मछुआरों को मार डालने की नीति!

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जब तक नदियां बहती रहती हैं, उनके जल पर समाज का अधिकार बना रहता है। पर जैसे ही उन पर बांध बन जाते हैं, नदियों को सरकारी जायदाद मान लिया जाता है। उनसे ख़रीदने-बेचने और हड़पने के स्वार्थ जुड़ जाते हैं। यही सब इन दिनों मध्य प्रदेश में बने विभिन्न बांधों और जलाशयों के साथ हो रहा है। जबलपुर के रानी अवंतीबाई सागर जलाशय के मछुआरों को पहले बांध के कारण विस्थापित होना पड़ा। फिर रोज़गार से हाथ धोना पड़ा। अब मज़दूरी की तलाश में उन्हें पलायन करना पड़ रहा है। मध्य प्रदेश की व्यथा-कथा पर जबलपुर से राजेंद्र चंद्रकांत राय की रिपोर्ट।

जबलपुर में नर्मदा नदी पर बने रानी अवंतीबाई सागर जलाशय के निर्माण के लिए जबलपुर जिले के 19, सिवनी के 48 और मंडला के 95 गांवों ने अपना बलिदान किया था। कुल 162 गांव डूब गए। खेत डूबे। पेड़-पौधे डूबे। पेड़-पौधों पर जीवन यापन करने वाले जीवों का संसार डूबा। एक समूचा जलीय इको-तंत्र (ecology) ही डूब गया। पर्यावरण डूबा। जितनी ज़मीन डूबी, लगभग उतनी ही ज़मीन दलदली हो गई। वहां अन्न पैदावार खत्म हो गया। कई पीढ़ियों से इन गांवों में रहने वाली आबादी एक सरकारी झटके से विस्थापित हो गई। उनके पशुओं को भी विस्थापित होना पड़ा।

प्रदेश के कथित विकास के लिए वे उजड़ गए। तब सरकार ने विस्थापितों को बसाने की योजना बनाई थी। अगर वे जस की तस साकार कर दी जातीं, तो ये विस्थापन सुख का ज़रिया बन सकता था। पर भारतीय नौकरशाही में करुणा और दायित्व का ऐसा विराट सूखा पड़ा हुआ है कि वहां बारिश होने पर भी नमी पैदा नहीं होती। यानी जहां संभावना हो, वहां भी जन-कल्याण नहीं हो पाता।

तो अपने जल, जंगल और ज़मीन से उजड़ने के बाद यहां के लगभग एक लाख विस्थापित और प्रभावित लोग आर्थिक पुनर्वास की मांग करते रहे। परंतु 1992 के आख़िर तक उसे नकारा ही जाता रहा। उन्हें मुआवज़ा देने का सरकारी दस्तूर तो निभाया गया, पर भूमि की दरें लगाने के लिये उस वक़्त को चुना गया, जब ज़मीन किसानों ने ख़रीदा था। यानी उस दिन से चालीस-पचास साल पहले या उससे भी ज्यादा पहले। इस तरह उनकी ज़मीनें मिट्टीमोल बना दी गईं। मुआवजा अल्प तो था ही, उसे भी और भी अल्प-किश्तों में दिया गया। लिहाजा वह विस्थापितों की किसी स्थायी संपदा के निर्माण के काम न आ सका। मिला पैसा बीमारी, दवा और शादियों में ख़र्च हो गया।

इन्हीं विस्थापितों का एक हिस्सा है- मछुआरा समाज। मछुआरे परंपरा से अपनी आजीविका के लिए नदियों-तालाबों में मछली मारने पर निर्भर रहे हैं। यही उनका हुनर है। यही उनका रोज़गार है। नर्मदा नदी को मकरवाहिनी कहा जाता है। मान्यताओं के मुताबिक़ एक जलचर ही नर्मदा का वाहन है। इसे जलचरों के प्रति नर्मदा के अगाध लगाव का प्रतीक माना जाता है। यानी विश्वास यह है कि अपने तट पर बसने वाले जनों को भी जल और जलचरों के माध्यम से जीवन की निरंतरता बनाये रखने में नर्मदा नदी माता का दायित्व निभाती है।

जब तक जलाशय नहीं बना था, मछुआरे यहां से निर्बाध अपनी रोज़ी-रोटी कमाया करते थे। जलाशय बना, तो उनका अधिकार समाप्त हो गया। वे प्रतिबंधित कर दिए गए। मछलियों पर सरकारी नज़र पड़ गई। मछली मारने की ठेकेदारी होने लगी। भूखे मछुआरों ने तब रोज़गार रक्षा के लिए 1992 में 50 किलोमीटर लंबी पद यात्रा निकाली थी। सितंबर 1992 में मंडला जिले के नारायणगंज के पदमी गांव से सिवनी जिले के बीजासेन गांव होते हुए ये आंदोलनकारी, नर्मदा बचाओ आंदोलन की विख्यात कार्यकर्ता मेधा पाटकर के नेतृत्व में बरगी पहुंचे थे।

