कोलगेट 2.0: कोयला घोटालों का नया अवतार

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कायदे-कानूनों से बेपरवाह चर्चित अडानी समूह का कोयले के कारोबार में जलवा बरकरार है। इस समूह की कंपनियां राज्य सरकारों की कंपनियों से साझेदारी करके मालामाल हो रही हैं। वित्तीय अनियमितताओं के उजागर होने के बावजूद उनकी सेहत पर असर नहीं है। केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार के पतन और कोलगेट 1.0 को लेकर कानूनी शिकंजों के बाद माना गया था कि कोयले के धंधे में गड़बड़ी करने वाली कंपनियों पर लगाम लग जाएगी। पर सभी कंपनियों पर यह बात लागू न हो पाई। कोलगेट 1.0 को बड़ा मुद्दा बनाकर सत्ता में आई मोदी सरकार के राज में भी अडानी समूह की कंपनियां मजे में हैं। एक साल पहले इन कंपनियों के कथित आर्थिक अपराध के मामले “इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल विकली” और अन्य पत्र-पत्रिकाओं की सुर्खियों बने थे। अब अंग्रेजी पत्रिका “द कारवां” ने विस्तार से पड़ताल की तो उसे कोयले के गोरखधंधे को कोलगेट 2.0 कहना पड़ा। जाहिर है, घोटालों की फेहरिस्त लंबी हो गई है।

“द कारवां” की खोजपरक रपट में अडानी समूह के कई घोटालों का खुलासा है। उससे यह भी साबित हुआ कि सरकारी संरक्षण में अडानी समूह ने अपने व्यापार का मॉडल ऐसा बना रखा है कि तमाम विपरीत परिस्थितियां भी उसकी आर्थिक सेहत पर असर डाल पाने में नाकाम हैं। तभी इस समूह को भाजपा शासित राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कोयला खनन और मार्केटिंग के मामलों में सर्वाधिक लाभ हुआ है। अडानी समूह ने उन राज्यों की सरकारी कंपनियों के साथ संयुक्त उपक्रम बना रखा है। इसके लिए शर्तें ऐसी हैं कि सरकारी घाटे उसके लिए फायदेमंद साबित हो रहे हैं। सरकार इस कदर मेहरबान है कि न तो कोयला खान (विशेष प्रावधान) कानून 2015 की परवाह की जा रही है और न ही उच्चतम न्यायालय के आदेशों की।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश


फ़ोटो स्रोत : एसएलएसवी

सुप्रीम कोर्ट ने 25 अगस्त 2014 को कोयला घोटाला 1.0 पर फैसला दिया था। इसके तहत 1993 से लेकर 2010 के बीच कैप्टिव उपयोग के लिए आवंटित 218 में से 214 कोयला खदानों का आवंटन रद्द कर दिया गया था। इनमें सरकारी कंपनियों को आवंटित कोयला खानें भी थीं। जाहिर है कि इस फैसले के साथ ही इन कोयला खानों से कोयला निकालने के लिए अन्य कंपनियों के साथ किए गए करार भी रद्द हो गए थे। पर राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड और अडानी इंटरप्राइज लिमिटेड के संयुक्त उपक्रम वाली कंपनी- परसा केंते कोलियरीज लिमिटेड के मामले में अदालत के फैसले को आड़े नहीं आने दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से फिर से कोयला खानों का आवंटन शुरू हुआ तो आरआरवीयूएनएल को संयोग से फिर वही खानें मिल गईं। पर आरआरवीयूएनएल ने कोयला खनन के लिए अडानी समूह से दोबारा करार नहीं किया। 2009 में किए गए करार को ही बरकरार रखा। नतीजतन आज भी उसी करार के आधार पर कोयले का उत्पादन और बिक्री की जा रही है।

