आखिर ‘किसान सीज़न’ का सच क्या है?

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किसान अचानक राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गए दिखते हैं। अब नरेंद्र मोदी सरकार भी खुद को किसानों की हितैषी दिखाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है, जबकि हकीकत यह है कि पिछले साढ़े तीन साल में ग्रामीण इलाके में बढ़े संकट का एक प्रमुख कारण उसकी ही नीतियां हैं। उसने सत्ता में आते ही ऐसे कई कदम उठाए, जिससे ग्रामीण आबादी की आमदनी गिरने की शुरुआत हुई। इनमें किसानों को मिलने वाले बोनस को रोकने की कोशिश भी शामिल थी। इसके लिए राज्य सरकारों को बाकायदा केंद्र ने सलाह दी थी। उसका तर्क था कि बोनस देने से खाद्य पदार्थों की कीमत में असंतुलन पैदा होता है। इसका मतलब था कि किसानों को अधिक कीमत मिलने से उनकी उपज महंगी होती है। मौजूदा सरकार की राजनीतिक गणनाओं में उपभोक्ताओं- खासकर मध्यवर्गीय उपभोक्ताओं- को सस्ता अनाज मुहैया कराना ज्यादा अहम था। उसने इसका इंतजाम किसानों को मिलने वाले उपज के दाम को नियंत्रित करके किया। इसीलिए अब केंद्र और कई राज्यों की भाजपा सरकारें किसान समर्थक दिखने की कोशिश कर रही हैं, तो ये बात थोड़ी अजीब-सी लगती है।

बहरहाल, चुनावी लोकतंत्र के कुछ अपने तकाजे होते हैं। चुनाव का समय आने पर अक्सर राजनीतिक दलों को कुछ ऐसे एलान भी करने होते हैं, जो असल में उनकी प्राथमिकता नहीं होते। गुजरे साढ़े तीन का अनुभव यह है कि ग्रामीण भारत बीजेपी सरकार की प्राथमिकता नहीं है। शुरुआत से ही उसने “नव-आकांक्षा वाले भारत”का ज्यादा ख्याल किया है। अगर वर्गीय और सामाजिक विश्लेषण करें, तो उच्च वर्ग, मध्य वर्ग, शहरी आबादी और सवर्ण जातियां ही इस भारत का हिस्सा नज़र आएंगी। इस ‘भारत’ की नज़र में आबादी के बाकी हिस्से सरकारी टुकड़ों (यानी सब्सिडी) पर पलने वाले जन-समूह हैं। उन पर होने वाले सरकारी खर्च को ये ‘भारत’करदाताओं (यानी उसके) के धन की बर्बादी मानता है। 2011 से यूपीए के खिलाफ ‘भ्रष्टाचार’ का राजनीतिक कथानक बनाने में इस ‘भारत’ की सबसे बड़ी भूमिका रही। 2013-14 में ‘मोदी लहर’ बनाने में सबसे बड़ा रोल इसी तबके ने निभाया। पिछले आम चुनाव के समय से यह ‘भारत’ मजबूती से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में गोलबंद रहा है। इसका साथ बना रहे, इसे सुनिश्चित करना मोदी नेतृत्व वाली बीजेपी की प्राथमिकता रही है।

मगर दूसरी हकीकत यह है कि यह ‘भारत’ चुनावी राजनीति में बीजेपी को एक मजबूत आधार भले मुहैया कराता हो, लेकिन उसकी जीत सुनिश्चित करने के लिए यह काफी नहीं है। जीत का गणित तभी बनता है, जब वर्गीय और जातीय-सांप्रदायिक आधार पर गोलबंद हुए ऐसे जन-समूहों के साथ कुछ ऐसे तबके भी जुड़ें, जिनके पास संख्या बल है। 2014 में ‘अच्छे दिन’ के सपने से ऐसे जन-समूह बीजेपी के पाले में गए थे। वो सपना अब टूट चुका है। नरेंद्र मोदी ने उन्हें फिर से लुभाने के लिए 2022 तक ‘न्यू इंडिया’ बनाने का सपना सामने रखा है, लेकिन ये वादा लोगों को लुभा पाया है, इसके अभी कोई संकेत नहीं हैं। बहरहाल, इसी सिलसिले में कई और नारे सत्ताधारी दल ने उछाले हैं। उनमें 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करने की बात भी है।

हाल में किसानों के हक में हुई घोषणाओं को इसी नारे को विश्वसनीय दिखाने की कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए। इस सिलसिले में यह ध्यान में रखना चाहिए कि किसानों और कृषि क्षेत्र को लेकर हाल के दशकों में एक खास विमर्श विकसित हुआ है। इसके तहत 1995 के बाद तकरीबन तीन लाख किसानों की आत्म-हत्या, सर्वेक्षणों में तीन चौथाई किसानों के खेती छोड़ने की इच्छा जताना और देहाती इलाकों में हाल में गिरते गए जीवन-स्तर से संबंधित आंकड़ों का बार-बार जिक्र हुआ है। फिर ये सच सामने है कि पिछले साढ़े तीन साल में अपनाई गई सरकारी नीतियों और नोटबंदी जैसे फैसलों ने ग्रामीण क्षेत्र की बदहाली और बढ़ा दी है। इन हालात का ही नतीजा है कि पिछले साल के मध्य से देशभर के किसान संगठन आंदोलन की राह पर हैं। अब इन स्थितियों का असर चुनावी राजनीति पर भी पड़ने के संकेत मिल रहे हैं। गुजरात के विधान सभा चुनाव और हाल के कई उपचुनावों के नतीजों को इसी बात की मिसाल माना गया है।