इस रैली में मछुआरों की 350 से भी कहीं ज्यादा किश्तियों और डोंगियों को शामिल किया गया था। उसी समय बरगी की जन सभा में यह संकल्प लिया गया था कि बरगी जलाशय में मछली मारने के काम के लिए सरकारी ठेकेदारी को नहीं चलने दिया जाएगा। मछुआरे प्रतिबंधों का उल्लंघन करेंगे। वे मछली पकड़ेंगे और खुलेआम बाज़ार में बेचेंगे। यही हुआ भी। तब अपराधी मानकर 73 मछुआरों को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया था। बाद में मंडला जिले के 80 लोगों को भी गिरफ़्तार किया गया। उन पर मुक़दमे क़ायम हुए। ये मुक़दमे अब भी अदालतों में जारी हैं। इस तरह आजीविका कमाने के संवैधानिक अधिकार को मछुआरों के लिए सरकार ने एक जुर्म बना दिया।

1993 में मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी। दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने। उनका रवैया तुलनात्मक रूप से अधिक संवेदनशील था। उन्होंने जलाशय की मछली पर मछुआरों के हक़ को तवज्जो दी। पकड़ी जाने वाली कुल मछलियों के 20 प्रतिशत पर उनका मालिकाना अधिकार माना। ठेकेदारी प्रथा को समाप्त किया और मछुआरों की सहकारी समितियों को मछली पकड़ने-बेचने का काम सौंपा। इसके चलते जबलपुर, मंडला और सिवनी जिलों में तात्कालिक रूप से 50 सहकारी समितियों का गठन हुआ। उनसे हज़ारों मछुआरा परिवार जुड़े। दिग्विजय सिंह ने विस्थापितों और नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर के साथ बैठक की। उन्होंने माना कि विस्थापितों ने समाज के हित में बड़ा बलिदान किया है।

फ़ोटो साभार : शटरस्टॉक

मछुआरा समितियों ने सहकारी शैली में काम करना शुरू किया, तो वे मज़दूर से मालिक बने। 54 समितियां बनीं, 2038 सदस्य बने, 594 नावें जुटीं, 3800 किलोग्राम जाल आया। सरकार ने 15 जून 1996 तक के लिए 450 टन मछली पकड़ने का लक्ष्य उन्हें दिया। सहकारी संघ ने लक्ष्य से आगे बढ़कर 600 टन मछली उत्पादन किया। इसी साल कुल मछली उत्पादन का जो 20 फीसदी हिस्सा मछुआरों के निजी उपयोग के लिए छोड़ा गया था, उसकी क़ीमत रही तकरीबन 25 लाख रुपए। वह मछुआरों अलग से मिली। मछुआरों ने मछली मारने के लिए जो परिश्रम किया, उसकी मज़दूरी मिली 47 लाख रुपए। ठेकेदारी प्रथा की तुलना में मछुआरों का लाभ 22 लाख रुपए ज़्यादा रहा। सहकारी संघ ने सरकार को 22 लाख 64 हज़ार रुपयों की रायल्टी चुकायी। संघ ने कुल व्यापार क़रीब 3 करोड़ 50 लाख रुपयों का किया। इससे संघ को 20 लाख रुपयों का मुनाफ़ा हुआ।

बरगी जलाशय में मछली उत्पादन एवं विपणन का पांच साला अधिकार विस्थापितों की सहकारी समितियों को दिया गया था। इन समितियों ने जलाशय के ऊपरी छोर पर सुखान मछलियों के उत्पादन और विक्रय रोक लगा दी थी। इससे हज़ारों मछुआरों के सामने आजीविका का संकट आ गया। मंडला जिले के नारायणगंज के तिंदनी और ग्वारी क्षेत्र के सैकड़ों मछुआरे परंपरागत रूप से इस सुखान मछली को पकड़ने के बाद उसे भूनकर बेचने के धंधे में लगे थे। निगम के द्वारा मछली मारने व्यवस्था और बाद में ठेकेदारी प्रथा के तहत भी ये मछुआरे स्थानीय सुखान मछलियों को पकड़ते थे। उनके द्वारा पकड़ी गई सुखान मछलियां सवा तीन रुपए प्रति किलोग्राम की दर से उन्हें ही लौटा दी जाती थीं।

सहकारिता संघ ने छोटी फांद के जाल पर पाबंदी इसलिए लगा दी थी कि इन स्थानीय मछलियों के साथ संचित मत्स्य बीज भी कहीं जलाशय के बाहर न निकल जाएं। मत्स्य बीज के निकल जाने का मतलब था- उत्पादन में भारी गिरावट। इस काम में जुटे मछुआरे निरंतर अपनी समस्या को लेकर संघ के संचालक मंडल के सामने आते रहे। रोज़गार छिन जाने पर वे जलाशय से मछली चोरी भी करने लगे। इस व्यावहारिक दिक्कत को देखकर बरगी पुनर्वास आयोजन समिति ने सुखान मछली का उत्पादन फिर शुरू कराया। पांच महीनों में 115 टन सुखान मछली उत्पादित हुई और हज़ारों मछुआरों को रोज़गार मिला। संघ को भी 3 लाख 84 हजार रुपए का लाभ मिला।

