जितनी बड़ी जाति, उतनी लंबी उम्र?

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ऊंच-नीच के सोपानक्रम (hierarchy) पर टिकी जाति-व्यवस्था और मनुष्य के स्वास्थ्य एवं आयु सीमा के बीच क्या संबंध है? क्या इस सोपानक्रम के आधार पर ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आपकी उम्र क्या होगी? इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के उत्तरार्द्ध में जब देश के गणतंत्र बनने की 68वीं सालगिरह मनाई जा चुकी है, ऐसे सवाल उठाना अटपटा लग सकता है! आखिर इस गणतंत्र के तहत जाति, नस्ल, लिंग आदि पर आधारित तमाम किस्म के भेदभावों को खत्म करने का ऐलान किया गया था।

बहरहाल हालिया अध्ययन इस जटिल और असहज कर सकने वाली पहेली का जवाब देते दिखते हैं। महत्त्वपूर्ण है कि इन अध्ययनों को केंद्र सरकार से संबंधित राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (नेशनल सैम्पल सर्वे ऑफिस) की तरफ से अंजाम दिया गया। ये एजेंसी अखिल भारतीय स्तर पर बड़े सैम्पल सर्वेक्षण करती है, जिसमें घर-घर जाकर प्राथमिक आंकड़े एकत्रित किए जाते हैं। इन सर्वेक्षणों की अहमियत इससे समझी जा सकती है कि सरकारी नीतियों का निर्माण करने में ये मददगार बनते हैं।

इसी एजेंसी की रुग्णता और स्वास्थ्य सेवा सर्वेक्षण (मॉर्बिडिटी एंड हेल्थ केयर सर्वे) की रिपोर्ट जाति एवं आयु सीमा के आपसी संबंधों पर कुछ रोशनी डालती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक आपकी जातिगत स्थिति की ये तय करने में भूमिका होती है कि आप कितनी लंबी उम्र जीते हैं। देश के अग्रणी अख़बार ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक अनुसूचित जन-जातियों में मौत की औसत दर 43 साल तक पहुंची है, अनुसूचित जातियों में यह 48 वर्ष है और गैर-मुस्लिम कथित ऊंची जातियों के घरों में ये आंकड़ा 60 वर्ष है। रेखांकित करने वाली बात है कि 2004 के इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट से भी इसी किस्म का पैटर्न सामने आया था। सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि जैसे-जैसे जातिगत सोपानक्रम में हम ऊपर चढ़ते हैं, वैसे-वैसे हमारी उम्र सीमा भी बढ़ती जाती है। सर्वेक्षण में ऐसे घरों को शामिल किया गया था जिसमें पिछले एक साल में एक मौत हुई हो।

अध्ययन को लेकर यह सवाल पूछा जा सकता है कि आखिर इसे जाति के संदर्भ में क्यों देखा जा रहा है? क्या इसे अमीरी-गरीबी के तौर पर नहीं देखा जा सकता? सांख्यिकीय तकनीकी जो विकास हुआ है, उससे इस प्रश्न का उत्तर मिल सकता है। इसी मसले पर वेबसाइट ‘‘डेलीयो’’ में छपे एक लेख में ‘इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ में प्रकाशित एक अध्ययन का विवरण पेश किया गया है। ये अध्ययन ब्रिटेन के अल्स्टर विश्वविद्यालय के वाणी कांत बारुआ ने तैयार किया है। उसका फोकस इसी मुददे पर है।

प्रोफेसर बारुआ का निष्कर्ष है कि अन्य कारकों की भूमिका को मददेनज़र रखने के बावजूद हम यही पाते हैं कि लंबी उम्र निर्धारित करने में जाति की निश्चित भूमिका रहती है। मौत की औसत उम्र का आकलन करने के लिए प्रो. बरुआ सामाजिक समूह के अलावा चार अन्य कारकों पर गौर करते हैं। ये हैं- काम का स्वरूप (यानी काम श्रम केंद्रित है या नहीं), ग्रामीण या शहरी रिहाईश, विकसित या अविकसित राज्य में निवास और घर के टॉयलेट और खाना बनाने के ईंधन की गुणवत्ता। अध्ययन बताता है कि मनुष्य की आयु सीमा तय करने में ये चारों कारक भूमिका अदा करते हैं।

जाति विशेषाधिकारों और अलग-अलग किस्म की वंचनाओं (deprivations) का आधार बनती है, यह आम अनुभव है। मिसाल के तौर पर कथित निम्न जातियों की आय भी निम्न श्रेणी में होती है, उनके शिक्षा का स्तर भी निम्न रह जाता है, और बीमारियों और उसके लक्षणों को लेकर भी उनमें जागरूकता का अभाव होता है (जो उनकी खराब सेहत और उच्च मृत्यु दर का कारण बनता है)। प्रो. बारुआ बताते हैं कि किस तरह उन्हें ही छुआछूत, संसाधनों पर दबंग जातियों का पहला दावा, संसाधनों में अधिक हिस्सा पाने के लिए निरंतर संघर्ष करने की स्थिति का शिकार बनना पड़ता है। इसका असर स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच पर भी होता है। इतना ही नहीं कथित निम्न जातियों के लोगों को ही रोजगार की तलाश में अधिक प्रवास/पलायन करना पड़ता है, जिससे सार्वजनिक सेवाओं के दायरे से वे बाहर हो जाते हैं।

