सांप्रदायिक नीतियों का भयानक परिणाम

किसान आंदोलन: पूरे हुए 4 महीने, क्या हुआ हासिल?

कृषि क़ानूनों का विरोध और MSP की गारंटी की माँग को लेकर देश भर में संयुक्त किसान मोर्चा ने आंदोलन के 120...

किसान महापंचायत की गूंज, दक्षिण भारत में भी

किसान महापंचायत की गूंज दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक में भी सुनाई दी, BKU के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत समेत दूसरे किसान...

ग़ाज़ीपुर बॉर्डर से किसानों का फूटा ग़ुस्सा

किसान आंदोलन को लगभग 4 महीने होने को आए, किसान सरकार की बेरुख़ी और उनकी माँग अनसुनी करने को लेकर काफ़ी ख़फ़ा...

किसान आंदोलन: राजनीति या आजीविका की लड़ाई?

किसान आंदोलन देश के अलग अलग राज्यों में बढ़ता जा रहा है, जिन ५ राज्यों में चुनाव है वहाँ केंद्र में सत्ताधारी...

कृषि आंदोलन: क्या है किसानों का मूड?

कृषि आंदोलन को 115 दिन होने को आए, इस बीच ये आंदोलन पंजाब-हरियाणा- उत्तर प्रदेश-राजस्थान-मध्य प्रदेश के बाद अब उन राज्यों में...

मोदी सरकार के कार्यकाल का ये अंतिम साल है। किन उपलब्धियों और कामयाबियों को लेकर बीजेपी फिर जनता के पास जाएगी, इसको लेकर सरकार की बेचैनी अब साफ़ नज़र आ रही है। अच्छे दिनों के वादे, भ्रष्टाचार-मुक्ति, विकास और रोज़गार के बड़े-बड़े दावों के साथ बीजेपी सत्ता में आई थी। चुनावी रैलियों में जनता से कांग्रेस पार्टी के 60 सालों की ‘कोताहियों’ को ठीक करने के लिये सिर्फ़ 60 महीने देने की गुहार तब नरेंद्र मोदी ने की थी। अब 45 महीने गुज़र जाने के बाद, जनता के दरबार में फिर से जाने के लिए उनके पास न तो विकास का तोहफ़ा है और न ही रोज़गार के चमकते आंकड़े।

हालांकि 2017 में राज्यों में हुए चुनाव में बीजेपी ने अपनी जीत का सिलसिला जारी रखा, लेकिन पिछले साल के अंत में आए गुजरात चुनाव के नतीजे बताते हैं कि ख़ासकर ग्रामीण भारत में बीजेपी की चुनावी ज़मीन खिसक गई है। गुजरात में कांग्रेस पार्टी से मिली कड़ी टक्कर और गांवों में रहने वाले लोगों की नाराज़गी के बीच शहरी वोटरों ने ही बीजेपी की जीत को सुनिश्चित किया। 2019 के चुनाव में जनता के सामने हाज़री लगाने से पहले इसी साल 8 राज्यों में चुनाव हैं, जिसमें कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे अहम राज्य भी हैं। शायद यही वजह है कि ताज़ा आम बजट में सरकार ने किसानों की हितैषी दिखने की पूरी कोशिश की।

इसके बावजूद अपनी आर्थिक नीतियों की कामयाबी के रथ पर सवार होकर शायद ही बीजेपी चुनाव में उतरने का दम रखती हो। पिछले करीब चार सालों में लव-जिहाद से लेकर राम मंदिर तक अपनी राजनीतिक और सामाजिक नीतियों में विभाजनकारी तत्वों की मौजूदगी के अलावा अपनी आर्थिक नीतियों में भी सांप्रदायिकता का रंग वो घोलती रही है। हिंदू वोट बैंक को साधने की मंशा रखते हुए पिछले साल मई में केंद्र सरकार ने बेहद विवादित पशु क्रूरता निवारण अधिनियन 1960 के नियमों में बदलाव किया। हालांकि इस कानून पर पहले सुप्रीम कोर्ट का स्टे लगा और फिर 6 महीने के भीतर ही सरकार को इसे वापस लेना पड़ा। क़ानून तो वापस हो गया, लेकिन ज़मीन पर गायों को बचाने के नाम पर उगाही और गुंडागर्दी कर रहे गौ-रक्षकों की वापसी नहीं हुई।

