देश के बेस्ट सीएम के प्रदेश में धान की सरकारी खरीद पस्त क्यों है?

उत्तर प्रदेश में सरकार ने एक अक्टूबर से पूरे प्रदेश में धान खरीद का दावा किया था, लेकिन अन्य राज्यों के मुकाबले खरीद बेहद सुस्त बनी हुई है।

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उत्तर प्रदेश की सरकार धान खरीद को लेकर लगातार अपनी पीठ थपथपा रही है, लेकिन दूसरे राज्यों के मुकाबले अब तक बहुत मामूली खरीद कर पाई है। यह बात भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के आंकड़ों से सामने आई है। खरीफ विपणन सीजन 2020-21 के लिए 12 अक्टूबर तक धान की सरकारी खरीद के आंकड़ों के मुताबिक, पंजाब में इस तारीख तक जहां 25 लाख 96 हजार टन और हरियाणा में 15 लाख 32 हजार टन धान की खरीद हुई, वहीं उत्तर प्रदेश में सरकार एक अक्टूबर से 12 अक्टूबर तक सिर्फ 11 हजार टन धान खरीद पाई। इसी अवधि में तमिलनाडु ने एक लाख टन से ज्यादा धान खरीदा है।

उत्तर प्रदेश में धान की सरकारी खरीद करने के लिए जिम्मेदार खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की वेबसाइट के मुताबिक, 16 अक्टूबर को शाम चार बजे तक कुल 61 हजार 848 टन धान की खरीद हुई। प्रदेश के तीन लाख 94 हजार किसानों ने धान बेचने के लिए अपना रजिस्ट्रेशन कराया है। सरकार ने खरीफ विपणन वर्ष 2020-21 में 55 लाख टन धान खरीदने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए 4000 खरीद केंद्र बनाने का दावा किया है। लेकिन सरकार की बेवसाइट बता रही है कि अभी तक केवल 2876 खरीद केंद्रों पर ही धान की खरीद शुरू हो पाई है। यानी अभी भी एक हजार से ज्यादा खरीद केंद्र पर खरीद शुरू होनी बाकी है।

हालांकि, प्रदेश सरकार के अतिरिक्त सचिव (सूचना) नवनीत सहगल का दावा है कि प्रदेश में अभी 4,000 धान क्रय केन्द्र स्थापित हैं और बीते 16 दिनों में 56,170 टन धान खरीदा जा चुका है। हालांकि, सूचना सचिव ने 16 अक्टूबर तक धान खरीद का जो आंकड़ा दिया है, वह नागरिक आपूर्ति विभाग से कम है।

हालांकि, दूसरे राज्यों के मुकाबले धान की सुस्ती के पीछे नागरिक आपूर्ति विभाग के अधिकारी धान की आवक में देरी को वजह बता रहे हैं। गोरखपुर संभाग के संभागीय खाद्य नियंत्रक राममूर्ति पाण्डेय ने फोन पर हिंद किसान से बातचीत में बताया कि पूर्वी यूपी में धान की खरीद 15 अक्टूबर से शुरू की गई है और यहां सिर्फ धान की कुछ अगैती किस्में ही अभी किसान ला रहे हैं। उन्होंने बताया कि सामान्य तौर पर धान की सरकारी खरीद एक नवंबर से शुरू होती थी, लेकिन इस बार कुछ अगैती फसलों को देखते हुए सरकार ने पहले खरीद शुरू कर करने का फैसला किया है, इसलिए आंकड़ों में यह सुस्ती दिखाई दे रही है। खाद्य नियंत्रक राममूर्ति पाण्डेय ने यह भी बताया कि इस समय बरेली और मुरादाबाद के साथ लखनऊ मंडल के कुछ जिलों में धान की आवक सबसे ज्यादा है, जबकि बाकी हिस्सों में नवंबर में किसान खरीद केंद्रों पर अपना धान लेकर आएंगे।

अधिकारी भले ही सुस्त सरकारी खरीद के लिए धान की आवक में देरी को वजह बता रहे हों, लेकिन स्थानीय अनाज मंडियों में धान की बंपर आवक देखी जा रही है। इसके अलावा सरकारी खरीद केंद्रों पर धान लेने से इनकार करने की भी शिकायतें आ रही हैं। इसके चलते किसानों को ‘ए’ ग्रेड धान 1000-1200 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर खुले बाजार में बेचना पड़ रहा है, जबकि इसके के लिए 1,888 रुपये प्रति क्विंटल न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित है।