फिलहाल आए ‘किसानों के सीज़न’ की यही पृष्ठभूमि है। तो अब सीमित कर्ज माफ़ी, उपज पर फ़ौरी बोनस आदि जैसी घोषणाओं से किसानों को लुभाने की कोशिश की जा रही है। इस बीच कर्नाटक और तेलंगाना में किसानों की तय आमदनी सुनिश्चित करने की योजनाएं भी घोषित हुई हैं। वे सफल हुईं, तो उससे बेशक किसानों की कुछ समस्याएं हल होंगी। इसके बावजूद यह ध्यान में रखने की बात है कि ऐसे उपाय पूरे ग्रामीण क्षेत्र की खुशहाली का रास्ता नहीं हैं। 2011 की जनसंख्या के मुताबिक भारत की 24.6 फीसदी आबादी का पेशा किसानी है। इसके अलावा 30 फीसदी आबादी खेतिहर मजदूर है। किसानों के बीच भी बहुसंख्या छोटे और सीमांत कृषकों की है। यानी ऐसे किसानों की, जो अपनी जमीन के अलावा बड़े किसानों जमीन पर मजदूरी भी करते हैं। इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में दस्तकारी या शारीरिक श्रम करने वाले दूसरे तबके हैं। फिलहाल, किसानों को उपज का ज्यादा दाम देने या फ़सली कर्ज माफ़ करने या उनकी आमदनी सुनिश्चित करने के जो एलान हो रहे हैं, उनसे बटाईदार किसानों, खेतिहर मजदूरों और बाकी ग्रामीण आबादी को कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं होगा। उन्हें फायदा तभी हो सकता है, जब पूरी ग्रामीण आबादी के हितों पर खराब असर डालने वाली नीतियों को बदला जाए। मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी दिलाने और सभी ग्रामीण उत्पादों को लाभकारी बाजार दिलाने के उपाय हों। जाहिर है, सरकार ने इसकी कोई इच्छा नहीं दिखाई है।

इस परिस्थिति में ये कहना शायद गलत नहीं होगा कि बीजेपी सरकार अपनी जानी-पहचानी चुनावी गणना के तहत ही फिलहाल खुद किसानों का हितैषी दिखाने की कोशिश कर रही है। बीजेपी के रणनीतिकार निजी बातचीत में अक्सर कहते सुने जाते हैं कि राष्ट्रीय चुनाव जीतने के लिए 31-32 प्रतिशत वोटों की जरूरत है। 18 से 20 प्रतिशत बीजेपी के कोर (अपने) वोटर हैं। यानी वो मतदाता को हिंदुत्व के समर्थक हैं। पिछले साढ़े तीन साल में हिंदुत्ववादी एजेंडे से बीजेपी ने और 5-6 फीसदी मतदाताओं को सांप्रदायिक आधार पर गोलबंद किया है। उसके ऊपर वह 6-7 प्रतिशत और मतदाताओं को न्यू इंडिया या दोगुना आमदनी जैसे सपनों के जरिए जोड़ पाई, तो 2019 का चुनाव की बैतरणी वह पार कर जाएगी। राज्यों में भी बीजेपी इसी गणना और रणनीति के हिसाब से चली है। 2014 से अब तक ज्यादातर जगहों पर उसकी ये सोच कामयाब रही है।

यह अनुमान गलत नहीं है कि विपक्षी दलों का कोई महागठबंधन नहीं बना, तो 2019 में भी बीजेपी की ये रणनीति सफल हो सकती है। उसकी नीतियों ने ज्यादातर ग्रामीण जन-समूहों और गरीबों की जिंदगी को बदतर बनाया है। इसके बावजूद बीजेपी के पास शायद इतने वोटों का इंतजाम है, जिसके आधार पर वह एक बार फिर पूरे केंद्र की सत्ता में आने की रणनीति बना सकती है। किसान को चर्चा में लाना इसी रणनीति का हिस्सा है। यहां ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि किसान वैसे चाहे जितने वंचित हों, लेकिन उनका बड़ा हिस्सा बाकी ग्रामीण आबादी से बेहतर स्थिति में है। उनमें ज्यादातर सवर्ण या सक्षम जातियों से आते हैं। पारंपरिक पूर्वाग्रहों को भड़काते हुए उन्हें जातीय और सांप्रदायिक आधार पर गोलबंद करना कठिन नहीं है। इसीलिए तमाम कृषि संकट के बावजूद बीजेपी की उम्मीदें जिंदा हैं। इसीलिए वह गरीब- पिछड़े समूहों और उत्पीड़ित जातियों एवं उपेक्षित समुदायों को नज़रअंदाज करते हुए अपनी चुनावी रणनीति बना रही है। क्या यह सफल होगी? इस सवाल का जवाब इससे तय होगा कि मतदान के वक्त किसानों के मन पर उनके आंदोलन के दौरान उठे मुद्दे हावी रहेंगे, या अपने सामाजिक पूर्वाग्रहों में बहकर वे दिखावटी वादों से बहल जाएंगे?

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