तीन वार्षिक योजनाएं और हरित क्रांति

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तीसरी पंचवर्षीय योजना में आसमानी आफत और पड़ोसियों के हमलों से देश में भारी तबाही का असर कृषि पर सबसे ज्यादा पड़ा था। कृषि क्षेत्र के लिए पांच साल की लंबी अवधि की सरकारी योजनाएं सुचारू रूप् से चला पाने में मुश्किल दिख रही थी। लिहाजा चौथी पंचवर्षीय योजना को कुछ समय के लिए स्थगित करना पड़ा। बहुत संभव है कि योजनाकारों ने यह माना कि लम्बी अवधि के लक्ष्य बनाने के लिए माहौल माकूल नहीं है। लिहाज़ा चौथी पंचवर्षीय योजना की बजाए सन् 1966 से 1969 तक एक एक साल की तीन योजनाएं बनीं। हर साल नतीजों के आधार पर अगले साल की रणनीति तय की गई। ये वह समय था जिसे हरित क्रांति की शुरुआत के रूप में देखा जाता है।

दरअसल उस समय हम कृषि उत्पादन को लेकर गंभीर चिंता में थे। इसी चिंता को दूर करने का चौतरफा काम हुआ। एक तरह से कह सकते है कि आवश्यकता ने हरितक्रांति के रूप् में आविष्कार करा दिया। आज तक माना जाता है कि हरित क्रांति ने भारतीय कृषि का रूप हमेशा के लिए बदल दिया।

वार्षिक योजनाओं के मुख्य पहलू

इन तीन सालाना योजनाओं में कृषि के विकास और विस्तार के लिए कुछ नए उपाय किए गए। इसका मुख्य मकसद था देश के लिए खाद्य आत्मनिर्भरता। उस दौरान भारतीय कृषि के विकास के लिए एक ऐतिहासिक फैसला किया गया। यह था भारत में बड़े पैमाने पर हाई यील्डिंग वैरायटी प्रोग्राम शुरू करना। सरकार ने मेक्सिको में बनाए गए गेंहू और फिलीपींस में विकिसित किए गए चावल के उन्नत बीजों को भारत में प्रोत्साहित करना शुरू किया। यह कृषि के क्षेत्र में आधुनिकता के प्रवेश का कदम था। कई कारणों से परंपरावादी लोग इस कदम का कितना भी विरोध करते रहे हों, लेकिन इस तथ्य पर आज तक गौर नहीं किया गया कि तब की आपात स्थिति में पर्याप्त अनाज उत्पादन का दूसरा कारगर उपाय क्या हो सकता था?

फ़ोटो साभार : जयंता देय / रॉयटर्स

आज विज्ञान के क्षेत्र में विकास होने के बाद पिछली तारीखों में जाकर हम कितनी भी जानकारी देते रहें और यह बताते रहें कि उस समय हमारे पास अपने हाई यील्डिंग वैराइटी के देसी बीज भी थे। लेकिन वह युग सूचना और संप्रेषण माध्यमों के अभावों का युग था। अनाज की कमी का आपात संकट सिर पर खड़ा था। वैसी हालत में विश्व में जहां से भी ज्यादा उपज वाले बीजों की सूचना मिल रही होगी, उन्हें मंगाने के फैसले लिए जा रहे होंगे। इसी दौरान मल्टीपल क्रोपिंग पैटर्न जैसे कार्यक्रम देश के स्तर पर पहले पहल लाए गए। आज यह बात देखने में मामूली लगती है, लेकिन देश में अनाज का उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकारी स्तर पर इसकी कोशिश की जाना छोटी बात नहीं थी।

खेतीबाड़ी के लिए घनीभूत प्रयासों के तीन साल

बहरहाल इन तीन वार्षिक योजनाओं में कृषि पर 1,624 करोड़ रुपए खर्च किए गए। हरित क्रांति के अंतर्गत मुख्य रूप से चार बदलाव लाने पर जोर दिया गया- उन्नत बीज, फर्टिलाइजर का ज्यादा उपयोग, सिंचाई के पानी की बेहतर आपूर्ति और खेती के नए और उन्नत तरीके। इन तीन साल में एक खासबात ये दिखती है कि खेती किसानी के काम में कृषि यंत्रों का इस्तेमाल बढ़ाने पर काफी जोर दिया गया। इसके अलावा कीटों से फसल का बचाव करने के आधुनिक तरीके अपनाने पर जोर रहा।

