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कोयला उद्योग में मजदूर आंदोलन हांफ रहा है। दम इसलिए नहीं टूटा कि मजदूरों का जज्बा बरकार है। वरना “दुनिया के मजदूरों एक हो” से लेकर “मजदूरों दुनिया को एक करो” तक के नारे बुलंद करने वालों के अपने राजनीतिक और आर्थिक हित इस कदर हावी हुए हैं कि “जो मजदूरों की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा” जैसी उनकी घोषणाएं हाशिए पर चली गई है। हकों की लड़ाई में लगातार पिछड़ते मजदूर कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण को अप्रभावी बनाने की सरकारी कोशिशों से भयभीत हैं। वे अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को बेताब हैं। पर वर्षों से निहित स्वार्थों के लिए लड़ते-झगड़ते मजदूर नेता इतने शक्तिहीन हो चुके हैं कि अब तो उनमें आंदोलन के लिए नैतिक बल का भी सर्वथा अभाव दिखता है।

कोयला मजदूरों का आंदोलन इतना बेबस कोई एक दिन में नहीं हुआ। सन् 1973 में बने कोयला खान (राष्ट्रीयकरण) कानून को लगातार कमजोर किया जाता रहा और मजदूर नेता इसमें सहभागी बनते चले गए। अब भी मजदूर नेता सत्ता प्रतिष्ठानों में भागीदार बनकर अपनी-अपनी दुकानें चमकाने में व्यस्त हैं। ऐसा नहीं है कि सारे के सारे मजदूर संगठन या नेता मजदूर हितों से विमुख हैं। पर संसाधनों की कमी और व्यापक स्तर पर विस्तार न होने की वजह से वो निजीकरण के पक्ष में खड़ी बड़ी-बड़ी शक्तियों के खिलाफ प्रभाव छोड़ने में नाकाम हैं।

ऐसे माहौल में सार्वजनिक क्षेत्र के एकाधिकार को खत्म करके निजी कंपनियों को भी कोयले की कॉमर्शियल माइनिंग करने की इजाजत देने के विरोध में कोयला मजदूरों का आंदोलन केंद्र पर कोई दबाव बना पाया, तो इसे चमत्कार ही माना जाएगा। केंद्र सरकार ने 20 फरवरी को निजी क्षेत्र में भी कमर्शियल माइनिंग की इजाजत दे दी। इसके खतरे को भांपते हुए मजदूर इसके विरोध में अपनी-अपनी तरह से सड़कों पर उतर गए। पर गुटों में बंटे मजदूर संगठनों के नेता अब तक आरोप-प्रत्यारोप में ही उलझे हुए हैं। पंद्रह दिनों बाद कुछ संगठन की निद्रा टूटी भी, तो वे अपने को सांकेतिक आंदोलन तक ही सीमित रखना चाहते हैं। खास बात यह कि कोयला उद्योग का छोटा-बड़ा कोई भी मजदूर संगठन निजी क्षेत्र में कमर्शियल माइनिंग के पक्ष में नहीं है। सबको सरकार से एक जैसी शिकायत है। पर वे जो कह रहे हैं, वह उनके कर्म में नज़र नहीं आता।

ट्रेड यूनियनों में एकता नहीं

कोयला उद्योग में मान्यता प्राप्त पांच श्रमिक संगठनों- राष्ट्रीय खान मजदूर फेडरेशन (इंटक), भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस), आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक), सेंटर फार इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) और हिंद मजदूर सभा (एचएमएस) में से इंटक को छोड़कर बाकी संगठनों ने 16 अप्रैल को एक दिन की सांकेतिक हड़ताल का आह्वान किया है। राष्ट्रीय स्तर पर बीएमएस और इंटक का प्रभाव ज्यादा है। पर इंटक बीएमएस के साथ जाने को तैयार नहीं है। वह एक दिन की हड़ताल को कोयला मजदूरों की आंखों में धूल झोंक कर प्रकारांतर से आंदोलन को कमजोर करने वाला कदम मान रहा है। सोशल मीडिया पर कोयला मजदूरों की जो भावनाएं अभिव्यक्त हुईं हैं, उनसे भी इंटक के आरोपों को बल मिलता है। पर इंटक की रणनीति क्या होगी, इस पर उसने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। दूसरे शब्दों में कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण को बेअसर करने वाले फैसले के विरोध में आंदोलन से पहले ही बिखराव शुरू हो चुका है।

