लौट आया खदान मालिकों का जमाना!

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भारत में फिर से कोयला खान मालिकों का जमाना आ गया है। 1970 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दिवाली की रात कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण करके खान मालिकों की बत्ती गुल करवाई थी, जिससे शोषित-पीड़ित मज़दूरों का घर रोशन हो गया था। चार दशक बीतते-बीतते वक़्त ऐसे बदला है कि सालों से अच्छे दिन के इंतज़ार में बैठे नए जमाने के खान मालिकों घर रोशन है और कोयला मज़दूर खानों में काम कर चुके बाप-दादाओं की दास्तान याद करके अंधेरी गलियों में भटक रहे हैं।

कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण करने के बाद इंदिरा गांधी शुरू से ही इस बात को लेकर आशंकित थीं कि खान मालिक राष्ट्रीयकरण को फेल कराना चाहेंगे। इसलिए उन्होंने श्रमिकों को संबोधित करते हुए कहा था – “आप लोग सतर्क रहें। लगन से काम करें। राष्ट्रीयकृत कोयला उद्योग को सफल बनाने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाएं। वरना पुराने कोलियरी मालिक राष्ट्रीयकरण को फेल कराना चाहेंगे। वे साबित करना चाहेंगे कि सरकार कोलियरियां नहीं चला सकती। आप सबको इस चुनौती को स्वीकार करना होगा।“ आख़िर चार दशकों से भी ज़्यादा समय बीत जाने के बाद इंदिरा गांधी ने जो आशंका व्यक्त की थी, वो सही साबित हो रही है।

सार्वजनिक क्षेत्र के कोयला उद्योग का एकाधिकार ख़त्म करके निजी कंपनियों को कोयला खनन और मार्केटिंग का अधिकार मिलते ही भारतीय कोयले के कारोबार को ललचायी नज़रों से देखने वाले देश-विदेश के पूंजीपतियों की मुरादें अंतत: पूरी हो गईं हैं। आर्थिक उदारीकरण के जनक पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव जो नहीं कर पाए, वह काम मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर दिखाया है। नोटबंदी और जीएसटी के कुप्रभावों का वोट के रूप में बेहतर रिटर्न मिलने से उत्साहित मोदी सरकार को ज़रूर भरोसा होगा कि यह दांव भी सीधा ही पड़ेगा।

यूनियनों में कर्मचारियों जैसा उबाल नहीं

शायद यही वजह है कि कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के 45 साल पुराने फ़ैसले को पलटने जैसी मोदी सरकार की कार्रवाई से नाराज़ श्रमिक संगठनों की गतिविधियों पर सरकार की निश्चित ही नजर होगी। पर शायद उसे भरोसा भी है कि सब ठीक हो जाएगा। सरकार को ऐसा भरोसा हाल के वर्षों में कोयला उद्योग के मामले में श्रमिक संगठनों की भूमिकाओं को देखते हुए भी बना है। वैसे यह बात सही है कि कोयला उद्योग का इतिहास बदल देने वाली घटना को लेकर श्रमिक संगठनों में जैसा उबाल होने चाहिए, फिलहाल नहीं दिख रहा है, जिसको लेकर कोयला मज़दूर सोशल मीडिया पर चिंता भी जता रहे हैं। श्रमिक संगठनों के नेता अभी अख़बारों में बयानबाजी तक ही सीमित हैं। कोयला उद्योग में इंटक, बीएमएस, सीटू, एटक और एचएमएस मान्यता श्रमिक संगठन हैं। इनके नेता चाहते हैं कि उनके बीच आंदोलन के सवाल पर एकता बने। इस मुद्दे पर पहले तय हुआ था कि 4 मार्च को रांची में बैठक होगी। अब बैठक का स्थान बदल कर नई दिल्ली हो गया है।