कोयला खदान कानून

यही नहीं, कोयला खदान (विशेष प्रावधान) कानून 2015 में साफ लिखा है कि किसी भी सरकारी कंपनी या निगम में किसी भी निजी कंपनी की हिस्सेदारी 26 फीसदी से ज्यादा नहीं होगी। पर परसा केंते कोलियरीज लिमिटेड के मामले में यह नियम लागू नहीं है। सन् 2007 में बनी इस कंपनी में अडानी समूह की सहायक कंपनी अडानी माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड को 74 फीसदी का हिस्सेदार बनाया गया था। सन् 2015 के प्रारंभ में अडानी माइनिंग कंपनी अडानी इंटरप्राइज लिमिटेड में समाहित हो गई। बावजूद संयुक्त उपक्रम पर कोई असर न पड़ा। आरआरवीयूएनएल ने एईएल को भी संयुक्त उपक्रम वाली कंपनी का साझेदार मान लिया। राजस्थान सरकार अडानी समूह पर इस कदर मेहरबान हुई कि उसके साथ छत्तीसगढ़ की दो अन्य कोयला ब्लाकों परसा और केंते एक्सटेंशन के लिए राजस्थान कोलियरीज लिमिटेड नाम से एक और संयुक्त उपक्रम वाली कंपनी बना ली। खास बात यह कि इस कंपनी में भी एईएल की हिस्सेदारी 74 फीसदी ही है।

आरआरवीयूएनएल को सन् 2007 में छत्तीसगढ़ में पारसा ईस्ट और कांटे बेसन में कोयले की दो खाने आवंटित की गई थीं, ताकि वहां से सस्ती दरों पर उत्पादित कोयले से राजस्थान के कालीसिंध और छबड़ा स्थित कुल 1700 मेगावाट वाली विद्युत परियोजनाओं की जरूरतें पूरी की जा सकें। कायदे से आरआरवीयूएनएल इन खानों से कोयला उत्खनन के लिए प्रतिस्पर्धी बोली के जरिए किसी कंपनी ठेका दे सकती थी। पर उसने ऐसा न करके अडानी इंटरप्राइज लिमिटेड के साथ संयुक्त उपक्रम वाली कंपनी बनाना ज्यादा ठीक समझा। वित्तीय वर्ष 2008-09 में ये कोयला खानें 30 सालों के लिए पीकेसीएल को बिल्कुल मुफ्त दे दी गई। पर एक साल के भीतर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर खानों का आवंटन रद्द हो गया था। आरआरवीयूएनएल को दोबारा वही खानें मिलीं, तो पुरानी गलतियों को सुधारने का एक मौका था। पर कई वर्ष पुराने करार में कोई बदलाव नहीं किया गया। इसके साथ ही नियमों का उल्लंघन और आर्थिक अनिमयमितताओं का दौर शुरू हो गया।

अडानी समूह के स्वामित्व वाली संयुक्त उपक्रम कंपनी पर राजस्थान सरकार तो मेहरबान थी ही, छत्तीसगढ़ सरकार भी हर हाल में मदद के लिए तत्पर रही। परसा ईस्ट और केंते बेसन की कोयला खानें छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में है। हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति इस इलाके में कोयला उत्खनन के विरोध में थी। विभिन्न स्तरों पर सामाजिक और कानूनी लड़ाई के बीच 2016 में छत्तीसगढ़ सरकार ने सरगुजा जिले के घाटबारा के आदिवासियों को दिए गए सामुदायिक वन अधिकारों को रद्द कर दिया। ताकि कोयला खनन की राह के रोड़े हट जाएं। इस तरह छत्तीसगढ़ ग्रामीणों को कानूनी रूप से मिला सामुदायिक वन अधिकार को समाप्त करने वाला पहला राज्य बन गया था।

