प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को डॉक्टरों का खुला ख़त

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राष्ट्रीय पोषण मिशन में सरकार ने ऐलान किया था कि 2010 तक बच्चों की कम वृद्धि, अल्प-पोषण और कम वज़न को सालाना 2 फ़ीसदी की दर से कम करना है। लेकिन, कामकाजी महिलाओं, ख़ासकर असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को मातृत्व अवकाश नहीं मिलने के चलते ये योजना खटाई में पड़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौक़े पर देश के जाने-माने डॉक्टरों ने प्रधानमंत्री को ख़त लिखकर इस दिशा में कदम उठाने की अपील की। हम उनकी चिट्ठी हू-ब-हू प्रकाशित कर रहे हैं।


8 मार्च 2018

श्री नरेंद्र मोदी
प्रधान मंत्री
भारत सरकार

आदरणीय श्री मोदी,

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के अनुरूप मातृत्व लाभ के कार्यान्वयन के लिए

आज विश्व महिला दिवस पर हम अधोहस्ताक्षरी, स्त्री रोग विशेषज्ञ (गायनकोलॉजिस्ट्स) और बच्चों के विशेषज्ञ (पैडीयट्रिक्स) भारत की गर्भवती और धात्री महिलाओं की स्थिति पर आपका ध्यान आकर्षित करने के लिए लिख रहे हैं। आप सहमत होंगे कि जब तक देश की आधी आबादी खून की कमी और कुपोषण से पीड़ित रहेगी, तब तक हम प्रगति नहीं कर पाएंगे।

हम गर्भवती महिलाओं के भोजन और स्वास्थ्य की सुरक्षा के महत्व को बढ़ावा देने के आपके प्रयासों की सराहना करते हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकी है। राष्ट्रीय पोषण मिशन की हाल की घोषणा के अनुसार इस मिशन का उद्देश्य है कि उसकी तीन वर्ष की अवधि (2017-18 से 2019-20 तक) में बच्चों की कम वृद्धि, अल्प-पोषण और कम वज़न के दर को सालाना 2 प्रतिशत कम करना और बच्चों, महिलाओं और किशोरियों में खून की कमी के दर को सालाना 3 प्रतिशत कम करना। जब तक गर्भावस्था के दौरान महिलाएं कुपोषित रहेंगी और उनमें खून की कमी होगी, यह लक्ष्य पूरा नहीं हो पाएगा। यह कुपोषण के अंतःक्रियात्मक चक्र के द्वारा नवजात शिशु पर कुपोषण का भार देगा।

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाईज़ेशन (डब्ल्यूएचओ) की वेबसाइट के अनुसार “स्तनपान शिशुओं की स्वस्थ बढ़ोतरी और विकास के लिए आदर्श भोजन प्रदान करने का एक अप्रतिम तरीका है; यह माताओं के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ के साथ प्रजनन प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है। सबूतों की समीक्षा से पता चलता है कि आबादी के आधार पर छः महीने के लिए केवल स्तनपान शिशुओं को पोषण देने का एक सर्वोत्तम तरीका है। ”

महिलाओं को शिशु के पहले छः महीनों के लिए केवल स्तनपान करने के लिए सक्षम बनाने के लिए डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ की सिफारिश है कि:

  • बच्चे के जन्म के पहले घंटे के भीतर उसका स्तनपान शुरू करना
  • केवल स्तनपान –शिशु केवल माँ का दूध प्राप्त करे, बिना किसी अतिरिक्त भोजन या पेय पदार्थ के, पानी भी नहीं
  • मांग पर स्तनपान – बच्चा जितनी बार चाहे उसे उतना स्तनपान मिले, दिन और रात
  • बोतल, निप्पल या बच्चे को शांत करने वाली अन्य किसी चीज़ का प्रयोग न करना

उपरोक्त का क्रियान्वयन, जो महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण और देखभाल के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, तब तक संभव नहीं है, जब तक कि महिलाओं को उनकी काम की ज़िम्मेदारियों से प्रसव के छः महीने बाद तक मुक्त नहीं किया जाता। राष्ट्रीय मातृत्व लाभ अधिनियम के हाल के संशोधन इस बात को मानते हुए संगठित क्षेत्र में महिलाओं को छः महीनों का वैतनिक अवकाश देते हैं। पर भारत की 95% महिला श्रमिक अनौपचारिक और असंगठित क्षेत्र में हैं और गर्भावस्था के दौरान व प्रसव के बाद उन्हें किसी भी तरह की मज़दूरी और मुआवज़ा नहीं मिलता है, जबकि हम उम्मीद करते हैं कि वे अपने बच्चे को छः महीने तक केवल स्तनपान देंगी और साथ में आराम करेंगी और अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखेंगी।

भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2016 (वित्त मंत्रालय, भारत सरकार) के अनुसार “42.2% भारतीय महिलाओं का गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त वज़न नहीं बढ़ता” और वह सिफारिश करता है कि “भारत में मातृत्व एवं शिशु के पोषण और स्वास्थ्य सम्बंधित हस्तक्षेप में सार्वजनिक निवेश के आर्थिक लाभ सबसे अधिक हैं”।

