आंध्र प्रदेश : हथकरघा कर्मियों से क्रूर मज़ाक

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परंपरागत आजीविका के क्षेत्र में हथकरघा एक मुख्य व्यवसाय रहा है। इस क्षेत्र पर आज भी करोड़ों लोगों की आजीविका निर्भर है। यह प्रदूषण रहित है क्योंकि इसमें न्यूनतम बिजली की खपत होती है। यह व्यक्ति के श्रम से विभिन्न जीवन-शैलियों के मुताबिक अच्छे कपड़े पैदा करके आजीविका और संस्कृतियों को बचाने का एक ज़रिया है। लेकिन अब सरकारों और उद्योगपतियों का नज़रिया इस क्षेत्र के लिए ख़तरनाक साबित हो रहा है। ये बात आंध्र प्रदेश सरकार की नीतियों से जाहिर है।

हथकरघा से संबंधित दूसरी जनगणना 1995 में हुई थी। उसके अनुसार आंध्र पदेश में कुल 1.5 लाख घरों में हथकरघा था। तीसरी जनगणना यानी 2010 में यह संख्या 1.3 लाख रह गई। भारत के नियंत्रक और महालेखाकार के अनुसार प्रदेश में 3.50 लाख बुनकर और सहायक श्रमिक वर्ष 2011 में थे। प्रत्येक हथकरघा पर एक परिवार की आजीविका निर्भर होती है। यदि एक परिवार में कुल 5 व्यक्ति हैं, तो आंध्र में हथकरघा पर आश्रित कुल जनसंख्या 6.5 लाख है। इसके आलावा हथकरघा से जुड़े आजीविका के दूसरे संसाधन भी हैं- जैसे मिल, कॉटन की खेती, आदि। इन सबके आंकड़े मिलकर देखें तो आश्रितों की संख्या लाखों हो में जाएगी ।

आंध्र प्रदेश की आबादी 8.46 करोड़ है। अर्थात हथकरघे पर निर्भर परिवारों की संख्या 7 से 12 प्रतिशत के बीच हैं। हथकरघा सर्वेक्षण 2010 के अनुसार प्रदेश में एक हथकरघा बुनकर की औसत आमदनी रु. 82 रुपए रोज़ाना है ।

आंध्र प्रदेश में हथकरघा बुनकरों की आत्महत्या की ख़बरें लगातार आती रहती हैं। वर्ष 2011 में सीएजी की जांच में इन आत्महत्याओं के मुख्य कारण ये बताए गए- यार्न के मूल्य में वृद्धि, पावर लूम से प्रतियोगिता, कम मज़दूरी, उत्पाद बेचने के लिए बाज़ार तक नहीं पहुंच पाना, व्यवसाय के लिए क़र्ज़ का नहीं मिलना,आदि।

बजट खोलता है पोल

फ़ोटो साभार : आईएएनएस

क्या सरकार ने इन आत्महत्याओं के कारणों का समाधान ढूंढने के उपाय किए हैं? इस बारे में सच क्या है, इसको वर्ष 2018-19 के बजट पर ध्यान देते हुए बखूबी देखा जा सकता है। राज्य सरकार का वर्ष 2017-18 में कुल बजट 1,56,999.40 करोड़ रुपए था, जो वर्ष 2018-19 में 34,064.21 करोड़ रुपए हो गया। यानी 21.69 फ़ीसदी की वृद्धि हुई। इस बजट की तारीफ़ या निंदा करने से पहले हथकरघा क्षेत्र की जिन नीतियों पर अमल के लिए बजट का प्रावधान हुआ, उसकी जांच पड़ताल की जा सकती है। इस क्षेत्र के लिए हथकरघा और वस्त्र विभाग अलग से अपनी मांगें रखता है। इस विभाग का वर्ष 2017-18 में कुल बजट 231.25 करोड़ रुपए था, जो वर्ष2018-19 में 372.43 करोड़ रुपए हो गया। अर्थात कुल 141.18 करोड़ रुपए की वृद्धि हुई है।

इसके आगे विभिन्न मदों में आवंटित बजट का मुआयना करने से पता चलता है कि भारतीय हथकरघा प्रौद्योगिकी संस्थान, वेंकटगिरी (S.H.37, पेज 23) में कार्यरत कर्मचारियों के वेतन के मद में वर्ष 2017-18 में 79.46 लाख रुपए रखा गया था। 15.87 लाख की कटौती करके वर्ष 2018-19 में इसे 63.59 लाख रुपए कर दिया गया। यह संभवत: इस संस्थान को धीरे-धीरे बंद करने का प्रयास है। इसी संस्थान के दूसरे मद “अन्य प्रशासनिक खर्च” (पेज 24) में वर्ष 2018-19 में दो करोड़ रुपए आवंटित किया गया है। इस संस्थान का कुल बजट वर्ष में 137.09 लाख रुपए था। वर्ष 2018-19 में यह 308.99 लाख रुपए है। अगर हम “अन्य प्रशासनिक खर्च” में आवंटित दो करोड़ रुपए की राशि को अलग कर दें, तो इस वर्ष का शेष बजट महज 108.99 लाख रुपए रह जाता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि सरकार ने 28.01 लाख रुपए की कटौती की है।

