मोदी सरकार की एक ‘टॉप प्रायोरिटी’ का हाल

गाँव में कोरोना से लड़ने की क्या हो तैयारी?

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क्या है ज़रूरी – ज़िंदगी या चुनाव?

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ज़िंदगी या चुनाव- क्या है ज़रूरी?

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किसान क्यूँ कर रहे हैं साइलोज़ का बहिष्कार?

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हरियाणा में फसल ख़रीदी को लेकर किसानों के अनुभव

हरियाणा में 1 April 2021 से गेहूँ की ख़रीदी शुरू हो गयी है लेकिन किसान मंडी में बारदाने की कमी से लेकर...
“फल और सब्जियां पैदा करने वाले किसान भी हमारे लिए टॉप प्रायोरिटी में है। और जब मैं टॉप कहता हूं, तो हिंदुस्तान के किसी भी कोने में जाइए… तीन सब्ज़ियां जरूर नजर आएंगी। टोमैटो, अनियन और पोटैटो” – नरेंद्र मोदी

कर्नाटक में नरेंद्र मोदी ने जिस शिद्दत के साथ आलू को सरकार की शीर्ष प्राथमिकताओं में गिनाया, उसके बाद लोगों में ये उम्मीद जगी थी कि इस बार आलू किसानों को कम-से-कम पिछली बार की तरह विकराल हालात का सामना नहीं करना होगा, लेकिन देश में सबसे ज़्यादा आलू उगाने वाले उत्तर प्रदेश से विचलित करने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं। किसानों ने जगह-जगह सड़कों पर हज़ारों क्विंटल आलू फेंक दिए। कुछ इलाक़ों में प्रशासन को जेसीबी मशीन के ज़रिए आलू हटाकर सड़क ख़ाली करानी पड़ी, तो कुछ इलाक़ों में जानवरों ने आलू खाकर सफ़ाई की।

उत्तर प्रदेश में देश के कुल आलू के एक तिहाई का उत्पादन होता है। 2016-17 में यहां 155 लाख टन आलू का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ, लेकिन दो साल पहले की तुलना में बाज़ार मूल्य गिरकर आधा रह गया है। ऐसे में किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। उत्पादन और कोल्ड स्टोरेज में रख-रखाव को जोड़कर प्रति किलोग्राम आलू पर किसानों की लागत 8-9 रुपए बैठती है, लेकिन बाज़ार में थोक मूल्य इस वक़्त 2 रुपए के आस-पास है। यानी किसानों को प्रति किलोग्राम 6-7 रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है। उत्पादन के हिसाब से देखें तो हर किसान को प्रति सीजन 60 हज़ार रुपए से ज़्यादा नुकसान हो रहा है।

पिछले साल जब आलू का संकट बढ़ा तो उत्तर प्रदेश सरकार ने 13 हज़ार क्विंटल की ख़रीददारी की और मिड-डे मील में आलू देना अनिवार्य कर दिया। प्रदेश के क़रीब एक करोड़ छात्र-छात्राओं को रोज़ाना आलू की सब्ज़ी खिलाने के बावजूद किसानों का संकट टला नहीं। किसान संगठनों ने दावा किया कि इससे महज 13 फ़ीसदी अतिरिक्त आलुओं की ही ख़रीद हो सकी।

असल में मोदी सरकार लगातार ये बात तो ज़रूर कहती आई है कि 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करना उसका लक्ष्य है, लेकिन इस दिशा में कोई ऐसा ठोस कदम बढ़ता नज़र नहीं आ रहा, जिससे इस दावे पर यक़ीन किया जा सके। अलबत्ता केंद्र सरकार के कई नीतिगत फ़ैसलों का नकारात्मक असर ज़रूर आलू किसानों और इसकी क़ीमत पर पड़ा है। जब ‘कालाधन, जाली नोट और आतंकवाद’ के ख़ात्मे का मकसद बताते हुए 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी का एलान किया गया था, तो उस वक़्त कई अर्थशास्त्रियों ने इस कदम को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बेहद नुक़सानदेह करार दिया था। आलू किसानों पर भी इसका सीधा असर पड़ा। आंकड़ों के मुताबिक़ नोटबंदी से पहले नवंबर 2016 में प्रति क्विंटल आलू की क़ीमत 916 रुपए थी, जोकि दिसंबर 2016 में गिरकर महज 532 रुपए रह गई। यानी इसमें 40 फ़ीसदी से ज़्यादा की गिरावट दर्ज़ की गई। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ने लगातार ये दावा किया है कि नोटबंदी का असर तात्कालिक था और तीन-चार महीने बाद देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आई।
इस लिहाज से 2017 में आलू के बाज़ार भाव में उछाल आना चाहिए था, लेकिन मार्च 2017 ये और ज़्यादा गिरकर 399 रुपए के स्तर पर आ गया। हालात सुधर सकते थे, लेकिन सरकार ने न्यूनतम निर्यात मूल्य और अनिवार्य वस्तु अधिनियम का इस्तेमाल कर आलू का बाज़ार भाव बढ़ने ही नहीं दिया।

