किसान जो कथानक लिख रहे हैं

31 अक्टूबर तक कोल्ड सेटोरेज खाली करने का दबाव बढ़ा तो होगा आंदोलन – किसान

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तीन दशक पहले देश में दो तरह के किसान आंदोलनों की चर्चा थी। उनमें एक तरफ संवैधानिक दायरे में चल रहे आंदोलन थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महेंद्र सिंह टिकैत, महाराष्ट्र में शरद जोशी और कर्नाटक में एमडी नंदजुंदास्वामी के नेतृत्व में किसान मुख्य रूप से लाभकारी मूल्य के लिए संघर्ष की राह पर उतरे थे। दूसरी तरफ बिहार समेत कुछ राज्यों में चल रहे नक्सलवादी संघर्ष थे, जो भी खुद को किसान आंदोलन कहते थे। उनका घोषित उद्देश्य किसान-मजदूरों को ग्रामीण अर्ध-सामंती व्यवस्था से मुक्त कराना था। 1990 के दशक में इन दोनों तरह के आंदोलनों ने अपना असर खो दिया। उसके साथ ही ग्रामीण खुशहाली का सपना फ़ौरी तौर पर पृष्ठभूमि में चला गया।

भूमंडलीकरण की नीतियां अपनाए जाने के बाद के दौर की मुख्य कहानी ग्रामीण बदहाली की रही है। दरअसल, यह बढ़ती गैर-बराबरी की कहानी है, जिसमें शहरी धनी और मध्य वर्ग की चमक बढ़ी, जबकि गांव, गरीब और कृषि से जुड़े समुदायों का संकट गहराता चला गया। यही वो दौर है, जिसमें किसानों की आत्म-हत्याएं सुर्खियों में रही। खुदकुशी करने वाले किसानों की संख्या तीन लाख से ज्यादा हो गई। खेती का पेशा लगातार अपना आकर्षण खोता चला गया। इस दौर में लाखों किसान खेती से पलायन कर शहरों में गए और वहां दिहाड़ी मजदूर बनने को मजबूर हुए।

पूर्व यूपीए सरकार ने इस ग्रामीण संकट को विकास के अधिकार-आधारित नज़रिये(Rights based approach) और केंद्र प्रायोजित (कल्याण) योजनाओं (Central Sponsored Schemes) से इस समस्या का हल ढूंढने  कोशिश की। ये नहीं कहा जा सकता कि वो प्रयास बिल्कुल नाकाम रहा। बल्कि उससे ग्रामीण क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक पैसा गया। इससे वहां से पलायन घटा। लोगों की आमदनी बढ़ने से वहां आर्थिक गतिविधियां तेज हुईं। कई अध्ययनों का निष्कर्ष है कि इससे आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा (विश्व बैंक के पैमाने के मुताबिक) गरीबी रेखा से ऊपर आया। इस कारण ही नव-मध्य वर्ग (ऐसे तबके जो गरीबी रेखा से ऊपर आए लेकिन मध्य वर्ग का हिस्सा नहीं बन सके) की अवधारणा वजूद में आई। यह माना गया है कि इस तबके में बेहतर जिंदगी पाने की नई आकांक्षाएं पैदा हुईं। इसकी तुरंत कोई संभावना नज़र ना आने से उनमें तत्कालीन सरकार के प्रति असंतोष भरा।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने इसका पूरा लाभ उठाया। मोदी ने “नव-आकांक्षा वाले भारत” की तब जो चर्चा की, उसका मुख्य लक्ष्य ये जन-समूह ही थे। इन्हीं जन-समूहों को “अच्छे दिन” के वादे ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया। 2014 में बीजेपी को अप्रत्याशित जीत दिलाने में इन तबकों के समर्थन का अहम रोल रहा। लेकिन शहरी धनी और मध्य वर्ग में मोदी की “नव-आकांक्षा वाले भारत” का मतलब “सब्सिडी, ख़ैरात और आरक्षण” से मुक्ति समझा गया था। पिछले चार साल का अनुभव है कि मोदी सरकार की इच्छा इसी दिशा में बढ़ने की रही है, हालांकि व्यावहारिक मजबूरियों के कारण वह ऐलानिया तौर पर ऐसा करने का खुला साहस नहीं दिखा पाई है। मगर इस दौरान उसने नीतियों में जो अस्थिरता दिखी और नोटबंदी जैसे गुमराह कदम उसने उठाए, उसके नतीजे गांव, गरीब और वंचित तबकों को भुगतने पड़े हैं। इस कारण पहले से चला रहा कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्र का संकट और विकराल हो गया है।


