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महाराष्ट्र सरकार की प्राथमिकताएं आदिवासियों और दूसरे ग्रामीणों को भारी पड़ रही हैं। इस कारण हज़ारों ग्रामीणों के लिए प्यास बुझाना रोज़मर्रा की जंग बन गया है। अगर आप मुंबई के आस-पास गांवों का दौरा करें, तो पहली नज़र में ये साफ़ हो जाएगा कि सरकार की प्राथमिकता मुंबईवासियों को निर्बाध पानी मुहैया कराना है। और इसकी क़ीमत गांवों के लोग चुका रहे हैं। ठाणे जिले का शाहपुर एक ऐसा ही तहसील है, जहां लोगों की ये बुनियादी ज़रूरत बड़ी मुश्किल से पूरी हो पाती है।

सुबह सात बजे गांव के कुएं पर पहुंची अनीता खारडे को क़रीब तीन घंटे कतार में खड़े रहने के बाद दो कलसी (बाल्टी) पीने का पानी मिल पाया। 40 वर्षीय अनीता महाराष्ट्र के कोठारे जनजातीय बस्ती में रहती हैं। पानी के बूंद-बूंद को तरस रहा यह इलाका ठाणे जिला के शाहपुरा तहसील में है। दिन के दस बजे जब अनीता अपने सिर पर पानी की दो भरी हुई कलसी रख कर 15 सीढ़ियां उतरती हैं- गर्मी, पसीना और भूख को झेलते हुए भी। यह पीड़ा सिर्फ अनीता की नहीं बल्कि इस जनजातीय बस्ती में रहने वाली सभी महिलाओं की है, जिन्हें हर रोज़ दो कलसी पीने के पानी के लिए पांच से छह घंटे जूझना पड़ता है।

शिवसेना के जाने माने नेता और पूर्व विधायक दौलत दरोडा के विधान सभा क्षेत्र में स्थित इस बस्ती में पीने का पानी महज़ एक कुएं में ही उपलब्ध है। यह जनजातीय क्षेत्र देश की वित्तीय राजधानी मुंबई से सिर्फ 100 किलोमीटर दूर है।

पहली बार गांव में पानी पहुंचाने के लिए पाइप लाइन बिछाने का काम क़रीब दस वर्षों के इंतज़ार के बाद शुरू हो पाया है। लेकिन इसे पूरा होने में अभी वक़्त लगेगा। फ़िलहाल हालत यह है कि गांव की कुछ महिलाएं रात में ही कुंए के पास आ कर सो जाती हैं, ताकि इस धूप और गर्मी में उन्हें लंबे समय तक कतार में न खड़ा रहना पड़े। जब तक पाइप लाइन चालू नहीं हो जाती, गांव की महिलाओं को हर रोज़ पीने का पानी इकट्ठा करने के लिए यह संघर्ष जारी रखना पड़ेगा। कुएं में जल-स्तर काफी नीचे जा चुका है। एक बार में एक कलसी पानी भी नहीं भर पाता। कुएं के पानी की गुणवत्ता इतनी ख़राब है कि यह पारदर्शी होने के बजाए मटमैला नज़र आता है। इसमें पेड़ों के पत्ते और कंकड़ भी मौजूद हैं। स्थानीय महिलाएं पानी से कंकड़ और पत्तों को हटाने के लिए कपड़े का उपयोग करती है, फिर भी शक है कि ये पानी पीने लायक़ पाता है।

