Agrarian Crisis

8 जनवरी को 'ग्रामीण भारत बंद'

आठ जनवरी को ट्रेड यूनियनों की हड़ताल में किसानों और आदिवासियों के संगठनों ने भी शामिल होने का ऐलान किया है.

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किसानों की आत्महत्या के आंकड़े गायब

देश में ना तो कृषि संकट थमा है और ना ही किसानों की खुदकुशी लेकिन 2017 के लिए जारी National Crime Record Bureau की रिपोर्ट में एक बार फिर किसानों की खुदकुशी की जानकारी नहीं दी गई है.

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कृषि संकट पर जीएसटी की दोहरी मार

  • Sep. 30, 2019
कृषि उपकरणों और अन्य जरूरत की सामग्री के लिए(इनपुट) किसान 18 फीसदी तक जीएसटी चुकाते हैं.

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गन्ना किसानों का पैकेज कितना मीठा

मोदी सरकार कभी चीनी का बफर स्टॉक बनाने, तो कभी चीनी के निर्यात पर सब्सिडी बढ़ाने का ऐलान कर रही है.

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सॉयल हेल्थ कार्ड पर सवाल

  • Team Hind Kisan
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  • Jun. 09, 2019
सरकार खेत की मिट्टी में पोषक तत्वों के आधार पर खाद डालने के लिए प्रोत्साहित कर रही है.

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रुक नहीं रहा किसानों की खुदकुशी का सिलसिला

देश के ज्यदातर किसान भारी कर्ज़ में हैं लेकिन क्या कर्जमाफी और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाएं किसान आत्महत्या रोकने में कामयाब साबित हुई हैं जवाब है नहीं.

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मनरेगा की अनदेखी, सूखे का प्रकोप

देश का आधा हिस्सा सूखे की चपेट में हैं. ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी बद्तर है लेकिन इससे निपटने के इंतजामों पर समय रहते गौर नहीं किया गया. डाउन टू अर्थ की ताजा रिपोर्ट में जहां जल प्रबंधन में मनरेगा का जिक्र किया वहीं सर्वे में मनरेगा और पानी की व्यवस्था से जुड़े चौकाने वाले तथ्य सामने आए है.

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ग्रामीण इलाकों में छिनी मजदूरी

देश में ग्रामीण भारत में कृषि संकट से तो किसान दो चार हो ही रहे हैं। अब ग्रामीण भरत में मजदूरों की हालत भी खस्ता होती जा रही है। NSSO की ताजा रिपोर्ट से ये आंकड़े सामने आए हैं।

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एमएसपी में बढ़ोत्तरी के बावजूद रकबे में गिरावट

  • Team Hind Kisan
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  • Dec. 11, 2018
खेती को लेकर किसानों के बीच निराशा बढ़ती जा रही है। एक आकलन के मुताबिक न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी में बढ़ोत्तरी के बावजूद रबी की फसलों के रकबे में भारी गिरावट आई है।

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वर्चस्व टूटने की बेचैनी

मराठा, जाट या पाटीदार जैसी दबंग जातियां आज आरक्षण क्यों मांग रही हैं? क्या इसकी वजह बढ़ता कृषि संकट है? या पुराने सामाजिक वर्चस्व के टूटने से पैदा हुई अपनी बेचैनी का इज़हार वे आरक्षण की मांग के लिए आंदोलन छेड़ कर कर रही हैं?

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हंगामे की भेंट चढ़ी कृषि पर अल्पकालिक चर्चा

  • Aug. 07, 2018
राज्यसभा में न्यूनतम समर्थन मूल्य और किसानों की मुश्किलों पर अल्पकालिक चर्चा हंगामे की भेंट चढ़ गई। मंगलवार को दोपहर दो बजे जब सदन की कार्यवाही शुरू हुई और बीजेपी सांसद अमित शाह ने चर्चा की शुरुआत की, उसी वक़्त तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने सदन में नारेबाज़ी शुरू कर दी।

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ख़रीदारी हो तभी MSP से फ़ायदा

जब सरकार ने हार्ड वर्क बनाम हॉर्वर्ड अर्थव्यवस्था पर बहस छेड़ी है, तब ये जानना ज़रूरी है की देश के कृषि क्षेत्र एवं पूरे ग्रामीण भारत के विकास के लिए योजना आयोग ने क्या भूमिका निभाई थी?

