Satyendra Ranjan

विशेष चर्चा : आखिर कहां गुम हो गए किसानों के मुद्दे और उसे उठाने वाले आंदोलन?

एक साल पहले तक खेती-किसानी और गांवों का संकट हर किसी की जुबां पर था. किसानों की मांगों को लेकर ना केवल आंदोलन हो रहे थे बल्कि इसने लोक सभा चुनाव का मेन नैरेटिव भी तय किया था.

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गाँधी का भारत

प्रोफेसर जीएन देवी देश के जाने माने विद्वान हैं। वे वडोदरा स्थित भाषा रिसर्च सेंटर और तेजगढ़ स्थित आदिवासी एकेडेमी के संस्थापक हैं। आदिवासियों और घूमंतू जनजातियों के बीच उनका काम चर्चित रहा है। भारतीय जन भाषा सर्वेक्षण (Peoples Linguistic Survey of India) प्रो. देवी की देखरेख में हुआ।

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आगे का रास्ता

दिल्ली में पांच सितंबर प्रभावशाली मज़दूर-किसान संघर्ष रैली हुई। इसके आयोजकों में अखिल भारतीय किसान सभा, सीटू और ऑल इंडिया एग्रीकल्चरल वर्कर्स यूनियन शामिल थे। इसके पहले अखिल भारतीय किसान सभा ने पिछले मार्च महीने में मुंबई में बहुचर्चित लॉन्ग मार्च का आयोजन किया था।

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वर्चस्व टूटने की बेचैनी

मराठा, जाट या पाटीदार जैसी दबंग जातियां आज आरक्षण क्यों मांग रही हैं? क्या इसकी वजह बढ़ता कृषि संकट है? या पुराने सामाजिक वर्चस्व के टूटने से पैदा हुई अपनी बेचैनी का इज़हार वे आरक्षण की मांग के लिए आंदोलन छेड़ कर कर रही हैं?

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आरक्षण पर निशाना क्यों?

पहले सदियों से दबा कर रखे गए और पिछड़े समुदायों के हक में लागू आरक्षण नीति को लेकर कई पूर्वाग्रह बनाए गए। आरोप है कि अब इस नीति को कमज़ोर करने की कोशिशें चल रही हैं। आख़िर क्या है आरक्षण नीति के ख़िलाफ़ इस सोच की वजह?

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संसद में किसानों के बिल

आखिरकार शुक्रवार, तीन अगस्त को लोक सभा में वो बिल पेश होंगे, जिनका मसविदा अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने तैयार किया है। इन बिलों का संबंध किसानों की संपूर्ण ऋण मुक्ति और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने से है।

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संघर्ष का संगम

किसान, दलित और पूर्व सैनिकों के आंदोलन अब एक मंच पर आ रहे हैं। अखिल भारतीय किसान सभा ने 9 अगस्त को भारत बंद की अपील की है। दूसरे किसान संगठन उसे समर्थन देने का एलान पहले ही कह चुके हैं।

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ख़रीदारी हो तभी MSP से फ़ायदा

जब सरकार ने हार्ड वर्क बनाम हॉर्वर्ड अर्थव्यवस्था पर बहस छेड़ी है, तब ये जानना ज़रूरी है की देश के कृषि क्षेत्र एवं पूरे ग्रामीण भारत के विकास के लिए योजना आयोग ने क्या भूमिका निभाई थी?