कोठारे आदिवासी गांव में ही जन्मीं और विवाह के बाद यहीं रह रहीं 50 वर्षीय पदमा खोडा के परिवार में पांच सदस्य हैं। पदमा कहती हैं- “पहले गांव की हालत ऐसी नहीं थी, पानी की ये समस्या पिछले कुछ वर्षों में शुरू हुई है। जब तक पाइप लाइन नहीं बिछ जाता, हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। हमें ऐसे ही गुज़ारा करना पड़ेगा। परिवार में मैं अकेली महिला हूं इसलिए मूझे काफी मेहनत करनी पड़ती है।” पाइप लाइन बिछाने के काम की देख-रेख कर रहे गांव के ग्राम पंचायत सदस्य भाउ दरोडा ने बताया- “प्रशासनिक उदासीनता की वजह से पाइप लाइन बिछाने में इतना वक़्त लग गया है। 2008 में मंजूरी मिलने के बाद भी यह काम शुरू नहीं हो पाया। लंबे इंतज़ार के बाद हम लोगों ने काम शुरू करवाने के लिए स्थानीय प्रशासन के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करवाई। तब जा कर काम शुरू हुआ।”

सहयाद्री श्रेणी के पश्चिमी घाट पर्वतों से घिरे हुए शाहपुरा क्षेत्र में चार डैम हैं- भातसा, तानसा, वैतरणा और मध्य वैतरणा। इन्हीं बांधों से पूरी मुंबई को जल की सप्लाई की जाती है। मुंबई के कुछ आलीशान बंगलों में पानी की जमकर बर्बादी देखी जा सकती है। शहर में कुछ इलाके ऐसे भी हैं, जहां जल की आपूर्ति कभी नहीं रोकी जाती। यहां तक कि झुग्गियों में भी टैंकरों से सप्लाई होती है। जबकि शाहपुरा में प्यास बुझाने का भी पानी नहीं है।

मुंबई में कुछ रियल एस्टेट बिल्डर्स ने निर्माणधीन बहुमंजिला अपार्टमेंट्स में रहने वाले लोगों को 24 घंटे पानी देने का वादा किया है। इतना ही नहीं कुछ बिल्डरों ने तो आईसलैंड शहरी क्षेत्र में प्रत्येक फ़्लैट के साथ एक निजी स्वीमिंग पुल देने का प्रस्ताव भी दे डाला है। फ़िलहाल विभिन्न डैम और झीलों से मुंबई को हर रोज़ 3.4 अरब लीटर पानी उपलब्ध कराया जाता है। दूसरी तरफ मुंबई को पानी उपलब्ध कराने वाले शाहपुरा तहसील के तक़रीबन सभी जनजातीय गांवों के जलस्रोत फरवरी की शुरुआत में ही सूखने लग जाते हैं। इन इलाक़ों में चलाई जा रही जलापूर्ति योजनाएं भी ठीक से काम नहीं कर रहीं। हालात इतने बदतर हैं कि 15 दिनों में एक बार गांव में पानी पहुंच पाता है।

शाहपुरा तहसील के एक और गांव साखडबाव में दो कुओं को तोड़ दिया गया, ताकि स्थानीय लोग दूषित जल का इस्तेमाल न करें। इस गांव में कुंबी, दलित और जनजातीय लोगों की मिली-जुली आबादी है। क़रीब 225 घरों की आबादी वाले इस गांव के आधे लोगों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में उपलब्ध बोरवेल से पानी मुहैया कराया जाता है। लेकिन यह स्वास्थ्य केंद्र भी चिकित्सा अधिकारी के मनमानेपन का शिकार है। बोरवेल से पानी लेने में लोगों को काफी मुश्क़िलों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि इसे दिन में केवल चार से पांच घंटे ही चलाया जाता है। इसी गांव की कीर्ति परब सभी महिलाओं के दर्द को बयान करते हुए कहती हैं- “महिलाओं को कम-से-कम एक बाल्टी पीने का पानी लेने की अनुमति होनी चाहिए। इलाके के सभी गांवों में पानी इकट्ठा करना, खाना पकाना और घर की सफ़ाई करना महिलाओं की ही ज़िम्मेदारी है।” जबकि गांव के पुरूषों के पास बरसात के मौसम में चार महीने धान की खेती करने के अलावा कोई काम नहीं होता। अपनी परेशानियों का ज़िक्र करते हुए कीर्ति परब आगे कहती हैं- “मैंने सुबह सात बजे पानी का ड्रम रखा था, लेकिन दिन के 12 बजे तक पानी नहीं मिल पाया। हमारा पूरा दिन कतार में खड़े होकर या फिर पड़ोसियों से पानी के लिए लड़ते हुए गुज़र जाता है। मैं पानी इकट्ठा करने में लगी रहती हूं। इस वजह से कभी-कभी हमारे बच्चों को भूखा भी रहना पड़ता है। इसी तरह कपड़े धुलने के लिए हफ्ते या 15 दिन में एक बार हमें पांच किलोमीटर दूर पैदल जाना पड़ता है। गांव में शौचालय तो बन गए हैं, लेकिन पानी की कमी के कारण बंद पड़े हैं। लोगों को मजबूरी में खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है।”

