चित्रकारों का गांव: पाटनगढ़

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संभावना तो यही थी कि यह भी दूसरे आदिवासी गांवों की तरह ही होता: सौ-दो सौ लोगों की उजड़ी-उजड़ी सी बस्ती जैसा। झोपड़ियों में बसने वाले सीधे-सरल लोगों का सहमा-सहमा सा गांव। पर, प्रकृति-पुत्रों की नैसर्गिक कला ने पाटनगढ़ को एक ख़ास पहचान दे दी है। अब तमाम शहरों के लोग भी इस गांव के आगे लंबी कतार लगाते हैं।

मध्य प्रदेश की एक पहचान यह भी है कि उसकी गोद में जनजातीय संस्कृति का अनूठापन अछूता बना हुआ है। प्रदेश में अन्य जनजातियों की तुलना में गोंड आदिवासियों की आबादी सबसे ज्यादा है। गोंड जनजाति की अगरिया, असुर, भिम्मा, ढुलिया, ओझा, गोवारी, नगारची, मोधिया, दरोई, परधान आदि उपजातियां प्रमुख रूप से डिंडोरी, मंडला, जबलपुर, सिवनी, बालाघाट, शहडोल, अनूपपुर, सीधी, दिंदवाड़ा, बैतूल, होशंगाबाद, रायसेन जैसे जिलों में निवास करती हैं। एक समय प्रदेश के एक बड़े भूभाग पर गोंडों का राज रहा। रानी दुर्गावती इसी गोंड राज्य की विख्यात वीरांगना रही हैं। शंकरशाह और रघुनाथशाह जैसे गोंड शासकों ने 1857 की गदर में जबलपुर में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ विद्रोह का बिगुल बजाया था। बदले में शहादत पाई।

फ़ोटो साभार : राजेंद्र चंद्रकांत राय

पिछले दिनों पाटनगढ़ से 30 गोंड चित्रकार जबलपुर आए थे। जबलपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड ने उन्हें अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिये जबलपुर आमंत्रित किया था। इन चित्रकारों से मिलने के बाद पता लगा कि उन सबका कैनवास विराट है। वे कला, संस्कृति और साहित्य के साथ भी उतने ही गहरे सरोकार बनाए हुए हैं, जितने कि जिंदगी के साथ। इन चित्रकारों के पास अपनी जनजातीय विरासत की अकूत पूंजी है। उनके चित्रों में उनकी पृष्ठभूमि, लोक कथा, धार्मिक विश्वास या फिर उनकी पारंपरिक धारणाओं का आदिम-स्वरूप जीवंत चमक के साथ मौजूद दिखाई देता है।

फ़ोटो साभार : राजेंद्र चंद्रकांत राय

गोंडी चित्रकला का अब नया युग चल रहा है। पाटनगढ़ में सैकड़ों की संख्या में मौजूद इन चित्रकारों में बड़े-बूढ़े भी हैं, तो कच्ची उम्र वाले बच्चे भी। गृहणियां हैं, तो कम-उम्र लड़कियां भी। उन सबके लिए चित्रों का सृजन उतना ही स्वाभाविक कर्म है, जितना कि खेतों में बीजों को बोना। जितना कि करमा नृत्य में भाग लेना। गोंडी कला में विशिष्ट शैली के बिंदुओं, अंडाकृतियों और मछली की खाल जैसी आकृतियों का विशेष पैटर्न देखने को मिलता है। यह कला मुग़ल और अंग्रेजी राज में लगभग विलुप्त ही हो गई थी। परंतु वह मरी नहीं। 1980 के दशक में यह तब पुनर्जीवित होनी शुरू हुई, जब भोपाल के कला केंद्र- भारत भवन के मुखिया मशहूर कलाकार जगदीश स्वामीनाथन ने पहल की। गोंड कलाकार जनगढ़ सिंह श्याम को इसके लिए लाया गया।

कहा जा सकता है कि गोंड जनजातीय कला का दायरा अपने गांव और उसके आसपास के इलाकों तक ही सिमटा हुआ ही रह जाता, अगर विख्यात चित्रकार जे. स्वामीनाथन ने पाटनगढ़ और उसके कला-बांकुरों को खोज न निकाला होता। उसी दौर में स्वामीनाथन को पाटनगढ़ में संभावनाओं से भरा एक किशोर मिला- जनगढ़ सिंह श्याम। उनका जन्म 1962 में हुआ था। बचपन जंगलों में बीता था। जंगल की विविधता और प्राकृतिक सहजता ने उनके कलाबोध को संवारा था। वे उसे अपने साथ भोपाल ले गए। वहां पर उसे वैश्विक कला के स्वरूपों से परिचित कराया।