कोयला खान (विशेष प्रावधान) विधेयक-2015 राज्यसभा में 20 मार्च 2015 को पास हुआ था। इसके साथ ही कोयला खान (राष्‍ट्रीयकरण) अधिनियम, 1973 और खान और खनिज (विकास व नियमन) अधिनियम, 1957 की पाबंदियां खत्म हो गई थीं। यानी सार्वजनिक क्षेत्र के कोयला कंपनियों का एकाधिकार खत्म करते हुए निजी क्षेत्र में कोयला खनन का रास्ता खोल दिया गया। कोई 45 वर्षों बाद कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण को पलटने के कदम से जाहिर है कि राज्य सभा में बहुमत के लिए तरसती बीजेपी सरकार को विपक्ष का भी साथ मिल गया था।

वैसे, यूपीए के शासनकाल में बात-बात पर त्योरियां दिखाने वाले भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) को इस बार पहले जैसा गुस्सा नहीं आया, तो समझा जा सकता है कि इसमें उसके राजनीतिक हित कहीं न कहीं आड़े आ। सीटू ने अपनी शक्ति भर प्रभाव दिखाने की कोशिश की। पर व्यापक मजदूर आधार वाले इंटक का बीएमएस की तरह सांकेतिक तौर पर भी सामने ना आना चौंकाने वाला है। जबकि इंटक और कांग्रेस के लिए यह एक सुनहरा मौका था। इंटक के महासचिव राजेंद्र सिंह इतना भर ही बोल पाए कि उनका संगठन दलालों के हाथों का खिलौना नहीं बनेगा और अपना रास्ता खुद तैयार करेगा, जिससे सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार के लिए मजबूर होना होगा।


फ़ोटो स्रोत: रूपक डे चौधरी, रॉयटर्स

एक-दूसरे पर आरोप लगाते नेता

इंटक में अंतर्कलह और आंदोलन को लेकर उसके ढीले-ढाले रुख से न केवल मजदूरों में असंतोष है, बल्कि बीएमएस को अपनी कमियों पर पर्दा डालकर इंटक को घेरने का एक और मौका मिल गया है। बीएमएस की झारखंड प्रदेश कमेटी के महासचिव बिंदेश्वरी प्रसाद का आरोप है कि इंटक कोयला मजदूरों के आंदोलन से दूर-दूर इसलिए रहना चाहता है क्योंकि उसके नेताओं के कोयला उद्योग में व्यावसायिक हित हैं। इंटक के अनेक नेता परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के कोयला उद्योग में बड़े-बड़े ठेकों पर काबिज हैं। राष्ट्रीयकृत कोयला उद्योग की खुली उत्खनन परियोजनाओं में नब्बे फीसदी तक कोयले का खनन निजी कंपनियां करती हैं, जिनका व्यवहार पुराने जमाने की कोयला कंपनियों के व्यवहार का सुधरा रूप मात्र है। इन कंपनियों से इंटक के नेताओं के हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में कोयले की कमर्शियल माइनिंग उनके लिए वरदान ही साबित होगी। इसलिए उन्हें मजदूरों में पैठ जमाने का सुनहरा मौका गंवाने से गुरेज नहीं है।

लेकिन इंटक की मानें तो केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से ही बीएमएस पग-पग पर आंदोलन को कमजोर कर रहा है। बहरहाल, कोयला उद्योग के मजदूरों संगठनों में किसी भी आंदोलन को लेकर आपसी सहमति न होने की वजह से आंदोलन किस तरह कमजोर हुआ है, यह समझने के लिए हाल के वर्षों के चंद उदाहरण काफी हैं। केंद्र में बीजेपी सरकार बनने के बाद देश में 80 फीसदी कोयले का उत्पादन करने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड में विनिवेश और निजी क्षेत्र में कमर्शियल माइनिंग का प्रस्ताव आया, तो कोयला उद्योग में सक्रिय तमाम श्रमिक संगठनों ने सितंबर 2014 में तीन दिवसीय “वर्क टू रूल” आंदोलन का एलान किया था। पर यह मामूली आंदोलन भी हो नहीं सका।