पीलीभीत जिले में धान खरीद केंद्र पर लापरवाही का मामला इसी हफ्ते सुर्खियों में रहा है। यहां धान खरीद के औचक निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी पुलकित खरे को शिकायत मिली कि धान में ज्यादा नमी बताकर उसकी सरकारी खरीद से इनकार किया जा रहा है। इससे नाराज जिलाधिकारी ने क्रय केंद्रों के कर्मचारियों को फटकार लगाई और तय मानकों पर धान की खरीद करने के निर्देश दिए।

प्रदेश में विपक्ष भी धान खरीद में सुस्ती और नमी के नाम किसानों को एमएसपी से कम दाम देने के मुद्दे को लगातार उठा रहा है। 13 अक्टूबर को कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने ट्विटर पर लिखा, ‘उत्तर प्रदेश के धान किसान बेहद परेशान हैं। धान की खरीद बहुत कम हो रही है। जो थोड़ी सी खरीद हो रही है उसमें 1200 रुपये से भी कम रेट मिल रहा है। यही धान कांग्रेस सरकार में 3,500 तक में बिका था। नमी के नाम पर किसानों का शोषण हो रहा है। शायद पहली बार ऐसा है कि धान, गेंहू से सस्ता बिक रहा है।’ उन्होंने आगे लिखा, ‘ऐसे में तो किसान की लागत भी नहीं निकलेगी। किसान अगली फसल कैसे लगाएगा? बिजली बिल में लूट चल ही रही है। मजबूरन किसान कर्ज के जाल में फंसता जाएगा। उत्तर प्रदेश सरकार तुरंत इसमें हस्तक्षेप कर किसान को सही दाम दिलाए वरना कांग्रेस पार्टी आंदोलन करेगी।’

धान ही नहीं, प्रदेश में मक्के की सरकारी खरीद भी सवालों के घेरे में है। उत्तर प्रदेश के नागरिक आपूर्ति विभाग की वेबसाइट के मुताबिक, खरीफ विपणन सीजन में 16 अक्टूबर तक मक्के की सरकारी खरीद के लिए सिर्फ 111 खातों का पंजीकरण हुआ है। अब इसके मुकाबले प्रदेश में मक्का उत्पादन को देखें तो 2018-19 में खरीफ सीजन में मक्के का उत्पादन 13 लाख 92 हजार टन था। इसमें भी 90 फीसदी मक्का सिर्फ खरीफ सीजन में ही पैदा होता है। यानी बंपर उत्पादन और एमएसपी घोषित करने के बावजूद मक्के की सरकारी खरीद के इंतजाम न के बराबर हैं। सवाल है कि जब एमएसपी पर किसानों की फसल बिक ही नहीं पाएगी तो इसके बने रहने या लागत का डेढ़ गुना दाम तय करने जैसे तमाम दावे जमीन पर कैसे उतरेंगे?

फसलों के दाम एमएसपी से भी नीचे होने की वजह से ही किसान केंद्र सरकार के इस दावे को खारिज कर रहे हैं कि नए कृषि कानूनों से उन्हें कोई फायदा होगा। किसानों का कहना है कि आखिर सरकार ने नए कानूनों में एमएसपी का कहीं पर कोई जिक्र क्यों नहीं किया है? 14 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम केंद्रीय कृषि सचिव को सौंपे ज्ञापन में भी किसानों ने यह सवाल उठाया है। उन्होंने फसलों की एमएसपी पर खरीद की गारंटी देने वाला कानून बनाने और निजी क्षेत्र को इसके दायरे में लाने की मांग की है। किसानों का आरोप है कि तीनों कृषि कानूनों से कृषि क्षेत्र में कॉरपोरेट्स को बढ़ावा मिलेगा, कृषि उपज मंडी समिति (एपीएमसी) एक्ट के तहत चलने वाली मंडियां खत्म हो जाएंगी, क्योंकि यह कर मुक्त बाजार का मुकाबला नहीं कर पाएंगी, इसके बाद सरकारें एमएसपी पर अनाज खरीद बंद कर देंगी।

हालांकि, इसके जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत पूरी सरकार लगातार दावे कर रही है कि एमएसपी और इसके आधार पर सरकारी खरीद जारी रहेगी। विश्व खाद्य दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री ने कहा कि एमएसपी पर फसल खरीद खाद्य सुरक्षा का हिस्सा है, इसलिए यह जारी रहेगी।

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