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आज का कृषि संकट कहीं गहरा

प्रो. सुरिंदर एस. जोधका ने गुजरे दशकों में भारत के ग्रामीण समाज में आए बदलावों का गंभीरता से अध्ययन किया है। खेती-किसानी के वे ख़ास जानकार हैं। प्रो. जोधका मौजूदा ग्रामीण संकट और किसान आंदोलन को कैसे देखते हैं, इस बारे में उनसे एक ख़ास बातचीत।

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लुटेरे प्रकाशक

अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने पिछले हफ़्ते एक बड़ा खुलासा किया। इससे कथित इंटरनेशनल जर्नल्स प्रकाशित करने के गोरखधंधे पर रोशनी पड़ी है। इसके मुताबिक ऐसे जर्नल छप रहे हैं, जिनमें ऊंचे शिक्षा संस्थानों से जुड़े लोग पैसा देकर अपने आलेख छपवाते हैं, ताकि अपने करियर में वे आगे बढ़ सकें।

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राइट्स बेस्ड एप्रोच में कोई गलती नहीं

यूपीए सरकार के समय राष्ट्रीय सलाहकार समिति (NAC) के सदस्य रहे एन.सी. सक्सेना मानते हैं कि उस दौरान अपनाई गई विकास की अधिकार आधारित अवधारणा सही थी।

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गन्ना किसानों को कितनी राहत?

केंद्र सरकार ने गन्ना किसानों के लिए उचित एवं लाभकारी मूल्य में 20 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है। लेकिन साथ ही बुनियादी रिकवरी रेट में भी आधा फीसदी का इज़ाफ़ा कर दिया है। इस हाल में किसानों को असल में कितना फायदा होगा? इस अहम सवाल पर ये खास डिबेट।

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खेत से संसद तक लड़ाई

किसान संगठनों ने अपने आंदोलन को और तेज़ करने का एलान किया है। अब लड़ाई खेत-खलिहान से संसद तक लड़ी जाएगी। क्या अब किसान संगठन कामयाब होंगे? उनके बीच अब भी पूरी एकजुटता क्यों नहीं है? इन सवालों पर एक ख़ास चर्चा।

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किसान आंदोलनों से बड़ी उम्मीद

देश आज जिस कृषि संकट में है, उसकी जड़ें आखिर कहां हैं? आज़ादी के बाद खेती किसानी किन-किन दौरों से गुजरी? और कितनी है किसान आंदोलनों से उम्मीद? इन सवालों पर मशहूर अर्थशास्त्री और मार्क्सवादी विचारक प्रोफेसर प्रभात पटनायक से ख़ास बातचीत।

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फ़ेसबुक की मनमानी

फ़ेसबुक का एक अज़ीब व्यवहार सामने आया है। किसान नेता रमनदीप सिंह मान को उसने अपना प्रोफ़ाइल नाम बदलने के लिए मज़बूर किया। मान Farmer Mann नाम से अपना पेज चलाते थे। उन्हें फ़ेसबुक ने नोटिस दिया कि वे अपने पहचान के प्रमाण-पत्र की कॉपी उसे भेजें।

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मोदी राज में भ्रष्टाचार बढ़ा?

जानी मानी संस्था- सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के सर्वे में लगभग 75 फ़ीसदी लोगों ने राय जताई कि नरेंद्र मोदी के शासनकाल में भ्रष्टाचार बढ़ा है। भ्रष्टाचार से लड़ने के बीजेपी सरकार की घोषणाओं पर अब लोग कम भरोसा कर रहे हैं।

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MSP है राम-बाण?

केंद्र सरकार ने हाल में कृषि उपज के लिए MSP बढ़ाने का एलान किया। लेकिन क्या इससे कृषि संकट का हल निकल आएगा? MSP से कितने किसानों को फ़ायदा होता है? क्या यह ग्रामीण संकट दूर करने की राम-बाण दवा है? इन सवालों पर देखिए ये ख़ास डिबेट।

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प्रधानमंत्री ने वादा निभाया?

केंद्र सरकार का दावा है कि उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का किसानों को लागत से डेढ़ गुना ज्यादा MSP देने का वादा निभा दिया है। कितना सच है ये दावा? आखिर अब भी किसान खुश क्यों नहीं हैं? इन सवालों पर देखिए ये ख़ास डिबेट।

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अब रुकेगी ‘मॉब लिंचिंग’?