खैर, सरकार की दरियादिली इन मामलों तक ही सीमित नहीं थी। अडानी समूह को तरह-तरह से वित्तीय लाभ पहुंचाने के मामले कुछ वर्षों के भीतर ही परत-दर-परत खुलने लगे। राजस्थान की वसुंधरा राजे सिंधिया सरकार ने आरआरवीयूएनएल को घाटे से उबारने के लिए कालीसिंध और छाबड़ा विद्युत संयंत्रों को एनटीपीसी लिमिटेड को देने का फैसला कर लिया। ऐसी स्थिति में आरआरवीयूएनएल को छत्तीसगढ़ में आवंटित कोयला खानें एनटीपीसी लिमिटेड को दी जानी चाहिए थी। पर राज्य सरकार ने कोयला खनन के लिए बनी संयुक्त उपक्रम वाली कंपनी को बरकरार रखा। तब एनटीपीसी लिमिटेड ने पूछा कि संयुक्त उपक्रम वाली कंपनी पीकेसीएल किस दर से कोयला उपलब्ध कराएगी? इसका जबाव चौंकाने वाला था। पहली बार सार्वजनिक हुआ कि अडानी समूह की 74 फीसदी हिस्सेदारी वाला पीकेसीएल आरआरवीयूएनएल को सार्वजनिक क्षेत्र की कोयला कंपनियों से काफी अधिक दर पर कोयला बेच रहा था।


फ़ोटो स्रोत : फाइल फोटो/द न्यू इंडियन एक्सप्रेस

पीकेसीएल परसा ईस्ट और केंते बेसन की कोयला खानों की जी-11 ग्रेड के कोयले को जी9 ग्रेड का कोयला बताकर बेचता था। इसके पीछे तर्क यह कि जी-11 ग्रेड के कोयले की धुलाई के बाद उसकी गुणवत्ता बेहतर होकर जी-9 ग्रेड के समतुल्य हो जाती है। खैर, जी-9 ग्रेड का कोयला आरआरवीयूएनएल से 2267.12 रूपए प्रति टन की दर से बेचा जा रहा था। जबकि छत्तीसगढ़ में ही स्थित कोल इंडिया लिमिटेड की अनुषंगी इकाई साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड (एसईसीएल) की कोयला खानों के जी-9 ग्रेड के कोयले की कीमत 1,992.96 प्रतिटन थी। यानी पीकेसीएल प्रतिटन 274.16 रूपए ज्यादा वसूल रहा था। “द कारवां” के एक मोटे अनुमान के मुताबिक आरआरवीयूएनएल को अगले तीस सालों में परसा केंते कोलियरीज लिमिटेड (पीकेसीएल) को बाजार दर से 6,000 करोड़ रुपए ज्यादा का भुगतान करना होगा। इस तरह एईएल को 4,440 करोड़ रूपए का अतिरिक्त लाभ हो जाएगा। भारत के नियंत्रक महालेखाकार ने भी अपनी रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया है।

कोयला आयात घोटाला

कोयला खनन घोटालों की तरह ही कोयला आयात घोटाले की जड़े भी काफी गहरी हैं। इस घोटाले में भी अडानी समूह की छह कंपनियों के नाम उछलते रहे हैं। “इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल विकली” और “द कारवां” की खोजपरक रिपोर्टों पर गौर करें तो केवल कोयला आयात घोटालों का पूरी तरह पर्दाफाश हुआ, तो हाल के वर्षों के कई घोटाले छोटे पड़ जाएंगे। इसलिए कि कोयला घोटाले से देश के जिन औद्योगिक घरानों के तार जुड़े हुए बताए गए हैं, उनमें अडानी समूह के अलावा देश की लगभग 40 नामचीन कंपनियां शामिल हैं। राजस्व खुफिया एजेंसी (डीआरआई) ने साल भर पहले ही आकलन किया था कि कोयला आयात के बिलों में हेराफेरी करके भारत सरकार को कोई 29,000 करोड़ रुपए का चूना लगाया जा चुका है। पर दो कंपनियों को छोड़कर बाकी संदिग्ध कंपनियां फिलवक्त सरकारी शिकंजे से बाहर हैं। डीआरआई की रिपोर्ट के आधार पर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने कोयला आयात से जुड़ी मात्र एक कंपनी कोस्टल एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड के मामले की जांच की, तो पता चला कि उस कंपनी ने अकेले ही सरकार को 487 करोड़ रूपए की चपत लगा दी थी।