गांव की एक अन्य महिला- रंजना गोर्ले कहती हैं- “हमारा पांच लोगों का परिवार है और मेरे पति की आय काफ़ी कम है। मेरी आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं कि टैंकर या किसी दूसरे माध्यम से पानी ख़रीद सकूं। आधा दिन तो दो बाल्टी पानी इकट्ठा करने में ही गुज़र जाता है। एक परिवार एक वक्त में दो बाल्टी पानी ही ले सकता है। दिन में दो बार क़तार में खड़ी होती हूं, तो गुज़ारे लायक पानी मिल पाता है। बाकी का वक़्त खाना बनाने और परिवार को खिलाने में गुज़र जाता है। ऐसे हाल में पैसे कमाने के लिए कोई और काम करूं भी तो आखिर कब?”

बगल के गांव रानावीर की हालत भी कमोबेश इसी तरह की है। गांव की सभी महिलाएं जब पानी इकट्ठा करने के लिए संघर्ष कर रही होती हैं, तो बस्ती के कुछ युवा उन महिलाओं से अटखेलियां करते तो नज़र आते हैं। लेकिन उनमें से कोई मदद के लिए आगे नहीं आता। गांव के युवा मनोज से यह पूछने पर कि वे औरतों की मदद क्यों नहीं करते, तो वो साफ़ कहते हैं कि “यह महिलाओं का काम है। हम यह काम नहीं करते”। मनोज ने 10वीं तक पढ़ने के बाद पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। उसने कई जगह काम किया, लेकिन अब तक उसे कोई स्थायी नौकरी नहीं मिल सकी है। इलाके में उद्योग और व्यवसाय नहीं होने के कारण गांव के ज़्यादातर युवा मनोज की तरह ही बेरोज़गार हैं। भिवंडी के करीब राजमार्ग से सटे कुछ बड़े स्टोर हाउस हैं, लेकिन वहां भी स्थायी तौर पर किसी को नहीं रखा जाता। इसलिए इलाके के ज़्यादातर लोग धान की खेती पर आश्रित हैं। अच्छी सड़क होने के बावजूद राज्य परिवहन निगम की केवल दो बसें ही यहां आना-जाना करती हैं। राज्य परिवहन की संख्या काफ़ी सीमित होने की वजह से गांव ज्यादातर लोग यातायात के लिए प्राइवेट जीप का सहारा लेते हैं। कुछ सक्षम लोग अपने निजी वाहन का इस्तेमाल भी करते हैं।

महाराष्ट्र में पानी की समस्या कोई नई बात नहीं हैं। मराठवाड़ा क्षेत्र लंबे से इसका शिकार रहा है। जब भी सूखे जैसी हालत पैदा होती है, विदर्भ और पश्चिमी महाराष्ट्र सबसे पहले उससे प्रभावित होते हैं। लेकिन मुंबई से सटे ठाणे जिला के ग्रामीण इलाकों की जल समस्या पर कई सालों से ध्यान नहीं दिया गया। इसी उपेक्षा का नतीजा है कि भारतीय जनता पार्टी सरकार की महत्त्वाकांक्षी मुंबई-नागपुर सर्मूधी एक्सप्रेस-वे परियोजना को लेकर भी लोगों में कोई ख़ास उत्साह नहीं नज़र आता।

फ़ोटो साभार: श्रुति जी.