देश भर में ‘मॉब लिंचिंग’ यानी (शक के आधार पर) किसी को पीट-पीट कर मार डालने की बढ़ती घटनाओं के बीच सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणियां की हैं। कोर्ट में मामला कथित गौ-रक्षकों की हिंसक गतिविधियों के कारण आया था।

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प्रधानमंत्री के दावे और वादे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते पांच राज्यों के किसान प्रतिनिधियों के साथ बैठक में कई वादे किए। इनमें खरीफ फसलों के लिए लागत से डेढ़ गुना ज्यादा एमएसपी देना और गन्ने के अगले सीजन के लिए लाभकारी मूल्य का समय पर एलान शामिल है।

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मार-काट का दौर

लोगों को पीट-पीट कर मार डालने की ताजा घटना महाराष्ट्र के धुले जिले में हुई। पांच लोग शिकार बने। इसके पहले सवा महीने में 14 ऐसी घटनाएं हुई थीं। ये वारदातें दस राज्यों में हुईं।

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भारत की ये बदनामी!

थॉमसन रायटर्स फाउंडेशन के एक सर्वे का निष्कर्ष है कि सुरक्षा के लिहाज महिलाओं के लिए सबसे ख़तरनाक देश भारत है। यौन हिंसा, घरेलू काम के लिए महिलाओं की तस्करी, ज़बरिया मज़दूरी, जबरन विवाह और यौन दासता के जारी रहने के कारण भारत पर ये लांछन लगा है।

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नोटबंदी, नया खुलासा और मीडिया

नोटबंदी के दौरान नोटों के बदलने के कथित घोटाले की खबर गिराने को लेकर मीडिया का एक हिस्सा विवादों में आ गया है। एक आरटीआई याचिका से ये बात सामने आई है कि नोटबंदी के बाद गुजरात स्थित अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कॉ-ओपरेटिव बैंक में छह दिन के अंदर 745 करोड़ रुपए (1000 और 500 रुपये के नोट) जमा कराए गए।

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खेती-किसानी का असल हाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने नमो ऐप के जरिए देश के अलग-अलग हिस्सों के किसानों से संवाद किया। कोशिश ये दिखाने की थी कि मौजूदा केंद्र सरकार किसानों की हितैषी है।

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ये कैसा जनतंत्र!

तमिलनाडु के तूटीकोरिन में प्रदूषण से त्रस्त लोगों ने विरोध जताया तो उन पर गोलियां बरसा दी गईं। वहां वेदांता ग्रुप की स्टरलाइट कम्पनी के ताँबा कारखाने से हो रहे प्रदूषण के कारण लोगों की सेहत खतरे में है।

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मुद्दे उठे, लेकिन असर?

भूमि अधिकार आंदोलन ने बेहद ज़रूरी पहल की। उसने दिल्ली में ‘कृषि संकट, गौवंश से जुड़ी अर्थव्यवस्था पर चोट और दलित-अल्पसंख्यकों पर हमले’ विषय पर दो दिन के राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया।

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किसान जो कथानक लिख रहे हैं

तीन दशक पहले देश में दो तरह के किसान आंदोलनों की चर्चा थी। उनमें एक तरफ संवैधानिक दायरे में चल रहे आंदोलन थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महेंद्र सिंह टिकैत, महाराष्ट्र में शरद जोशी और कर्नाटक में एमडी नंदजुंदास्वामी के नेतृत्व में किसान मुख्य रूप से लाभकारी मूल्य के लिए संघर्ष की राह पर उतरे थे।

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आखिर ‘किसान सीज़न’ का सच क्या है?

किसान अचानक राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गए दिखते हैं। अब नरेंद्र मोदी सरकार भी खुद को किसानों की हितैषी दिखाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है, जबकि हकीकत यह है कि पिछले साढ़े तीन साल में ग्रामीण इलाके में बढ़े संकट का एक प्रमुख कारण उसकी ही नीतियां हैं।

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