E-NAM: किसानों की योजना, व्यापारियों को इनाम

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नरेंद्र मोदी सरकार ने अप्रैल 2016 में E-NAM यानि राष्ट्रीय कृषि बाज़ार की शुरुआत की थी। राष्ट्रीय कृषि बाज़ार की शुरुआत करते वक़्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि E-NAM देश के कृषि क्षेत्र में लिए एक बड़ा बदलाव लाएगा,और E-NAM से ना केवल किसानों को बल्कि कृषि क्षेत्र के तमाम हित धारकों को भी फ़ायदा मिलेगा।

E-NAM के तहत किसान और व्यापारी एक ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से फ़सलों की ख़रीद-बिक्री कर सकते हैं। इसकी मदद से व्यापारियों को अच्छी फ़सल और किसानों को अपनी फ़सल का सबसे सही दाम मिलने की बात कही गई थी। ऑनलाइन मंडी की मदद से किसान E-NAM से जुड़ी मंडियों में सबसे अच्छी कीमत देने वाले व्यापारी को अपनी फ़सल बेच सकते हैं। क्योंकि ये प्रक्रिया ऑनलाइन है इसलिए पारदर्शिता का दावा भी किया गया था। इसमें अंतरराज्यीय ख़रीद की सुविधा भी शामिल की गई थी। यानि एक राज्य का किसान अपनी फ़सल को किसी दूसरे राज्य के व्यापारी को भी बेच सकता है।
राज्यों को अपने मंडी नियमों में कुछ बदलाव कर E-NAM से जुड़ना था। 2017-18 के बजट में सरकार ने कहा कि वो हर राष्ट्रीय कृषि बाज़ार के लिए अधिकतम 75 लाख रुपये तक की मदद करेगी। राष्ट्रीय कृषि बाज़ार के तहत सरकार ने 2015-16 और 2017-18 के लिए 200 करोड़ रुपये बजट का प्रावधान किया था।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 31 अक्टूबर, 2017 तक ई-नाम के तहत 14 राज्यों की 470 मंडियां लाइव हैं यानि E-NAM से जुड़ चुकी हैं। देश भर में 6 हज़ार से ज़्यादा APMC यानि मंडियां हैं। यानि देशभर की करीब 8 फ़ीसदी मंडियां ही E-NAM से जुड़ सकीं। सरकार का लक्ष्य मार्च 2018 तक 585 मंडियों को ई-नाम से जोड़ने का है, जो वित्त मंत्री ने अपने बजट 2018-19 के भाषण में भी दोहराया। E-NAM में अब तक 72 लाख 12 हज़ार किसान, 53 हज़ार 130कमीशन एजेंट और एक लाख व्यापारी रजिस्टर्ड हैं। देश में करीब 14 करोड़ किसान हैं। यानि अब तक ज़्यादा से ज़्यादा 5 फ़ीसदी किसान ही ई-नाम में जुड़ पाए हैं।

ये तो थे आंकड़े जो अपने में ई-नाम योजना के हालात को बयां करते ही हैं। अब बात करते हैं ई-नाम योजना की व्यवहारिकता या कहें कि समस्याओं की। कई राज्यों की चुनिंदा मंडियों को E-NAM से जोड़ा गया। तमाम मीडिया रिपोर्ट ये बताती हैं कि ई-नाम के तहत अंतरराज्यीय खरीद-बिक्री में तमाम समस्याएं आ रही है। यानि एक राज्य से दूसरे राज्य में फ़सल की खरीद-बिक्री आसान नहीं है। जिसका दावा E-NAM की शुरुआत के वक़्त किया गया था।इसके साथ ही व्यापारियों के रजिस्ट्रेशन में भी तकनीकी समस्याएं आ रही हैं। जिससे व्यापारी तो हतोत्साहित हो ही रहे हैं। इसका नुकसान किसान को हो रहा है क्योंकि अंतरराज्यीय बिक्री नहीं होने और व्यापारियों की कमी से किसान को सबसे बेहतर दाम कैसे मिलेंगे?

राज्यों की मंडियों में इंफ्रास्ट्रक्चर, इंटरनेट कनेक्टिविटी जैसी समस्याएं भी आम बात हैं। जिसकी वजह से मंडियों के E-NAM से जुड़ने के बाद भी कोई लाभ नहीं हो रहा है। कई मंडियों में तो फ़सल का एक ही ख़रीदार है तो कहीं एक ही फ़सल का लेनदेन E-NAM के अंतर्गत हो रहा है। अब जब फ़सल का एक ही ख़रीदार होगा या एक ही फ़सल की ख़रीद-बिक्री होगी तो किसान तो तय दाम पर फ़सल बेचने को मजबूर होंगे, सही दाम और व्यापारियों से मोलभाव का सवाल ही यहां ख़त्म हो जाता है। इसके अलावा फ़सल की गुणवत्ता मापने का कोई वैज्ञानिक या ग्रेडिंग तरीका नहीं है। जिसकी वजह से ऑनलाइन खरीद-बिक्री करते समय ज़्यादातर फ़सलों का लेन-देन सामान्य मानकों पर ही होता है।

ई-नाम से पहले कर्नाटक सरकार ने एनसीडीईएक्स ई-मार्केट लिमिटेड के साथ मिलकर REMS यानी राष्ट्रीय ई-मार्केट सर्विस प्राइवेट लिमिटेड लांच की थी। 2016-17 में REMS की 157 मंडियों में 36 हज़ार करोड़ का टर्नओवर किया था। जबकि E-NAM की 240 मंडियों का टर्नओवर 23 हज़ार 250 करोड़ रुपये रहा। REMS में 7 राज्यों की मंडियां जुड़ी हैं। इसमें अंतरराज्यीय ख़रीद-बिक्री भी काफ़ी आसान है। अगर कर्नाटक की REMS और E-NAM की तुलना की जाए तोREMS सारे मामलों में इक्कीस ही साबित होती है।
E-NAM की अब तक की प्रगति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि सरकार ने जिन लक्ष्यों को पाने के लिए इस योजना को लांच किया था। वो मंजिल अभी बहुत दूर है। E-NAM से फ़िलहाल व्यापारियों को कुछ फ़ायदा मिल रहा है पर किसानों को कोई बड़ी राहत अब तक नहीं मिल सकी।

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