आवश्यक वस्तु (संशोधन) बिल-2020 को लेकर सरकारी दावे और किसानों के सवाल

महिला किसान दिवस पर उनके ‘मन की बात’

'महिला किसान दिवस' पर सुनिए ख़ास बातचीत, आदिवासी महिलाओं के जल, जंगल और ज़मीन के अधिकार को लेकर उनके संघर्ष और तीनों विवादित कृषि क़ानून से क्या हैं महिला किसानों के लिए आगे की चुनौतियाँ, क्या हैं डर? हिंद किसान ने AIl India Union for forest working People (AIUFWP) और आदिवासी अधिकारों से जुड़ी ऐक्टिविस्ट- #RomaMalik और UN Secy General के Youth advisory group on Climate Change की भारत से सदस्य, उड़ीसा की #ArchnaSoreng से बातचीत की।

किसान आंदोलन में कितनी ऐक्टिव हैं महिलाएँ?

जब दिल्ली के बॉर्डर्ज़ पर किसान और जनता खेती के मुद्दों और तीन कृषि क़ानून की वापसी को लेकर डटे हुए हैं, हिंद किसान ने राजधानी दिल्ली के बॉर्डर से दूर, राजस्थान के झुनझुनू से एक महिला ऐक्टिविस्ट से बातचीत की। ये तमाम महिलाओं के साथ collectorate पर धरना दे रही हैं , उनसे जाना कि तीनों कृषि क़ानून पर बने गतिरोध पर उनकी क्या प्रतिक्रिया है, आंदोलन को लेकर उनकी क्या तैयारी है? सुनिए उनकी मोदी जी से सीधी माँग- बात सीधी, मगर तीखी।

सरकार दिखा रही बड़प्पन, फिर फ़ैसले में देरी क्यूँ?

'सीधी मगर तीखी बात' में पूर्व कृषि मंत्री, सोमपाल शास्त्री जी की कृषि क़ानून पर सरकार की तरफ़ से मामले को सुलझाने के रवैये पर बेबाक़ राय। 15 जनवरी को किसानों और सरकार के बीच 9वे राउंड की वार्ता में कृषि क़ानून पर एक बार फिर कोई सहमति नहीं बन पायी, अगली तारीख़ 19 जनवरी की तय हुई है। किसानों ने शांतिपूर्ण आंदोलन को और तेज़ करने का संदेश दे दिया है।मामले में नए पेंच जुड़ रहे हैं, सुनिए ये ख़ास बातचीत।

वार्ता की मिली नयी तारीख़, कब बनेगी बात?

१५ जनवरी को कृषि क़ानून को लेकर सरकार और किसान की वार्ता एक बार फिर बेनतीजा रही, नयी तारीख़ १९ जनवरी तय हुई है, MSP के मुद्दे पर सरकार बचती रही जबकि उसी पर निर्णायक फ़ैसला लेने के मन से आए थे संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य, आख़िर कब तक टलता रहेगा MSP का मुद्दा और MSP के अलावा भी क्यूँ ज़रूरी हैं बाक़ी मुद्दे? क्या होगा आगे?

SC के आदेश से सुलझेगा या उलझेगा मामला?

SC ने १२ जनवरी को ३ कृषि क़ानून को अमल में लाने पर अगले ऑर्डर तक रोक लगा दी है, एक कमेटी का भी गठन कर दिया है ताकि ज़मीनी हालात का जायज़ा लिया जा सके, एक तरह से जो काम सरकार तमाम बैठकों के बावजूद नहीं कर पायी, कृषि क़ानून पर बने डेड्लाक को ख़त्म नहीं कर पायी उस पर एक कदम आगे बढ़ते हुए, SC ने ऑर्डर जारी कर दिया, क्या किसानों को स्वीकार है ये ऑर्डर? कौन है इस समिति के सदस्य, कितना सही है ये फ़ैसला? सुनिए महाराष्ट्र के Farm Activist - Vijay Jawandhia जी से ये ख़ास बातचीत।

कृषि से जुड़े केंद्र सरकार के तीन बिलों को लेकर सड़क से संसद तक हंगामा बरपा है. किसान, किसान संगठनों और विपक्ष के कड़े एतराज के बावजूद कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) बिल-2020 और किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा समझौता विधेयक-2020 संसद के दोनों सदनों, और आवश्यक वस्तु (संशोधन) बिल-2020 संसद से पास हो चुके हैं. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ये सभी विधेयक कानून बन जाएंगे और जून 2020 से ही लागू माने जाएंगे, क्योंकि सरकार ने इनसे जुड़े अध्यादेशों को जून में ही लागू कर दिया था.
10 प्वाइंट्स में समझिए कि 65 साल पुराने आवश्यक वस्तु अधिनियम-1955 में बदलाव करने वाले आवश्यक वस्तु (संशोधन) बिल -2020 को लेकर सरकार का क्या दावा है और किसान क्या सवाल उठा रहे हैं?