2003 तक यह व्यवस्था क़ायम रही। मछुआरों का जीवन सुख से चलता रहा। पर कांग्रेस सरकार के जाने और बीजेपी सरकार के आने के साथ ही सहकारी व्यवस्था उलट दी गई। राजनेताओं, नौकरशाही और ठेकेदारों का गठजोड़ हुआ। सहकारी समितियों के संघ पर आरोप लगाया गया कि वे कम मछली उत्पादन कर रही हैं। इससे सरकार को रॉयल्टी का घाटा हो रहा है। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा व्यापार में बदल दी गई। फेडरेशन के चुनाव कराने में पंजीयक सहकारी संस्थाओं ने अरुचि दिखाई। चुनाव ना होने पर आपत्ति करते हुए ठेके पर मछली मारने का काम दे दिया गया। ठेकेदार ने उस साल केवल 80 टन ही मछली उत्पादन दिखाया। सहकारी संघ के 600 टन उत्पादन की तुलना में यह 750 फ़ीसदी कम था। पर सरकार को इस पर कोई गुरेज़ न हुआ। उसे अपनी रायल्टी के बेहद कम हो जाने पर भी ग़ुस्सा नहीं आया। वहां आपसी मिलीभगत से निजी वारे-न्यारे होते रहे। इधर मछुआरे पहले मालिक से मज़दूर हुए और फिर बेरोज़गार होकर पलायन करने को मजबूर हो गए।

कहा जा सकता है कि निजी स्वार्थ बाक़ी सब बातों पर भारी पड़ गया। नतीज़तन लगभग 15000 मछुआरों का जीवन ख़तरे में पड़ा। उन्हें दोबारा विस्थापित किया गया। पहली बार ज़मीन से और दूसरी बार परंपरागत रोज़गार से। और अब वे पलायन के जरिए तीसरा विस्थापन भोगने के लिये विवश कर दिए गए हैं। अप्रैल 2018 के पहले सप्ताह में बरगी और नारायणगंज में मछुआरों ने सामाजिक कार्यकर्ता सार्थक सेठी और राजकुमार सिन्हा के आह्वान पर बैठक करके फिर संघर्ष करने का मन बनाया है। मछुआरों की मांग है कि बरगी जलाशय में मछली-बीज करीब डेढ़ करोड़ की तादाद में प्रति वर्ष डाला जाना चाहिए। लेकिन बीज डालने का काम बंद है। इससे मछली उत्पादन लगभग नगण्य स्थिति में पहुंच गया है। पांच से 10 मछुआरों का दल अपनी किश्ती और जाल लेकर दिन भर मछली की खोज में लगा रहता है। बदले में उन्हें 4-5 किलो मछली ही मिल पाती है। इसे ठेकेदार 25 रुपए किलो के भाव से ख़रीद लेता है। इस तरह दिन भर की मज़दूरी के रूप में उन्हें 125 रु. ही मिल पाते हैं। इसे अगर 10 लोगों में विभाजित किया जाए, तो 12-13 रु प्रति मछुआरा/प्रति दिन ही पड़ता है, जो एक व्यक्ति का भी पेट भरने के लिए पूरा नहीं होता। पर्याप्त मात्रा में मछली न मिलने के कारण ही इन दिनों मछुआरों का भारी पलायन हो रहा है। उधर गांवों में रह गए बूढ़ों, महिलाओं और बच्चों को भीषण अभाव का सामना करना पड़ रहा है।

ग़ौरतलब है कि जाल की क़ीमत बाज़ार में 400 से 600 रुपए प्रति किलोग्राम है। एक जाल एक से सवा क्विंटल का होता है। इस तरह उसकी क़ीमत 40 से 60 हजार रुपए तक होती है। किश्ती की क़ीमत अलग से। यह सब मछुआरों को ही जुटाना पड़ता है। जाल दो मौसमों में ही बर्बाद हो जाता है। किश्ती भी दो साल से ज़्यादा नहीं चलती। इस तरह मछुआरों को निरंतर लागत का इंतजाम करते रहने को मजबूर होना पड़ता है। ठेकेदार इसमें उनकी कोई मदद नहीं करता। वह कोई जोख़िम भी नहीं उठाता। उसका केवल फ़ायदे से उसका संबंध होता है।

इस समस्या का एकमात्र समाधान यही है कि 2004 से पहले वाली व्यवस्था में फिर से वापस लाया जाए। यानी मत्स्य सहकारी समितियों को ही जलाशयों में मछली मारने का काम सौंपा जाए। इससे अनेक लाभ होंगे- मछली उत्पादन बढ़ेगा। मछुआरों को रोज़गार मिलेगा। पलायन रुकेगा। और सरकार को ज़्यादा रॉयल्टी मिलेगी। मगर ये ज़ाहिर है कि मौजूदा मध्य प्रदेश सरकार ये सब नहीं चाहती!

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