एमएसपी को क्यों नहीं मिल रहा कानूनी दर्जा?

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संसद से पारित हो चुके कृषि विधेयकों के खिलाफ किसानों और उनके संगठनों ने 25 सितंबर को भारत बंद का ऐलान किया है। उनका आरोप है कि सरकार इन कानूनों के जरिए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर फसलों की खरीद को खत्म करना चाहती है। हालांकि, सरकार लगातार दावा कर रही है कि इन कानूनों से एमएसपी पर फसलों की खरीद की मौजूदा व्यवस्था प्रभावित होगी होगी और यह पहले की तरह ही जारी रहेगी। इस पर किसानों का कहना है कि अगर सरकार को अपनी इस बात में दम लगता है तो एमएसपी की गारंटी देने वाला कानून क्यों नहीं बना देती है? उनका यह भी कहना है कि एमएसपी हमारा हक है जिसे लेकर हम सालों से लड़ाई लड़ रहे हैं. अब जब सरकार किसानों का भला ही करना चाहती है तो बस इन विधेयकों में एक लाइन और जोड़ दे कि कोई भी फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे नहीं बिकेगी।

किसानों का कहना है कि हम भी खेती-किसानी में आगे बढ़ना चाहते हैं, हमारे बच्चे नई तकनीक सीखना चाहते हैं। लेकिन ऐसा लग रहा है कि सरकार विकास का जो रास्ता दिखाना चाहती है उसमें प्राइवेट कंपनियों और निजी व्यापारियों की मदद से खेती तो आधुनिक तो हो जाएगी, उपज भी बढ़ जाएगी, लेकिन हम किसानों का क्या होगा? हमारी रोजी-रोटी पर जो संकट आएगा उसे हम कैसे झेलेंगे, अपने बच्चों और परिवार को कैसे पालेंगे?

कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा नये कानूनों पर कहते है कि सरकार दावा कर रही है कि किसानों को अच्छा दाम मिलेगा। अच्छा दाम तो न्यूनतम समर्थन मूल्य से ज्यादा ही होना चाहिए। फिर एमएसपी को पूरे देश के लिए वैध क्यों नहीं कर दिया जाए? किसान को आमदनी तो तभी होगी जब उसे विश्वास होगा कि वह अपने उत्पाद कहीं भी बेचे उसे एमएसपी तो मिलेगी ही। हमारा मॉडल दुनिया के लिए मॉडल बन सकता है, अगर सरकार चौथा विधेयक ले आए तो 99 फीसदी किसानों को इन अध्यादेशों से कोई गुरेज नहीं होगा।

एक तरफ देश भर के किसान, किसान संगठन और विशेषज्ञ एमएसपी को कानूनी दर्जा देने की मांग कर रहे हैं। लेकिन संसद के दोनों सदनों से इनसे जुड़े विधेयकों को जल्दबाजी में पास करा लिया गया है। अब कृषि उत्पाद मार्केट कमेटी (एपीएमसी) एक्ट को बायपास करने वाले, ठेका खेती का प्रावधान लागू करने वाले और आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन के जरिये अधिकांश कृषि जिंसों को स्टॉक लिमिट के प्रावधानों से बाहर करने वाले विधेयकों पर महज राष्ट्रपति के हस्ताक्षर बाकी हैं।

यहां समझने वाली बात यह है कि आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर जब हर मंच से यह संदेश देते नहीं थक रहे हैं कि एमएसपी पर कोई आंच नहीं आएगी, खरीद पर कोई असर नहीं पड़ेगा तो फिर एमएसपी की गारंटी देने वाला कानून क्यों नहीं बना देते हैं?

हालांकि, इस बारे में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर सवाल करते हैं, ‘यह बताएं कि भारत में कौन सा एक्ट एमएसपी के लिए बनाया गया है, यह कानून का विषय नहीं,बल्कि सरकार की एक योजना है, सरकार किसानों को एमएसपी का लाभ देती आयी है और आगे भी देती रहेगी।’

लेकिन क्या कृषि मंत्री यह कह कर अपना पल्ला झाड़ सकते हैं कि एमएसपी अभी किसी कानून के दायरे में नहीं आता है और यह महज़ सरकारी योजना है? वैसे आपको जानकर हैरानी होगी कि देश में एक कानून और एक फसल ऐसी है, जिसका मूल्य कानून के तहत तय होता है। यह फसल है गन्ना। 2009 तक इसकी न्यूनतम वैधानिक कीमत यानी एसएमपी को शुगरकेन प्राइस कंट्रोल ऑर्डर-1966 के तहत तय किया जाता था। इसे ही 2009-10 से उचित और लाभकारी मूल्य यानी एफआरपी कर दिया गया है। इसके तहत किसानों को 14 दिन के भीतर गन्ने का भुगतान किए जाने का नियम है। ऐसा ना होने पर चीनी मिलों को किसानों को ब्याज समेत भुगतान करना पड़ता है। कानून के तहत गन्ना मूल्य के बकाये को राजस्व बकाये की तरह माना जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब एक कृषि उत्पाद की कीमत को कानूनी संरक्षण मिल सकता है तो बाकी फसलों की कीमत को क्यों नहीं?

हालांकि, इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच किसानों का दो टूक कहना है कि अगर सरकारी उनकी भलाई का फैसला लेने की कोई मंशा रखती है तो उसे एमएसपी को बाध्यकारी बनाने वाला कानून लाना चाहिए, ताकि मंडी के भीतर या बाहर सभी तरह की फसलों की खरीद-फरोख्त में किसानों को कम से कम न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल सके। इसी तरह कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में भी एमएसपी को एक बेंचमार्क भाव की तरह जोड़ा जाना चाहिए, जिसे अभी सरकार ने किसान और कंपनियों के बीच मोलभाव के भरोसे छोड़ दिया है। कंपनियों से ऐसे मोलभाव में किसान कितनी मजबूती से अपनी बात रख पाएंगे, यह बड़ा सवाल है।

(लेखन हिंद किसान की एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हैं)

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