सरकार का दावा

  1. अनाज, दलहन, तिलहन, आलू और प्याज समेत दूसरी फसलों को आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर कर दिया गया है. यानी अब इन पर आवश्यक वस्तुओं से जुड़ी स्टॉक लिमिट की शर्तें लागू नहीं होगी. अब कारोबारी या कंपनियां किसानों से जितना चाहें उतनी फसलें खरीद सकेगी और उनका भंडारण कर सकेंगी.
  2. कंपनियों और निजी क्षेत्र को फसल खरीद की छूट देने से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी. इससे किसानों को उनकी फसलों की उचित कीमत मिल सकेगी.
  3. स्टॉक लिमिट हटने से बिक्री आधारित अर्थव्यवस्था बनेगी, कृषि उत्पादों की सप्लाई व्यवस्था में तेजी आएगी.
  4. आवश्यक वस्तु अधिनियम-1955 से बाजार की सप्लाई चेन में सरकार की दखल बहुत ज्यादा थी. इन बदलावों से लाइसेंस राज में कमी आएगी. निजी निवेश आने से सप्लाई चेन मजबूत बनेगी.
  5. असाधारण हालात जैसे युद्ध, अकाल, असाधारण मूल्य वृद्धि और गंभीर प्राकृतिक आपदा के समय स्टॉक लिमिट तय करने का प्रावधान भी है, ताकि कीमतों पर नियंत्रण रखा जा सके. जल्दी खराब होने वाले कृषि उत्पादों की कीमत में 100 फीसदी, जबकि टिकाऊ कृषि उत्पादों के दाम में 50 फीसदी का उछाल आने पर स्टॉक लिमिट की शर्त लगाई जा सकेगी.

क्या हैं किसानों के सवाल

  1. स्टॉक लिमिट से पाबंदी हटने के बाद कालाबाजारी बढ़ने का खतरा है. एक तरफ व्यापारी या कंपनियां किसानों से कम दाम पर फसलें खरीदेंगे, फिर उसे स्टॉक करेंगी और कृत्रिम महंगाई पैदा करके उसे ऊंचे दाम पर बेच सकती हैं. अभी प्याज और आलू के दाम में उछाल के पीछे इसी कानून के असर को वजह माना जा रहा है.
  2. कंपनियां या कारोबारी अपने पास पहले से स्टॉक होने का बहाना बना करके किसानों को कम कीमत पर फसल बेचने के लिए मजबूर कर सकती हैं. कोरोना संकट के दौरान इसकी बानगी देखने को मिल चुकी है
  3. कालाबाजारी होने से बाजार में अनिश्चितता आएगी. किसानों को फसलों के सही दाम नहीं मिलेंगे, वहीं जनता को चीजें ऊंचे दाम पर खरीदनी पड़ेंगी. बिचौलियों को दूर करने का दावा है, लेकिन स्टॉक लिमिट की छूट से नए किस्म के बिचौलिए बनेंगे.
  4. स्टॉक लिमिट न होने और बाजार में फसलों की कीमत में कृत्रिम उतार-चढ़ाव से सरकार को वस्तुओं की कमी या अधिकता का अंदाजा नहीं हो पाएगा. इससे सरकार को महंगाई और फसलों की कीमत के बीच संतुलन लाने में दिक्कत आएगी.
  5. प्रतिस्पर्धा में छोटे कारोबारियों और दुकानदारों को नुकसान उठाना पड़ सकता है.

संसद से पास होने के बाद अब ये विधेयक राष्ट्रपति के पास जाएंगे और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ये कानून बन जाएगा. हालांकि, इसे जून से ही लागू माना जाएगा, क्योंकि इन बदलावों को लागू करने वाले अध्यादेश जून से ही प्रभावी हैं.

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