सरकारी आंकड़े बनाम हक़ीक़त

वर्ष 2018-19 में जलापूर्ति और स्वच्छता विभाग के लिए महाराष्ट्र सरकार ने 6,365 करोड़ रुपए का बजटीय प्रावधान रखा। जल-आपूर्ति विभाग कई ऐसी योजनाएं चला रहा है जिसका उद्देश्य लोगों को स्वच्छ पेय जल उपलब्ध कराना, जल संरक्षण करना, पाइपलाइनों की मरम्मत और पुराने जल स्रोतों को फिर से जीवंत बनाना है। लेकिन जब योजना पर अमल की बात आती है, तो कहानी कुछ और ही नज़र आती है। राज्य वित्त आयोग के आंकड़ों के मुताबिक़ 2017-18 में राज्य जल आपूर्ति विभाग ने इन योजनाओं के लिए 4,303 करोड़ रुपए का वित्तीय प्रावधान किया था। लेकिन विभाग इसका केवल 35 प्रतिशत ही खर्च़ कर पाया। हाल ही में जारी महाराष्ट्र सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट 2017-18 को देखने पर यह साफ़ हो जाता है कि ज़मीनी स्तर पर बढ़ते जल संकट के बावजूद सरकार लगातार जल आपूर्ति के खर्च में कटौती कर रही है।

आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में स्वच्छ और पर्याप्त पेय जल उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम (NRDWP) के तहत आवंटित किए जाने वाले धन में पिछले तीन वर्षों के दौरान लगभग एक तिहाई कटौती की गई है।

वर्ष

गांवों/वाड़ियों की संख्या

गांवों/वाड़ियों की संख्या

  खर्च़ (करोड़ रु.में)

 

लक्ष्य

उपलब्धि

 

2015-16

1,611

1,566

1,068

2016-17

1,899

1,270

834

2017-18 (जनवरी तक)

978

265

330

राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम (NRDWP) का एक उद्देश्य पेयजल का संरक्षण सुनिश्चित करना भी है। इसे जल संक्षण के परंपरागत और ग़ैर-परंपरागत तरीकों को अपना कर कार्यान्वित किए जाने का लक्ष्य है। लेकिन इसका हाल भी निराशाजनक है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए घरों की छतों पर जल संचय करने, पहाड़ी इलाकों में टैंक बनाकर जल संचय करने, रिचार्ज शाफ्ट, रिचार्ज ट्रेंच, सीमेंट नाला बांध बनाने और कुओं को गहरा करने का तरीका सोचा गया है। लेकिन इस कार्यक्रम के लिए मुहैया कराए जा रहे फंड और इसके लक्ष्य का दायरा भी धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है।

वर्ष

गांव/बस्तियों की

संख्या

पूरा किया गया कार्य

(संख्या)

ख़र्च

(करोड़ रु. में)

2015-16

640

2686

18.16

2016-17

802

4396

8.91

2017-18 (जनवरी तक)

229

843

2.76

पिछले दो वर्षों में राज्य सरकार ने पेयजल की कमी से निपटने के लिए गांवों और वाड़ियों में अस्थायी पाइप लाइनों से जलापूर्ति करने, बोरवेल और अन्य जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने, पानी की कमी से जूझ रहे गांव और वाड़ियों में टैंकरों के जरिए पेय जल उपलब्ध कराने जैसी पहल की है।

कार्य

गांव

गांव

वाड़ी

वाड़ी

 