पुलिस और प्रशासन की गौ-रक्षकों के साथ मिली-भगत और खुले सरकारी संरक्षण से उनके हौसले इतने बुलंद हैं कि जैसे उन्हें एक अघोषित क़ानूनी मान्यता मिली हो। गौ-रक्षकों के आतंक का स्तर ये है कि गांवों में पशु बेचना या बेचने के लिए एक जगह से दूसरी जगह ले जाना ख़तरे का सौदा बन गया। बहुत से किसानों ने जान को कीमती जानते हुए, पशुओं को खुला छोड़ देने में ही अपनी भलाई समझी है। लेकिन इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की चूलें हिल गई हैं। इऩ सांप्रदायिक नीतियों के नतीजे के तौर पर पहले ही मुश्किल से गुज़ारा कर रहे सीमांत किसानों के ग़रीबी की रेखा से नीचे चले जाने का गंभीर ख़तरा है। यानी गरीबी की रेखा के नीचे जिंदगी जी रहे लोगों की तादाद में और इज़ाफ़ा।
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आर्थिक नीतियों में सांप्रदायिकता के इस घोल से आम किसान तो परेशान है ही, लेकिन सबसे ज़्यादा समस्याग्रस्त हैं आर्थिक और सामाजिक रूप से कमज़ोर तबक़े- अल्पसंख्यक और दलित। एक तरफ़ जहां मीट के कारोबार से जुड़े मुस्लिम समुदाय के लोगों की रोज़ी-रोटी के लिये संकट बन गया है, वहीं मृत जानवरों के खाल के व्यवसाय से जुड़े दलितों की हालत भी तबाह है।

पहले 2014 में केंद्र में मोदी सरकार औऱ अब 2017 में उत्तर प्रदेश में चुनी गई योगी सरकार की राजनीति ने अल्पसंख्यकों और दलितों के लिए आतंक का माहौल बना दिया है, जिसमें सामान्य स्तर पर कारोबार करना और रोजमर्रा का जीवन जीना भी दूभर है ।
इस मामले का दूसरा पहलू ये है कि योगी सरकार में सिर्फ़ मंत्रियों की तादाद ही नहीं, बल्कि पुलिस और प्रशासन में भी उच्च जाति का दबदबा साफ़ दिख रहा है। 75 एसपी में 42 उच्च जाति से है, जिसमें 13 ठाकुर औऱ 20 ब्राह्मण हैं। 21 ओबीसी जातियों से हैं। मुस्लिम सिर्फ दो हैं। साफ़ है कि प्रशासन में उच्च पदों पर दलितों और मुसलमानों की लगभग ग़ैर-मौजूदगी उऩकी समस्याओं में इज़ाफा कर रही है।

एक तरफ़ जहां बूचड़खानों के बंद होने से हज़ारों मीट कारोबारी बेरोज़गार हो गए हैं और इस कारोबार में निचले स्तर पर काम करने वाले लोग सड़क पर आ गए हैं, वहीं दशकों से पारंपरिक रूप से मृत जानवरों की खाल उतारने का काम करने वाले दलित, अपने रोज़-मर्रा का काम करने के दौरान भी आतंक के साये में जी रहे हैं। मृत जानवर की खाल उतारने पर दलित व्यक्ति की हत्या का मामला सबसे पहले अटल बिहारी वाजपेई की सरकार के दौरान सामने आया था। 15 अक्तूबर 2002 में हरियाणा के झज्जर में मृत गाय की खाल उतारने के लिए 5 दलितों की हत्या कर दी गई। और अब मृत गाय की खाल उतारते हुए ही, मोदी राज में गुजरात राज्य में दलितों की सरे-आम पिटाई देखने को मिली। उत्तर प्रदेश से भी खाल के काम में लगे दलितों को सताये जाने की खबरें लगातार आ रही है।

गौ-हत्या पर पाबंदी तो कांग्रेस पार्टी की ही नीति का नतीजा है, लेकिन गौ-हत्या कानून पर सबसे पहले संजीदगी दिखाने का काम एनडीए-1 यानी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने शुरू किया। हिंदूत्व की राजनीति ने जब सत्ता का स्वाद चखा, तो इस राजनीति में दलितों की जगह क्या होगी इसकी एक बानगी झज्जर की घटना के तौर पर तब देखने को मिली। जाने-माने दलित चिंतक कांचा इलाइया कहते हैं कि पहली बार भारत में खाल-के बदले-खाल के नारे गूंजे। यानी एक मृत गाय की खाल के बदले, एक ज़िंदा दलित की खाल। एक दशक से ज्यादा गुज़रने के बाद अब वो नीति पूरे ज़ोर-शोर के साथ नरेंद्र मोदी सरकार अमल में ला रही है, जब हिंदुत्व की राजनीति अपने शबाब पर है।

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