पर कोयला कर्मचारियों में सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ उबाल इतना है कि वह एक दिन भी रुकने को तैयार नहीं हैं। तभी तो बीते 21 फरवरी को कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण का पहिया उल्टी दिशा में घुमाने वाला फ़ैसला आते ही सार्वजनिक क्षेत्र की कोयला कंपनियों के कर्मचारी अपनी विचारधाराओं और अपने संगठनों की परवाह किए बिना सड़कों पर उतर गए थे। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए सीटू से जुड़े आल इंडिया कोल वर्कर्स फेडरेशन कर्मचारियों की सुर में सुर मिलाने के लिए सामने आ चुका है। दो दिनों के भीतर देश भर में कम-से-कम 60 स्थानों पर प्रदर्शन और पुतलादहन किए जा चुके हैं। सोशल मीडिया में सरकार के फ़ैसले के विरोध में प्रतिक्रियाओं की बाढ़ है। कर्मचारियों की बेचैनी ऐसी कि अपने नेताओं को भी बख्शने को तैयार नहीं दिखते। कहा जा सकता है कि नेता पीछे और मज़दूर आगे हैं। इस उबाल को देखते हुए नहीं लगता कि मोदी सरकार का दांव हर बार की तरह सीधा पड़ने वाला है।

मोदी सरकार की नीति के अनुरूप

वैसे निजीकरण के सवाल पर मोदी सरकार के हौसले अकारण ही बुलंद नहीं हुए। साल 2014 के आम चुनाव में भाजपा की अगुआई कर रहे नरेंद्र मोदी ने कहा था – “मेरा मानना है कि सरकार को व्यापार नहीं करना चाहिए। फोकस ‘मिनिमम गवर्मेंट एंड मैक्सिमम गवर्नेंस’ पर होना चाहिए।“ सरकार बनने के साथ ही कोयला खान (विशेष प्रावधान) विधेयक, 2015 संसद में पेश किया गया, जिसमें साफ-साफ कहा गया है कि इस विधेयक का उद्देश्य कोयला खान (राष्‍ट्रीयकरण) अधिनियम, 1973 और खान एवं खनिज (विकास व नियमन) अधिनियम, 1957 में संशोधन करना है। ताकि कोयला खनन हेतु अंतिम उपयोग पर लगी पाबंदी को शर्तों से हटाया जा सके।

दूसरी तरफ नीति आयोग ने राष्ट्रीय ऊर्जा नीति पर मसौदा तैयार किया, जिसमें कोल इंडिया लिमिटेड के एकाधिकार को समाप्त करने का सुझाव है। आर्थिक सर्वेक्षण में भी साफ-साफ कहा गया है, “भारत को दो चीजों, निजी निवेश और निर्यात पर आधारित आर्थिक विकास को गति देने के लिए जरूरी सुधार करने चाहिए।“ इसी बीच नीति आयोग ने सार्वजनिक क्षेत्र की 40 कंपनियों में विनिवेश के लिए सुझाव प्रधानमंत्री कार्यालय को भेज दिया। इन सब बातों से सरकार की मंशा साफ थी। पर समय रहते जैसा विरोध होना चाहिए था, जो नहीं हुआ। मज़दूर संगठनों के एक तबके में इन बातों को लेकर हलचल मची भी। पर ज्यादातर संगठनों की उदासीनता की वजह से मज़दूरों के भीतर की चिंगारी का प्रस्फुटन नहीं हो पाया। उधर, मज़दूर संगठनों की उदासीनता प्रकारांतर से मोदी सरकार के हौसले बढ़ाती गई। पर जब प्रधानमंत्री की अध्यक्षा में फैसला हो गया कि कोयला उद्योग में निजी भागीदारी होगी तो कोयला कर्मचारी अपने गुस्से को रोक नहीं पाए और अपने संगठनों की नीति से बेपरवाह होकर सड़कों पर उतर गए।

राजनीतिक दलों में कांग्रेस के राज्यसभा सांसद वीके हरिप्रसाद ने ज़रूर इस मुद्दे की गंभीरता को समझा। उन्होंने कोयला मंत्री से सवाल किया कि क्या नीति आयोग ने कोल इंडिया लिमिटेड के एकाधिकार ख़त्म करने की सिफारिश की है? जबाव मिला– “जी नहीं।“ इसी उत्तर में कोयला मंत्री ने अपनी तरफ से कहा कि नीति आयोग ने मसौदे के अध्याय– 5 के कोयला खंड (5.4.7) में कुछ सुझाव दिए हैं, जो सरकार की नीति को प्रतिबिंबित नहीं करती। पर यह उत्तर जिस दिन मिला, वह संसद के सत्र का आखिरी दिन था। अब जबकि इस उत्तर के विपरीत फैसला आ चुका है तो यह सदन को गुमराह करने वाली बात बन गई है।