फ़ोटो साभार : राजेंद्र चंद्रकांत राय

जनगढ़सिंह श्याम के चित्रों की प्रदर्शनी 1989 में पेरिस में लगी। तब उनके प्रयोगात्मक काम को अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली। उसके बाद से इस समुदाय के कई कलाकार अपनी प्रतिभा के साथ उभरकर सामने आए। पिछले कुछ सालों में उनके चित्रों को देश-विदेश में कई कला संग्रहकर्ताओं ने खरीदा है।

फ़ोटो साभार : राजेंद्र चंद्रकांत राय

गोंडी चित्रकला की पारंपरिक शैली को नजदीक देखें तो सामने आता है कि उसमें मुर्गा का ख़ास महत्त्व है। पर वह एक पक्षी के तौर पर ही चित्र में नहीं आया है। असल में वह आदिवासियों के श्रमपूर्ण जीवन का अभिन्न हिस्सा है। जब समय का संदेश देने के लिए इन गोंड आदिवासियों के पास घड़ी ना थी, तब आभास कराने वाला एक सहजीवी उनके साथ था- मुर्गा। गोंड कला ने अपने उस संगी मुर्गे को बिसराया नहीं। उन्होंने उसे अपनी चित्रकला में भी उसी तरह साथ रखा हुआ है, जैसे कि वह उनके जीवन में साथ है। इसी तरह वे जंगलों, पशुओं, पक्षियों और यहां तक कि सांपों, नेवलों और शेरों को भी अपनी कला की दुनिया में शामिल किए हुए है।

फ़ोटो साभार : राजेंद्र चंद्रकांत राय

पाटनगढ़ की कुल आबादी के लगभग दो-तिहाई स्त्री-पुरुष आज भी चित्रकारी के काम में लगे हुए हैं। वहां के बहुत से चित्रकार स्वतंत्र रूप से चित्रकारी करते हैं, परंतु ज्यादातर सामूहिक तौर पर आपस में जुड़े हुए हैं। वे भोपाल, दिल्ली, चेन्नई, पूणे, कोलकाता, मुंबई तक जाकर अपनी कला की प्रदर्शनियां लगा आए हैं। इस कला के पुनर्जीवन का सबसे बड़ा सबूत शायद यह है कि यहां के चित्रकारों के काम की क़ीमत अब काफी बढ़ी है। 39 वर्षीय राजेंद्र श्याम ने ब्रिटेन के नॉटिंघम की न्यू आर्ट एक्सचेंज गैलरी में 2009 में और लंदन की हॉर्नीमैन आर्ट गैलरी में 2011 में अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाई थी। वे कहते हैं- ‘‘गोंड कला लोकप्रिय हो गई है। ए-4 आकार की पेंटिंग अब 2,000 रु. से 5,000 रु. में बिकती है। दस साल पहले यह 150-200 रु. में बिक रही थी।’मस्ट आर्ट गैलरी की प्रवक्ता के मुताबिक़ नर्मदा प्रसाद टेकाम जैसे कलाकारों के काम की कीमतों में भारी इजाफ़ा हुआ है। एक अन्य कलाकार मयंक श्याम की पेंटिंग्स की कीमतों में पिछले एक दशक में तीन गुना उछाल दिखा है। उनके बड़े कैनवस 2.5 लाख रु. तक में भी बिकते हैं।

फ़ोटो साभार : राजेंद्र चंद्रकांत राय

पाटनगढ़ चित्रकला ने अपनी यात्रा के दौरान कला के बहुत से पड़ावों को पार किया है। वह दीवारों और माटी के रंगों से निकलकर कैनवास और एक्रेलिक कलर तक आ पहुंची है। अब वहां के कलाकार कपड़ों पर भी चित्रकारी कर रहे हैं। विख्यात पर्यटन विषेशज्ञ डॉ. जीजी सक्सेना कहते हैं- “अब इससे भी आगे जाने की ज़रूरत है। अगर इन चित्रकारों को साड़ियों, टी शर्ट्स, चादरों, परदों और बच्चों के कपड़ों पर चित्रों के मुद्रण से जोड़ दिया जाए, तो उनकी आर्थिक दशा में काफी सुधार लाया जा सकता है। उनकी रचनात्मकता का व्यावसायिक लाभ कोई दूसरा वर्ग उठाए, उसके पहले उन्हें कारोबारी दुनिया से परिचित कराने की हमें एक बड़ी भूमिका भी निभानी होगी। इस के लिये गोंडी पेंटिंग्स् को जीआई टैग यानी जिओग्राफिकल इंडीकेटर टैग हासिल करने की आवश्यकता है। वस्त्र-व्यवसाय के क्षेत्र में इसी के माध्यम से उन्हें अपनी निजी पहचान मिल सकेगी। नया बाज़ार मिल सकेगा।”

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