अक्टूबर 2015-जुलाई 2016

अक्टूबर 2016-जून 2017

अक्टूबर 2015-जुलाई 2016

अक्टूबर 2016-जून 2017

नए बोरवेल

3446

2482

2284

1570

अस्थायी पाइप लाइनों से जलापूर्ति-खासकर मरम्मत

1948

1250

177

142

बोरवेल की मरम्मत

1869

1215

1161

446

तात्कालिक तौर पर मुहैया कराई गई अस्थायी पाइपें कनेक्शन

493

315

20

37

टैंकरों/बैलगाड़ी से जलापूर्ति

5935

3791

6679

4549

निजी कुओं का अधिग्रहण

8894

6848

1651

1897

गहराई बनाना/कीचड़ सफाई

323

267

126

88

बुड़कियों का निर्माण

2

3

0

0

2016-17 में चार वर्षों के लिए महाराष्ट्र सरकार ने जलापूर्ति में सुधार और स्वच्छ एवं पर्याप्त पेयजल उपलब्ध कराने के लिए मुख्यमंत्री ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम की शुरुआत की। कार्यक्रम पर अमल के लिए 2,531 करोड़ रुपए का प्रवधान किया गया। इसके तहत अब तक 1,175 करोड़ रुपए की लागत से चलाई जाने वाली 520 जलापूर्ति योजनाओं और 24.75 करोड़ की लागत से चलने वाली 18 क्षेत्रीय जलापूर्ति योजनाओं के पुनरुद्धार को मंज़ूरी मिल चुकी है।

मुख्यमंत्री ग्रामीण पेय जल कार्यक्रम का लेखा-जोखा

विवरण

2016-17 (करोड़ रु. में)

2017-18 (करोड़ रु. में) जनवरी तक

नई जलापूर्ति योजनाएं

   

आवंटित की गई राशि

247.31

70.32

खर्च की गई राशि

75.93

3.57

रुकी हुई क्षेत्रीय जलापूर्ति योजनाओं को फिर से शुरू करना

   

आवंटित की गई राशि

32.69

खर्च की गई राशि

3.92

क्षेत्रीय ग्रामीण इलाकों के जलापूर्ति योजना की देख-रेख और मरम्मत

   

आवंटित की गई राशि

80.00

45.00

खर्च की गई राशि

8.92

कहीं ज़्यादा गंभीर है समस्या

महाराष्ट्र के औरंगाबाद स्थित जल एवं भूमि प्रबंधन संस्थान से रिटार्यड जल विशेषज्ञ प्रो. पुरंदरे इस समस्या को गंभीर संकट बताते हैं। उन्होंने सरकार द्वारा भावेली डैम का पानी नासिक के जनजातीय इलाकों की तरफ मोड़ दिए जाने पर चिंता जताई। कहा- “भाम, भावली और बुकने डैम से मराठवाड़ा क्षेत्र के सूखे इलाकों में जल उपलब्ध कराया जाता है। भावली डैम के पानी को शाहपुरा की तरफ मोड़ देने से मराठवाड़ा क्षेत्र में संकट और बढ़ जाएगा। मैं जनजातीय क्षेत्रों को पानी देने का विरोधी नहीं क्योंकि वे भी ज़रूरतमंद हैं, लेकिन मराठवाड़ा भी उसी तरह की समस्या से जूझ रहा है”।

फ़ोटो साभार: श्रुति जी.

प्रो. प्रदीप पुरंदरे का सुझाव है कि मुंबई को सप्लाई किए जा रहे पानी को कुछ हद तर सीमित कर पानी की बर्बादी पर अंकुश लगाया जा सकता है। ऐसा करने से जनजातीय क्षेत्रों को कम-से-कम पीने के लिए जल तो उपलब्ध हो पाएगा। प्रो. पुरंदरे के मुताबिक “फ़िलहाल मुंबई को हर रोज़ प्रति व्यक्ति 135 लीटर या उससे अधिक जलापूर्ति की जाती है, जबकि ग्रामीण इलाक़ों को प्रति व्यक्ति 40 लीटर पानी प्रति दिन के हिसाब से जल दिया जाता है। दिन प्रति दिन मुंबई की ज़रूरतों में इज़ाफ़ा होता जा रहा है, जबकि वहां ज़्यादातर पानी का री-साइकलिंग कर उसे दोबारा इस्तेमाल के लायक नहीं बनाया जाता। सरकार और स्थानीय प्रशासन जलापूर्ति वाली पाइप लाइनों में होने वाले रिसाव को रोकने पर भी कोई ख़ास ध्यान नहीं देते। उन्हें इन खामियों पर ध्यान देने के साथ समुद्री जल के इस्तेमाल की भी कोशिश करनी चाहिए।”