आपसी मतभेद से लड़ाई कमज़ोर

इसके बाद मजदूर संगठनों ने 24 नवंबर 2014 को एक दिवसीय हड़ताल करने का आह्वान किया। पर हड़ताल से ठीक पहले बीएमएस ने अपने को यह कहते हुए अलग कर लिया कि मांगे मनवाने के लिए हड़ताल ही एकमात्र रास्ता नहीं है। जब सरकार अपने एजेंडे पर आगे बढ़ती गई, तो बीएमएस भी मजदूरों के दबाव में आया। नतीजतन सभी पांच मान्यता प्राप्त मजदूर संगठन गोलबंद हुए। 2015 में 6 जनवरी से पांच दिवसीय हड़ताल शुरू की गई। इसे 1977 के बाद की सबसे बड़ी औद्योगिक हड़ताल बताया गया। वाकई, यह हड़ताल सफल हो जाती तो देश में बिजली का उत्पादन बुरी तरह ठप हो गया होता। इसलिए कि वह वही दौर था जब बिजली घरों में कोयले के लिए लाले पड़े हुए थे। पर कोयला मंत्री पीयूष गोयल के हस्तक्षेप से दूसरे दिन ही हड़ताल वापस ले ली गई। तब बीएमएस ने कहा था कि उसे भरोसा है कि सरकार मजदूर हितों का ख्याल रखेगी।

पांच केंद्रीय मजदूर संगठनों की सहमति से बीते साल जून में होने वाली राष्ट्रव्यापी तीन दिवसीय हड़ताल तीन महीनों के लिए टाल दी गई थी। इस बाबत उप मुख्य श्रम आयुक्त (केंद्रीय) के कार्यालय में पांचों मजदूर संगठनों के प्रतिनिधियों ने कोयला मंत्रालय और कोल इंडिया लिमिटेड के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में संयुक्त मसौदे पर हस्ताक्षर किए थे। पर तीन महीने पूरे होते-होते बीएमएस ने अपनी राह अलग कर ली। देश के दस केंद्रीय मजदूर संगठनों ने अपनी दस सूत्री मांगों को लेकर बीते साल 9 से 11 नवंबर तक संसद के समक्ष धरना दिया था। पर बीएमएस उसमें शामिल नहीं हुआ। उसने इस आंदोलन के तुरंत बाद लगभग समान मुद्दों पर 17 नवंबर को दिल्ली में प्रदर्शन किया। हालांकि उसके एजेंडे में निजी क्षेत्र में कमर्शियल माइनिंग का मुद्दा नहीं था।

सार्वजनिक क्षेत्र के कोयला उद्योग में हिंद मजदूर सभा (एचएमएस) सदस्यों के लिहाज से सबसे बड़ा मजदूर संगठन है। इसके बाद ही बीएमएस और इंटक का स्थान आता है। एचएमएस को किसी भी आंदोलन में इंटक या बीएमएस के साथ जाने से परहेज नहीं रहा। सीटू और ऐटक का रुख भी सकारात्मक रहा। मगर आंदोलनों को कमजोर करने के लिए मुख्य रूप से इंटक और बीएमएस को ही जिम्मेदार ठहराया गया है। इंटक की बुरी स्थिति आपसी विवादों को लेकर भी है। यह तीन गुटों में बंटा हुआ है। असली इंटक कौन, इसका फैसला अदालत में होना है। कोयला मजदूर संगठनों का दशा-दिशा आंदोलनों की धार को भोंथरा कर चुका है। इसलिए आगामी 16 अप्रैल को चार केंद्रीय मजदूर संगठनों की ओर से आहूत हड़ताल सरकार पर कितना प्रभाव डालेगी, इसको लेकर सवाल है।

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