फ़ोटो स्रोत : गुरमीत सप्पल

किसान आंदोलन की नई ज़मीन

इन्हीं हालात से आज के किसान आंदोलन की जमीन तैयार हुई है। 1980 के दशक के किसान आंदोलन बिना कोई नया राजनीतिक कथानक लिखे पृष्ठभूमिमें चले गए। इसलिए आज ये सवाल अहम है कि क्या मौजूदा किसान आंदोलन उससे अलग कोई दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ पाएंगे? पिछले साल के मध्य से देशभर के किसान संगठनों का एक मंच पर आना शुरू हुआ। अब अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के बैनर तले 190 से ज्यादा किसान संगठन एकजुट हैं। इनमें स्वतंत्र किसान संगठन हैं, तो वामपंथी दलों से संबंधित माने जाने वाले गुट भी। फिलहाल, इन्होंने न्यूनतम सहमति की दो मांगों को सामने रखा है- संपूर्ण कर्ज मुक्ति और स्वामीनाथन फॉर्मूले के मुताबिक कृषि लागत से डेढ़ गुना ज्यादा एमएसपी। न्यूनतम सहमति की मांगों को चुनना एक कारगर रणनीति साबित हुआ है। इससे आंदोलन का दायरा फैला है। उसकी ताकत बढ़ी है।

मगर क्या ये बात लंबे समय तक तक जारी रहेगी? यही आज सबसे बड़ा सवाल है। मौजूदा किसान आंदोलन की प्रासंगिकता यह है कि इसने देश में एक नया कथानक अस्तित्व में आने की संभावना पैदा की है। उच्च आर्थिक विकास दर, भारत की बढ़ती समृद्धि और उभरते मध्य वर्ग के सहारे चमकते भारत का जो कथानक पिछले दो दशकों में लोगों के मन में बैठाया गया, किसान आंदोलन उसकी जवाबी कहानी दुनिया को बता रहे हैं। वे बता रहे हैं कि समृद्धि और खुशहाली की वो चर्चाएं भारत की असली तस्वीर नहीं हैं। उनकी चर्चाओं के शोर में दरअसल देश की बहुसंख्यक आबादी की दुर्दशा को छिपाए रखा गया। मगर जब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा, तो किसान समुदाय आंदोलन की राह अपनाने पर मजबूर हुआ है।

इससे कृषक समुदाय की मुसीबतों पर ध्यान गया है। इतना कि सरकारें किसानों को राहत देने के झूठे-सच्चे एलान कर रही हैं। राजनीतिक दलों में किसान-हितैषी दिखने की होड़ लगी है। मगर भारत में खेती-बाड़ी लंबे समय से जारी नीतियों के कारण मुश्किल में है। इसलिए दिखावटी उपायों और सद्भाव दिखाने भर से उसकी समस्याओं का समाधान नहीं होगा। बहरहाल, अगर यह बात सरकारों के लिए सच है, तो इससे जुड़ी एक बड़ी चुनौती किसान संगठनों के सामने भी है। ये चुनौती है मौजूदा आंदोलन के एजेंडे में विस्तार की। न्यूनतम सहमति के मुद्दों पर चल रहे आंदोलन के लिए ऐसा करना कब मुफ़ीद होगा- यह अलग से विचार का मुद्दा है। लेकिन यह तय है कि किसान आंदोलन सिर्फ ऐसा करके ही अपने सीमित एजेंडे और दायरे से आगे निकल सकेगा।