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आज का कृषि संकट कहीं गहरा

प्रो. सुरिंदर एस. जोधका ने गुजरे दशकों में भारत के ग्रामीण समाज में आए बदलावों का गंभीरता से अध्ययन किया है। खेती-किसानी के वे ख़ास जानकार हैं। प्रो. जोधका मौजूदा ग्रामीण संकट और किसान आंदोलन को कैसे देखते हैं, इस बारे में उनसे एक ख़ास बातचीत।

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गन्ना किसानों को कितनी राहत?

केंद्र सरकार ने गन्ना किसानों के लिए उचित एवं लाभकारी मूल्य में 20 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है। लेकिन साथ ही बुनियादी रिकवरी रेट में भी आधा फीसदी का इज़ाफ़ा कर दिया है। इस हाल में किसानों को असल में कितना फायदा होगा? इस अहम सवाल पर ये खास डिबेट।

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विधेयकों में सभी किसानों का ख़याल

AIKSSS ने किसानों की ऋण मुक्ति और कृषि उपज का लाभकारी मूल्य दिलाने के लिए दो बिलों मसविदा तैयार किया है। अब उन्हें संसद में पेश किया जाएगा। मगर क्या इन बिलों में छोटे और सीमांत किसानों के मुद्दों को शामिल किया गया है?

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खेत से संसद तक लड़ाई

किसान संगठनों ने अपने आंदोलन को और तेज़ करने का एलान किया है। अब लड़ाई खेत-खलिहान से संसद तक लड़ी जाएगी। क्या अब किसान संगठन कामयाब होंगे? उनके बीच अब भी पूरी एकजुटता क्यों नहीं है? इन सवालों पर एक ख़ास चर्चा।

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किसानों का नया मोर्चा

केंद्र सरकार ने हाल ही में MSP बढ़ाने की घोषणा की। दावा किया किसानों को लागत से डेढ़ गुना ज्यादा MSP देने का वादा उसने निभा दिया है। पर क्या सचमुच हक़ीक़त ऐसी है? क्या इस एलान से किसान संगठन खुश हैं?

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किसान आंदोलनों से बड़ी उम्मीद

देश आज जिस कृषि संकट में है, उसकी जड़ें आखिर कहां हैं? आज़ादी के बाद खेती किसानी किन-किन दौरों से गुजरी? और कितनी है किसान आंदोलनों से उम्मीद? इन सवालों पर मशहूर अर्थशास्त्री और मार्क्सवादी विचारक प्रोफेसर प्रभात पटनायक से ख़ास बातचीत।

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किसान कर्ज़ माफ़ी के पेच

क्या किसानों के कर्ज़ माफ़ करने के बारे में एक राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए? इस बारे में अलग-अलग राज्यों में हुए फ़ैसलों और उनसे उठे सवालों के बीच ये मांग ओडीशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने की है। इससे जुड़े मुद्दों पर ये ख़ास डिबेट।

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क़र्ज़ माफ़ी काफी नहीं?

  • May. 31, 2018
क्या क़र्ज़ माफ़ी सभी किसानों के फ़ायदे में नहीं है? ये सवाल पहले भी उठता रहा है। अब नए सिरे से इस पर रोशनी पड़ी है। वजह हाल में India Consensus Report- 2018 नाम से जारी हुआ एक दस्तावेज़ है।

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A Pest, A Crop, and A Thousand Questions

What do we plant next year? It’s a question that would confront tens of thousands of cotton farmers in India in the coming days. The year gone by was a bitter experience. The year ahead raises critical questions.