लघु सिंचाई परियोजनाओं पर ज्य़ादा गौर

सन् 66-67 के सूखे के बाद सिंचाई योजनाओं पर ध्यान जाना स्वाभाविक ही था। इसीलिए हमें दिखता है कि इस दौर में लघु सिंचाई योजनाओं पर सरकार ने पूरा जोर लगा दिया। अगले साल यानी 67-68 में सुयोग से मानसून के तेवर नहीं बिगड़े। बल्कि अच्छी बारिश भी हो गई। सरकारी कोशिशों ने रंग दिखाया और देश में अनाज का रेकार्ड उत्पादन दर्ज हो गया। नौ करोड़ 56 लाख टन अनाज पैदा हुआ। योजनाकारों के लिए यह सुखद आश्चर्य था। इसी उत्साह में सरकार ने अगले साल यानी 1968-69 के लिए 10 करोड़ 20 लाख टन अनाज पैदा करने का लक्ष्य बना लिया। लेकिन देश के कुछ इलाकों में मौसम और दूसरे कारणों ने तबाही मचा दी। फिर भी खेती में यांत्रिकीकरण और कीटनाशकों से फसल के बचाव के कारण मौसम की तबाही के बावजूद उत्पादन के आंकड़ों पर उतना असर पड़ नहीं पाया। यानी पिछले साल के उत्पादन का स्तर बनाए रखा जा सका।

फ़ोटो साभार : शटरस्टॉक

सन् 1968 में 17 लाख टन रासायनिक खाद इस्तेमाल?

कृषि के इतिहास में जिनकी दिलचस्पी है, उनके लिए यह आंकड़ा देखने लायक है कि 1967-68 में देश साढ़े 17 लाख टन रासायनिक उर्वरक इस्तेमाल करने लग गया था। तबके योजनाकारों ने इस सफलता का श्रेय नई कृषि रणनीति को दिया। इस रणनीति की एक खास बात यह थी कि खेत को पूरे साल व्यस्त रखने के उपाय किए गए। देशभर में बहुफसलीय उपज कार्यक्रम चलाए गए। सन 1969 तक देश में 60 लाख एकड़ जमीन इस मल्टीपल क्रोपिंग प्रोग्राम के तहत लाई जा चुकी थी। साथ साथ हाईयील्ड वैरायटी प्रोग्राम की पहंुच पूरे देश में बनाने का काम चल ही रहा था।

इसी दौर में चावल पर शोध की जरूरत पड़ी

शुरू में पांच फसलों में उन्नत बीजों का इस्तेमाल हुआ था। ये बीज थे गेंहू, चावल, बाजरा, मक्का और ज्वार। इन फसलों में चमत्कारिक सफलता गेंहूं में मिली थी। मक्का बाजरा और ज्वार के भी अच्छे ही नतीजे आए। लेकिन चावल में उतनी कामयाबी नहीं दिखाई दी, इसीलिए सरकार ने कृषि वैज्ञानिकों को भारत के अनुकूल चावल की हाईयील्ड वैरायटी पर शोध के काम पर लगाया था।

कृषि शिक्षा पर ज्यादा जोर तभी शुरू हुआ

हरित क्रांति के नाम से मशहूर इसी दौर में कृषि शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया गया। इस समय तक देश में नौ कृषि विश्वविद्यालय बनाकर तैयार किए जा चुके थे। इसी दौर में इंडियन कांउसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च ने 38 बड़ी शोध परियोजनाओं पर काम शुरू किए। इस काम का सबसे बड़ा असर यह हुआ कि राष्ट्रीय स्तर पर कृषि के क्षेत्र में शोध की भावी नीतियां बनने का आधार तैयार हो गया। विश्व में भारतीय कृषि अनुसंधान कार्यों को बड़े कुतूहल से देखा गया था।

बहरहाल तीसरी और चौथी पंचवर्षीय योजनाओं के बीच के ये तीन साल देश में कृषि विकास के लिए आज भी विशेष महत्त्व के माने जाते हैं। तब की सरकार और योजनाकारों के लिए सबसे संतोष की बात यह रही कि उन्हें देश के किसानों का उम्मीद से ज्यादा सहयोग मिला। योजनाकार और वैज्ञानिक जो जो सुझाव देते गए, देश के किसानों ने पूरे भरोसे के साथ उनका पालन किया। किसानों को यंत्र, बीज, खाद, कीटनाशकों के लिए धन की जरूरत पड़ने लगी थी। यहां सरकार ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया कि देश के 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। इन बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद किसानों को उधार लेने की सुविधा मिल गई।

आज विश्लेषण करते हैं तो यह साफ पता चलता है कि उन तीन साल में अनाज के मामले में हालात काबू में दिखने लगे। देश की अर्थव्यवस्था भी बढ़ चली। देश में पिछली सदी के इस सत्तर के दशक को अगर कृषि दशक का नाम दे दें, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। खैर इन वार्षिक योजनाओं के प्रदर्शन से पंचवर्षीय योजनाओं की व्यवस्था में आए व्यवधान को दूर कर लिया गया। चौथी योजना बनाने में एक सुविधा यह थी कि स्वाधीन देश के पास तब तक योजनाएं बनाने और उनके कार्यान्वयन का 28 साल का अनुभव हो चुका था।

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