स्वामीनाथन आयोग की अन्य सिफ़ारिशें

ध्यानार्थ है कि किसान संगठनों ने एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में बने राष्ट्रीय कृषक आयोग की एक सिफारिश पर अमल को अपनी प्रमुख मांग बनाया है। मगर इस आयोग ने बहुत-सी दूसरी सिफारिशें भी की थीं। मसलनआयोग ने भूमि सुधार पर अमल को आगे बढ़ाने, सीलिंग से अतिरिक्त और परती जमीन को भूमिहीनों में बांटने, प्रमुख कृषि भूमि और वनों को गैर-कृषि मकसदों के लिए देने पर रोक लगाने, चरागाह अधिकारों की गारंटी करने और साझा उपयोग वाले जायदादों तक सबकी पहुंच सुनिश्चित करने की अनुशंसा की थी। आयोग ने कहा था कि खेती में ज्यादा उत्पादकता हासिल करने के लिए कृषि क्षेत्र- खासकर सिंचाई, जल निकास, भूमि विकास, जल संरक्षण और जैव विविधिता सुनिश्चित करने वाली खेती- में अधिक सार्वजनिक निवेश अनिवार्य है। आयोग ने महिला किसानों के लिए खास सिफारिशें की थीं। उसमें सबसे महिलाओं को किसान के रूप में मान्यता देना भी शामिल है, ताकि उनके नाम पर किसान क्रेडिट कार्ड जारी हो सकें तथा उन्हें भी केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं की योजनाओं का लाभ मिल सके।

इसके अलावा गांवों की तमाम भूमिहीन आबादी है, जो दिहाड़ी मजदूरी से अपना गुजारा चलाती है। इनमें दलितों का सवाल सबसे अहम है। हालिया रिपोर्टों से ये सामने आया कि देहाती इलाकों में आज भी 71 फीसदी दलित बे-ज़मीन हैं। मुद्दा यह है कि इन सबके हितों को कैसे एक ऐसे व्यापक आंदोलन का हिस्सा बनाया जाए, जिससे ग्रामीण खुशहाली और गैर-बराबरी के मौजूदा ढांचे में बदलाव की कोई व्यावहारिक राह निकल सके। ऐसा हुआ, तभी किसान आंदोलन से फिलहाल जगी आशाएं फलीभूत हो सकेंगी। सिर्फ तभी ये आंदोलन वैसा कथानक बुनने में कामयाब होगा, जिससे ये बड़े बदलाव का वाहक बन सके। किसान संगठन ऐसा कर पाएं, इसके लिए स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के रूप में एक विस्तृत रूप-रेखा उनके सामने मौजूद है। यानी प्रश्न सिर्फ उनकी इच्छा-शक्ति का है।

भारत में लंबे समय से कोई ऐसा जन-आंदोलन नहीं हुआ, जिससे व्यवस्थागत या वर्गीय शक्ति-संतुलन में परिवर्तन की संभावना दिखी हो। गुजरे कुछ दशकों में हुए आंदोलन किसी खास मुद्दे या मांग को लेकर हुए। अपने मौजूदा रूप में किसान आंदोलन भी उनसे अलग नहीं है। लेकिन इसमें व्यापकता ग्रहण करने, एक बड़ा कथानक पेश करने और दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ने की क्षमता एवं संभावना है। मगर अभी यह सिर्फ एक संभावना है। इसे साकार करने के लिए किसान संगठनों को यह सुनिश्चित करना होगा कि आंदोलन महज उनके अपने फ़ौरी स्वार्थ तक सीमित ना रह जाए। इसके लिए उन्हें अपनी वर्गीय दृष्टि एवं सामाजिक नजरिए से आगे निकलना होगा। वे ऐसा कर पाए, जो उनका मौजूदा आंदोलन ऐतिहासिक रूप ग्रहण कर सकता है।

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