में रोज़गार की संख्या में वास्तविक गिरावट आई है।

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सांकेतिक विरोध काफ़ी नहीं

  • Mar. 24, 2018
औद्योगिक रोज़गार (स्थायी आदेश) अधिनियम-1946 के एक ख़ास नियम को बदलने के केंद्र सरकार के फ़ैसले पर ट्रेड यूनियनों का ख़फ़ा होना जायज है। इस बदलाव के ज़रिए केंद्र ने उद्योगपतियों को जब चाहें किसी कर्मचारी को रखने और जब चाहें उसे नौकरी से हटाने की लगभग छूट दे दी है।

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जो चुनौती रोज़ गंभीर हो रही है

  • Mar. 19, 2018
भारत भूमंडलीकरण के अगले दौर के साथ ऊंचाइयों को छू सकता है, या फिर घोर बेरोज़गारी का शिकार हो सकता है। यह कोई ऐसी बात नहीं है, जो पहली बार कही गई हो। ना सिर्फ अर्थशास्त्री, बल्कि हमारे कई राजनेता भी इस चुनौती का ज़िक्र करते रहे हैं।

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