प्रगति अभियान से जुड़ीं अश्विनी कुलकर्णी का कहना है कि जल संकट अब बहु-स्तरीय समस्या बन चुका है। नासिक के जनजातीय इलाकों में पिछले 20 वर्षों से भी अधिक से सक्रिय अश्विनी कहती हैं- “यह चिंतन का विषय है कि नासिक और शाहपुरा इलाक़ों में अधिकतर डैम मौजूद हैं, फिर भी ये इलाके पानी की कमी का सामना कर रहा हैं। डैम निर्माण के दौरान जनजातियों के हाथ से उनकी ज़मीन ले ली गई। अब उन्हें पीने का पानी तक उपलब्ध नहीं। उनकी नज़रों के सामने पानी से भरे हुए डैम मौजूद हैं, लेकिन वे उस जल का इस्तेमाल नहीं कर सकते। उनके लिए इन बांधों से कोई नहर नहीं निकलती। इस इलाके में बारिश काफ़ी अच्छी होती है, लेकिन पानी का न तो संग्रह किया जाता है और न ही उसका सही इस्तेमाल हो पाता है। गांव में जलापूर्ति योजना के तहत पानी पहुंचाने का उपाय तो किया गया, लेकिन उद्गम स्थल सूख जाने के कारण नियमित रूप से जलापूर्ति नहीं हो पा रही।”

शाहपुरा इलाके की जल समस्या पर पिछले दस वर्षों से इस क्षेत्र में कार्य कर रहे प्रकाश खोदका बिल्कुल बुनियादी सवाल उठाते हैं। कहते हैं- “डैम की योजना बनाते समय स्थानीय लोगों के पेय जल की ज़रूरतों को ध्यान में नहीं रखा गया।… सरकार को डैम निर्माण के वक़्त ही इस तरफ ध्यान देना चाहिए था, लेकिन सरकार ने इसकी अनदेखी की। उनकी प्राथमिकता मुंबई के लोगों को जल आपूर्ति कर उनकी प्यास बुझाने की थी। पहले यहां कुओं में पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध था, जिससे यहां की छोटी आबादी का काम चल जाता था, लेकिन आबादी बढ़ने के कारण उपलब्ध पानी अब कम पड़ने लगा है।” क्षेत्र में चलाए जा रहे जल आपूर्ति कार्यक्रम के संबंध में खोदका ने कहा- “चूंकि पानी की उपलब्धता ही काफी कम है, इस वजह से पानी की आपूर्ति भी हमेशा नहीं हो पाती। आज जब पाइप लाइनों में पानी नहीं आ रहा, तब ग्राम पंचायतों को पाइप लाइन की मरम्मत का अधिकार दिया गया है, लेकिन अब कुछ भी नहीं किया जा सकता।”

तो साफ़ है कि शाहपुरा में गहराए जल संकट की सबसे बड़ी वजह है बिना सोचे-समझे पानी का रुख मुंबई की ओर मोड़ देना। अभी भी अगर सरकार बहुआयामी नज़रिया अपना कर काम करे, तो इस समस्या का समाधान ढूंढा जा सकता है। बड़ी-बड़ी परियोजनाओं में करोड़ो रुपए फूंकने के बजाए सरकार को कम लागत वाले समावेशी विकास के तरीक़ों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। तभी जाकर शायद इस तरह के संकट से उबरा जा सकता है।

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