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आज बहुत याद आते हैं डॉ. रिछारिया

मौजूदा खेती-किसानी के संकट के बीच जब हम सही नीतियों और तकनीक की तलाश करते हैं, तो हमें एक शीर्ष के कृषि वैज्ञानिक बहुत याद आते हैं, क्योंकि उन्होंने जो सीखा और सिखाया एवं जिस के लिए संघर्षरत रहे, उस ज्ञान के आधार पर आज खेती-किसानी के संकट के समाधान में सहायता मिल सकती है।

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मराठवाड़ा-विदर्भ के लिए 42 करोड़ डॉलर की योजना

  • Apr. 09, 2018
महाराष्ट्र में गहराते कृषि संकट से पार पाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार विश्व बैंक के साथ मिलकर 42 करोड़ डॉलर की परियोजना शुरू करने की कोशिश में है।

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Kavitha Kuruganti’s take on AIKSCC’s draft bills

Farmer organization's umbrella body All India Kisan Sangharsh Co-ordination Committee has prepared two draft bills which to be presented before the Parliament as Private Member Bills.

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AIKSCC के संयोजक वी. एम. सिंह से ख़ास बातचीत

AIKSCC ने हाल ही में दिल्ली में बड़ा सम्मेलन किया, जिसमें क़रीब 20 राजनीतिक पार्टियां शामिल हुईं। बैठक में किसान ऋण मुक्ति और कृषि उपज का लाभकारी मूल्य तय करने को लेकर दो विधेयकोंका मसौदा पेश किया गया, जिन्हें विपक्षी पार्टियों ने खुले तौर पर समर्थन दिया।

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CPM MP K.K. Ragesh on Farmers' Rights Bills

As representatives of major opposition parties descended on the Round Table Conference organized by the AIKSCC to extend their support to the two draft bills, (The Farmers' Freedom from Indebtedness Bill 2018 and The Farmers' Right to Guaranteed Remunerative MSP for Agricultural Commodities Bill 2018) detailed deliberations were held on the same.

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Shallow Solutions To Much Deeper Problems

Once considered national pride, farmers of the country find themselves in deep crisis today. And it is high time to recognise it as a national crisis, no matter how glossy a picture is painted by the mainstream media and the various governments.

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एक नई संभावना का जन्म

  • Mar. 29, 2018
ऐसा बहुत कम हुआ है, जब किसी जन-आंदोलन की मांगों को संसदीय सियासी पार्टियां अपना लें। अब ऐसा हुआ है, तो उसका साफ़ संदेश यह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रहा किसान आंदोलन देश की राजनीति को प्रभावित करने की हैसियत में पहुंच गया है।

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Tractor Trouble for Western UP’s Farmers

"There will not be any traffic in Delhi, there will be only tractors standing on the roads of the capital. Old tractors will bring life to a standstill", warned Rakesh Tikait, national spokesperson of Bharatiya Kisan Union (BKU) reacting to National Green Tribunal's (NGT) ban on tractors that are more than 10-years old.

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AIKSCC Round Table Conference

Grand Opposition Unity at AIKSCC Round Table Conference at Constitution Club. 20 parties extended prior support to the Bills especially drafted to address the agrarian crisis of India.

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राजू शेट्टी से ख़ास बातचीत

किसान संगठनों ने पूरी कर्ज़ माफ़ी और स्वामीनाथन फॉर्मूले के मुताबिक MSP के लिए राजनीतिक दलों से समर्थन मांगा है। इसके लिए ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति ने दो अलग-अलग बिलों के ड्राफ़्ट बनाए हैं।

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Agriculture in Punjab: Is budgetary morale booster enough?

The Government of Punjab has allocated Rs. 14,370 crore to its Agriculture sector in its 2018-19 budget, a move which might provide a sigh of relief to the otherwise deeply distressed farmers of the state. The budgetary allocation meant for the State’s agrarian economy this fiscal is a 40% hike compared to Rs. 10, 541 crore for 2017-18.

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मुद्दे उठे, लेकिन असर?

भूमि अधिकार आंदोलन ने बेहद ज़रूरी पहल की। उसने दिल्ली में ‘कृषि संकट, गौवंश से जुड़ी अर्थव्यवस्था पर चोट और दलित-अल्पसंख्यकों पर हमले’ विषय पर दो दिन के राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया।

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