महोदय, इस संकट को संबोधित करने के लिए, चिकित्सकों के रूप में, हम आपसे अनुरोध करते हैं कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 लागू हो, जिसके तहत:

  • प्रधान मंत्री मातृत्व वंदना योजना (पीएमएमवीवाई), मातृत्व लाभ की केन्द्रीय योजना को तुरंत सभी महिलाओं के लिए लागू किया जाए। इसे शर्तों से मुक्त किया जाए और यह योजना, बच्चों की संख्या तथा महिलाओं की उम्र से संबंधित नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह नागरिकों के रूप में महिलाओं और बच्चों दोनों के लिए मूल रूप से भेदभावपूर्ण है।
  • इस योजना के तहत मातृत्व लाभ के रूप में दी जाने वाली राशि 5,000 रुपये से बढ़कर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के प्रावधान के अनुरूप कम से कम 6,000 रुपये की जाए और राशि को महंगाई के अनुरूप बढ़ाया जाए।
  • स्थानीय रूप से तैयार खाद्य पदार्थों के माध्यम से पूरक पोषण – स्थानीय आंगनवाड़ी केंद्र में सभी गर्भवती और धात्री महिलाओं को गरम पका भोजन दिया जाना चाहिए।

हमें उम्मीद है कि आप हमारी चिंता की सराहना करेंगे और जवाब देंगे।

बहुत बहुत धन्यवाद।

सादर,

1. डॉ आभा गोविन्द (कंसलटंट, ऑब्सटेट्रिक्स और गाइनाकौलजी, लन्दन)
2. डॉ आभा खुल्लर सभीखी (दिल्ली)
3. डॉ अमित(नव ज्योति अस्पताल, दिल्ली)
4. डॉ अंशु शर्मा (नैशनल सेंटर फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल, दिल्ली)
5. डॉ अनीता वर्मा (निजी प्रैक्टिस, दिल्ली)
6. डॉ अन्तिमा(निजी प्रैक्टिस, नैनीताल)
7. डॉ आशा शर्मा (निजी प्रैक्टिस, दिल्ली)
8. डॉ अरुण गुप्ता (बीपीएनआई और आईबीएफ़एएन)
9. डॉ बिनायक सेन (मेडिको फ्रेंड्स सर्कल, पश्चिम बंगाल)
10. डॉ चन्दा खन्ना (निजी प्रैक्टिस, दिल्ली)
11. डॉ चारुलता बैनर्जी (कोलकाता)
12. डॉ दीपिका गुलाटी (दिल्ली)
13. डॉ गोपाल दाबड़े (ड्रग एक्शन फ़ोरम)
14. डॉ हेमा शर्मा (सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम, बेंगालूरू)
15. डॉ कल्पना श्रीवास्तव (निजी प्रैक्टिस, दिल्ली)
16. डॉ केया गुप्ता(कोलकाता)
17. डॉ कुमकुम श्रीवास्तव (जयपुर)
18. डॉ जे पी दाधिची (बीपीएनआई और आईबीएफ़एएन)
19. डॉ ज्योत्सना अग्रवाल (निजी प्रैक्टिस, दिल्ली)
20. डॉ ज्योत्सना मदन (क्लाउडनाईन अस्पताल, बेंगालूरू)
21. डॉ मनीषा(लाईफ़लाईन अस्पताल, दिल्ली)
22. डॉ मीरा शिवा (इनिशिएटिव फॉर हेल्थ ऐंड इक्विटी इन सोसाइटी)
23. डॉ मोनिका बजाज(पोर्टलैंड हॉस्पिटल फॉर विमिनऐंड चिल्ड्रेन, लन्दन)
24. डॉ नंदिनी अठावले (निजी प्रैक्टिस, जलगाँव)
25. डॉ नीरा शर्मा (दिल्ली)
26. डॉ नीता लाल (सेवानिवृत्त बच्चों की चिकित्सक, गुरुग्राम)
27. डॉ नितिन दुनवीर (दिल्ली)
28. डॉ राहुल भारदवाज (निजी प्रैक्टिस, दिल्ली)
29. डॉ राहुल बेहल (दिल्ली)
30. डॉ सतीश बाबू (बेंगालूरू)
31. डॉ शारदा जैन (ईस्ट दिल्ली गाइनाकौलजी फ़ोरम और लाईफ़ केयर अस्पताल)
32. डॉ सिद्धार्थ सेन (रॉयल ग्वेंट हॉस्पिटल, न्यूपोर्ट)
33. डॉ सुभाश्री बी (चेन्नई)
34. डॉ सुरंजिन पल्लिपमूलाप्रसाद (झपाइगो, रांची)
35. डॉ सिल्विया कर्पागम (जन स्वास्थ्य चिकित्सक व शोधकर्ता, कर्नाटक)
36. डॉ टीना जॉर्ज (क्रिस्चन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर)
37. डॉ वंदना प्रसाद (पब्लिक हेल्थ रीसोर्स नेटवर्क, दिल्ली)
38. डॉ वर्षा श्रीधर (निजी प्रैक्टिस और गैर-सरकारी संस्था)
39. डॉ विनीत खन्ना (निजी प्रैक्टिस, दिल्ली)
40. डॉ योगेश जैन (एआईआईएमएस और जन स्वास्थय सहयोग, बिलासपुर)


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