फ़ोटो स्रोत : सैम पंथकी/एएफपी/गेट्टी इमेज

कोयला आयात से जुड़ी कंपनियां केंद्र सरकार की कोयला आयात से संबंधित नीति का फायदा उठाकर इंडोनेशिया और अन्य देशों से कम कीमतों पर घटिया कोयला खरीदती हैं और बिलों में हेराफेरी करके उसे एनटीपीसी लिमिटेड सरीखी कंपनियों के अधिकारियों से सांठगांठ करके कई गुणा ज्यादा कीमतों पर बेचती रही हैं। जांच एजेंसियों को शक है कि अवैध तरीके से अर्जित किए गया धन हवाला के जरिए देश से बाहर भेजा गया। राजस्व खुफिया एजेंसी ने अपनी प्राथमिक जांच के बाद 27 फरवरी 2016 को इंडोनेशिया से कोयले के आयातक मनोज कुमार गर्ग को जैसे ही गिरफ्तार किया, घोटाले की परतें खुलने लगीं। तब 30 मार्च 2016 को राजस्व ख़ुफ़िया महानिदेशालय ने भारत में इंडोनेशिया से कोयले का आयात करने वाली कम्पनियों के खिलाफ अलर्ट जारी किया। कहते हैं कि इन कंपनियों ने इंडोनेशिया में 50 डॉलर प्रति मीट्रिक टन की दर से कोयला खरीद कर उसे भारतीय कंपनियों ने 82 डॉलर प्रति मेट्रिक टन की दर से बेच दिया। इतने महंगे कोयले के कारण भारत में बिजली की उत्पादन लागत में बेतहाशा वृद्धि हो गई थी।

“द कारवां” ने सरकारी एजेंसियों के आंकड़ों के आधार पर जिन प्रमुख आर्थिक उल्लंघनों की चर्चा की है, उन्हें जोड़ दिया जाए तो कुल घोटाला 76,837 करोड़ का होता है। इनमें कई घोटाले सीधे-सीधे कोयला से जुड़े नहीं है। पर वे सभी घोटाले कोयला की तरह ही ऊर्जा के अन्य स्रोतों से जुड़े हुए हैं। जैसे, लौह अयस्क निर्यात घोटाला, अवैध खनन घोटाला, आयातित बिजली उपकरणों के बिलों में फर्जीवाड़ा आदि। इनमें 29,609 करोड़ रूपए के पांच घोटालों को भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (सीएजी) ने पकड़ा था। कर्नाटक के लोकायुक्त ने अवैध खनन व गलत तरीके से लौह अयस्क के निर्यात से संबंधित अडानी इंटरप्राइजेज, बेलेकरी बंदरगाह और चार अन्य कंपनियों के मामलों की पड़ताल की तो 12,228 करोड़ रूपए के घोटालों का पर्दाफाश हुआ था। केंद्रीय वित्त मंत्रालय के राजस्व खुफिया निदेशालय ने इंडोनेशिया से कोयले के आयात में बिलो की हेराफेरी करके देश को लगभग 29,000 करोड़ रूपए की चपत लगाने का खुलासा किया था। इनमें अडानी समूह की कंपनियों के अलावा लगभग 40 कंपनियां शामिल हैं। आयातित विद्युत उपकरणों के बिलों में हेराफेरी करके भी लगभग 6,000 करोड़ रुपए की चपत लगाई जा चुकी है। राजस्व खुफिया निदेशालय ने ही इन घोटालों को भी पकड़ा था। इनमें अडानी पावर और एस्सार पावर से लेकर महाराष्ट्र सरकार की बिजली कंपनी तक शामिल हैं।

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