फ़ोटो स्रोत – Mukesh Gupta/Reuters

निजी कंपनियों की बांछें खिलीं

बहरहाल, कोल इंडिया लिमिटेड की अनुषंगी इकाइयों के समानांतर कोयले के कारोबार में निजी कंपनियों को उतरने की आज़ादी मिलते ही देशी-विदेशी खनन कंपनियों की भी बांछे खिल गई हैं। श्रमिकों के बगावती तेवरों से बेपरवाह भारत के व्यापारिक संगठनों के संगठन भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) से लेकर वेदांता रिसोर्सेज के अनिल अग्रवाल तक केंद्र सरकार के फैसले से बेहद खुश हैं। उन्हें लगता है कि भारत की समृद्धि इस फैसले में अंतर्निहित है। उधर बीएचपी, रियो टिंटो और ग्लेनकोर से लेकर एग्लो अमेरिकन जैसी नामचीन बहुराष्ट्रीय खनन कंपनियां भारतीय कोयला खानों पर अधिकार पाने के लिए उतावली हैं।

साल 1971 से लेकर 1973 के बीच दो चरणों में कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण करते हुए सरकार ने कहा था कि देश में ऊर्जा की जरूरतें बढ़ती जा रही थीं और खान मालिक मांग के अनुरूप कोयले की आपूर्ति के लिए कोयला खानों का विकास नहीं कर पा रहे थे। हद तो यह है कि उनकी ओर से अवैज्ञानिक तरीके से कोयला खनन किए जाने से बेशकीमती कोयले नष्ट हो रहे हैं और कोयला श्रमिकों की जान संकट में पड़ती जा रही थी। सरकार इस स्थिति को और ज़्यादा दिनों तक बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं थी।

अब जबकि निजी कंपनियों को फिर से कोयले के कारोबार करने की अनुमति दी गई है तो इसकी मुख्य वजह बताया गया है कि देश में ऊर्जा की मांग तेजी से बढ़ रही है और सार्वजनिक क्षेत्र की कोयला कंपनियां अपने बलबूते बढ़ती मांग पूरी करने की स्थिति में नहीं हैं। फलत: कोयले की कमी आयातित कोयले से पूरी करनी पड़ रही है, जिससे देश में विदेशी मुद्रा के भंडार पर असर पड़ता है।

निजीकरण के लिए फरेब

सरकार के आंकड़े गवाह हैं कि कोयला उद्योग में निजीकरण की गाड़ी को सरपट दौड़ाने के लिए फरेब रचा गया है। हाल ही कोल इंडिया लिमिटेड ने “कोल विजन– 2030” जारी किया था। उसमें कहा गया है कि मौजूदा व्यवस्था में साल 2020 तक देश में 90-10 करोड़ टन और साल 2030 तक 19 करोड़ टन तक कोयले का उत्पादन होगा। इस अवधि में कोयले की मांग साढ़े 11 करोड़ टन से लेकर साढ़े 17 करोड़ टन तक रहेगी। आंकड़ों से स्पष्ट है कि कोयला उद्योग में निजी भागीदारी के बिना ही देश की जरूरतें पूरी होती रहेंगी। बावजूद सरकार कोयले की मांग को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत कर रही है तो इसके निहितार्थ को समझा जा सकता है। दरअसल, जलवायु परिवर्तन को लेकर सख़्त देशों की खनन कंपनियां दिवालिया होने के कगार पर हैं। ऐसी कंपनियों को भारत कोयला खनन के मामले में सोने के अंडे देने वाला दिख रहा है। उनकी ललचाई नजरों पर सरकार फिदा हो गई जान पड़ती है।

केंद्रीय कोयला मंत्री पीयूष गोयल कह रहे हैं कि सरकार के ताजा फैसले में देश की ऊर्जा जरूरतें पूरी होंगी और सार्वजनिक क्षेत्र के कोयला उद्योग की बादशाहत भी बनी रहेगी। पर यह विरोधाभासी बात है। सच तो यह है कि सरकार के एजेंडे में निजी कंपनियों को खुश करने का मामला सर्वोच्च है। तभी तो उसे इस बात की परवाह भी नहीं रही कि बिना किसी नियमन के राष्ट्रीयकरण अधिनियम में किए गए संशोधनों को जमीन स्तर पर लागू किस तरह किया जाएगा।

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