ब्याज़ में सब्सिडी/छूट (पेज 25) स्कीम में वर्ष 2016-17 में 4.64 करोड़ रुपए ख़र्च हुआ। 2017-18 में 6.00 करोड़ रुपए आवंटित हुए। यानी वर्ष 2018-19 में इस आवंटन को घटाकर चार करोड़ रुपए कर दिया गया। हथकरघा क्लस्टर विकास कार्यक्रम (पेज 25) में वर्ष 2016-17 में 25 करोड़ रुपए ख़र्च हुए। लेकिन उसके बाद के दोनों वर्षों में इसमें कोई आवंटन नहीं हुआ। अर्थात यह कार्यक्रम समाप्त कर दिया गया है।

फ़ोटो साभार : आईएएनएस

बुनकरों की आजीविका बढ़ाने के लिए सहायता (पेज 25) स्कीम के लिए “अन्य सहायता अनुदान” मद में 2017-18 में 23.42 करोड़ रुपए का आवंटन हुआ था, जिसमें 176.58 करोड़ रुपए की वृद्धि करके इसे 2018-19 में 200 करोड़ रुपए किया गया। क़र्ज़ में डूबे हुए बुनकरों का क़र्ज़ माफ़ करने के लिए सिर्फ़ एक लाख रुपए आवंटित हुए हैं। हथकरघा और वस्त्र उद्योग की तरक़्क़ी के लिए वित्तीय सहायता (पेज 26) वर्ष 2017-18 में 50 करोड़ रुपए आवंटित हुए थे। इसे घटा कर 2018-19में 25 करोड़ रुपए कर दिया गया है। कच्चा माल ख़रीदने पर सब्सिडी (पेज 26) के लिए 2017-18 में 8 करोड़ रुपए और 2018-19 में 11 करोड़ रुपए आवंटित किए गए।

कम-से-कम हथकरघा के क्षेत्र में बजट के आंकड़ों की पूरी तस्वीर को एक साथ देखने से नीतियों और बजट निर्माण और नियमन में एक अव्यवस्थित मानसिकता नजर आ रही है। कुछ कार्यक्रमों में पैसे ख़र्च होते रहे हैं, लेकिन इस वर्ष उनके लिए बजट खत्म कर दिया गया है। मौजूदा कार्यक्रमों के नियमन और उन पर अमल की खामियों को दूर करने के बजाय समस्यायों के समाधान के लिए नए कार्यक्रम शुरू किए गए हैं। व्यावहारिक तौर पर कार्यपालिका पूरी तरह से मशीनी ढंग से काम नहीं कर सकती। इसलिए अचानक वह बुनकरों की समस्याओं का समाधान करने के लिए नए कार्यक्रमों को पूरी तरह से आत्मसात नहीं कर लेगी।

भ्रम पैदा करने की कोशिश

फ़ोटो साभार : एचईपीसी इंडिया

दूसरी तरफ सरकार बजट बढ़ाने का दावा कर सकती है। उससे सच्चाई और दावों को लेकर जनता में भ्रम पैदा हो सकता है। इस तरह की भ्रामक स्थिति राजनेता बहाने ढूंढते हैं और उत्पन्न समस्याओं की जवाबदेही लेने से बचने के मौके खोजते हैँ। ऐसी ही प्रवृत्तियों का नतीजा है कि हथकरघा पर निर्भर लोगों में ग़रीबी,उन पर क़र्ज़ का बोझ, भुखमरी और आत्महत्याएं बढ़ती जा रही हैं।

सिर्फ़ एक नई स्कीम में 176.58 करोड़ रुपए की बढ़त से 2018-19 में इस स्कीम का बजट 200 करोड़ रुपए हो जाता है, जबकि विभाग के कुल बजट में मात्र 141.18 करोड़ रुपए की बढ़ोतरी हुई है। मतलब यह कि ऐसे बहुत-से छोटे-छोटे कार्यक्रम हैं, जिनके औचित्य से समझौता किया गया है। कहीं निम्नतम बढ़ोतरी, तो कहीं पूरी कटौती और कहीं हास्यास्पद बजट आवंटित हुआ है। इस तरह बजट के अंक गणित में हेरफेर करके विभागीय बजट को बढ़ा हुआ दिखा दिया गया है।कुछ योजनाओं में बजट घटाने या कुछ योजनाओं को बंद किए जाने से न केवल हथकरघा बुनकर प्रभावित होंगे, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था पर भी इसका बहुत बुरा असर होगा।

क्या इस तरह बुनकरों की आजीविका को संकट में नहीं डाला जा रहा है? ख़ास बात यह कि इसकी जवाबदेही से बचने का पूरा इंतजाम भी कर लिया गया है। यह संभव है कि ऐसा बुनकरों के आलावा और दूसरे क्षेत्रों की आजीविका के साथ भी हो रहा हो। ऐसा करना सिरे से जन विरोधी है। लिहाजा सरकार और विपक्ष की भी यह नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वे ऐसी स्थिति की तहक़ीकात करें और नीतियों तथा स्थिति को बदलने के लिए उचित कदम उठाएं।

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