लागत नहीं निकलने से नाराज़ किसान आलू सड़कों पर फेंक रहे
फोटो स्रोत: अमर उजाला

नुक़सान उठाने की मजबूरी

आलुओं का सड़ना उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश के किसानों की नियति बन गई है। अगर वो उत्पादन के फ़ौरन बाद कम क़ीमत पर नहीं बेचना चाहें और कोल्ड स्टोरेज का सहारा लें, तो लागत और बढ़ जाती है। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि महीनों कोल्ड स्टोरेज का किराया चुकाने के बाद बाज़ार मूल्य में बढ़ोतरी होगी ही। पिछले साल उत्तर प्रदेश के लाखों किसानों को ये दांव उल्टा पड़ा। तिस पर, 155 लाख टन उत्पादन के मुकाबले उत्तर प्रदेश के कोल्ड स्टोरेज की कुल क्षमता 130 लाख टन है और उनमें भी क़रीब 120 लाख टन आलू ही संग्रहित किए गए हैं। यानी 35 लाख टन आलू को रखने का कोई विकल्प ही इस सीजन में नहीं है। किसानों की मजबूरी है कि वो या तो 2 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बेचें या फिर सड़ने का जोखिम उठाएं। लाख कोशिशों के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य 487 रुपए ही तय कर पाई।

2014 को छोड़ दें तो देश में आलू का सबसे ज़्यादा उत्पादन इस बार हुआ है। 2016 को खेती के लिहाज से ‘सामान्य सीजन’ माना गया। उस वक़्त 4 करोड़ 40 लाख टन का उत्पादन हुआ, तो केंद्र सरकार ने मुद्रास्फ़ीति कम करने के लिए एक ऐसा फ़ैसला किया, जिसने आलू किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दीं। मोदी सरकार ने आलू का न्यूनतम निर्यात मूल्य बढ़ाकर 27 रुपए प्रति किलो कर दिया। उस वक़्त अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में आलू की क़ीमत 13-14 रुपए थी, ऐसे में आलू किसान न तो निर्यात कर सके और न ही घरेलू बाज़ार में लागत के बराबर भी मूल्य निकाल पाए।

मुद्रास्फ़ीति की नीति का ख़ामियाज़ा

मुद्रास्फ़ीति के सरकारी आंकड़े को दुरुस्त करने की क़ीमत किसानों को चुकानी पड़ी। मोदी सरकार ने पिछले तीन सीजन में दो बार आलू पर न्यूनतम निर्यात मूल्य और अनिवार्य वस्तु अधिनियम लागू कर दिया, जिसका सबसे ज़्यादा ख़ामियाज़ा किसानों को भुगतना पड़ा। इस वक़्त कुल उत्पादन का महज एक फ़ीसदी आलू ही किसान निर्यात कर पा रहे हैं, जबकि लेज़ आलू-चिप्स
बनाने वाली पेप्सिको समेत इस तरह की तमाम कंपनियां देश के भीतर एक मीट्रिक टन से ज़्यादा आलू की ख़रीद नहीं करतीं। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद आलू के निर्यात में लगातार कमी दर्ज हुई है।

मौजूदा वित्त वर्ष में ऑपरेशन ग्रीन के तहत वित्त मंत्री ने आलू, प्याज़ और टमाटर के लिए 500 करोड़ रुपए का आवंटन ज़रूर किया, लेकिन इस एलान का ज़मीन आने वाले दिनों में क्या असर पड़ता है, ये देखना अभी बाक़ी है। दूसरी तरफ़, उत्तर प्रदेश सरकार आलू किसानों की बुनियादी समस्याओं को दूर करने के बजाए मंडियों को निजी हाथों में सौंपकर जनता को ये बताना चाहती है कि वो किसानों को बेहतर क़ीमत पर फ़सल बेचने के ज़्यादा विकल्प मुहैया करा रही है। यानी, घाव कहीं और है और मरहम कहीं और लगाया जा रहा है।

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