फ़ोटो साभार : विकिमीडिया/द लॉजिकल इंडियन

ज़ाहिर है कि संविधान में भले ही जाति, नस्ल, लिंग, धर्म आदि के आधार पर भेदभाव की समाप्ति का ऐलान किया गया हो, मगर यह सर्वेक्षण यही बताता है कि असल में भेदभाव खत्म करने की दिशा में अभी हमें कितनी लंबी यात्रा करनी है। इस बात पर जोर देना ज़रूरी है कि जातिगत सोपानक्रम तथा आयुसीमा के बीच रिश्ते पर निगाह डालने वाला यह पहला अध्ययन नहीं है। कुछ ही समय पहले यूनाईटेड नेशन्स वूमेन की तरफ से जारी रिपोर्ट ‘टर्निंग प्रॉमिसेस इनटू एक्शन: जेंडर इक्वालिटी इन द 2030 एजेंडा’ से भी यह तथ्य उजागर हुआ था कि देश में दलित स्त्रियां गैर-दलित महिलाओं की तुलना में कम ज़िंदा रहती हैं। भारत की औसत दलित स्त्री कथित उच्च जातियों की महिलाओं की तुलना में 14.6 साल पहले मौत के मुंह में समा जाती है।

बताया गया कि ‘स्वच्छता (सैनिटेशन) की खराब स्थिति और नाकाफ़ी स्वास्थ्य सुविधाओं के चलते उनकी जीवन-रेखा घट जाती है’। रिपोर्ट के मुताबिक ‘‘समाज में अक्सर सबसे पीछे महिलाएं और लड़कियां छूटती है, जिन्हें लैंगिक तथा अन्य गैर-बराबरियों के आधार पर कई किस्म की प्रतिकूल परिस्थितियां झेलनी पड़ती हैं। इसकी परिणति उनकी सामूहिक वंचना (collective deprivation) में होती है, जहां हम देख सकते हैं कि उन्हें एक साथ बेहतर शिक्षा, सम्मानजनक काम, स्वास्थ्य और अन्य सुविधाओं आदि के मामले में नुकसान उठाना पड़ता है।’’

निश्चय ही दलित स्त्रियों की दोयम स्थिति को लेकर इसके पहले भी कई बार बात हुई है। अनुसूचित जाति और जन-जातियों के कल्याण के लिए बनी संसदीय समिति ने भी अपनी चौथी रिपोर्ट में साफ़ लिखा था कि अनुसूचित तबकों की महिलाओं को दोहरे बोझ को झेलना पड़ता है- वे जाति और जेंडर के आधार पर शोषित होती हैं और वे यौन शोषण के सामने बेबस हैं। इंटरनेशनल दलित सॉलिडारिटी नेटवर्क ने दलित स्त्रियों पर होने वाली हिंसा को नौ हिस्सों में बांटा था: उनमें से छह प्रकार की हिंसा जातीय पहचान के चलते होती हैं, तो तीन जेंडर पहचान के कारण। जाति के नाम पर उन्हें यौन हिंसा, गाली-गलौच, मारपीट और हमलों का शिकार होना पड़ता है। जेंडर के चलते उन्हें कन्या भ्रूण हत्या, जल्दी शादी के चलते बाल यौन अत्याचार और घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है।

अगर गहराई में जाएं तो हम देख सकते हैं कि समाज में लगभग अदृश्य नागरिक की स्थिति में डाल दी गईं दलित महिलाओं के साथ भेदभाव विभिन्न स्तरों पर चलता है। इनमें शामिल हैं:

  • परिवार की सहायता के लिए श्रम बाज़ार (लेबर मार्केट) में जल्द पहुंचने की मजबूरी।
  • आम तौर पर लांछित (stigmatized) एवं दासोचित/हलके रोज़गार का मिलना। मिसाल के तौर पर हाथ से मल उठाने का काम मिलना, जिसकी समाप्ति के लिए केंद्र सरकार दो बार कानून बना चुकी है मगर लगभग 7-8 लाख लोग आज भी ये काम करते हैं। उनमें से 95 फीसदी महिलाएं हैं। अर्थात दलित महिलाएं बेहतर नौकरियों तथा शिक्षा के अच्छे अवसरों से आम तौर पर वंचित रहती हैं।
  • घरेलू हिंसा की सबसे ज़्यादा घटनाएं उनके साथ ही होती हैं।
  • 24.6 फ़ीसदी दलित महिलाएं हिंसा की शिकार होती हैं जबकि अनुसूचित जन-जातियों के संदर्भ में ये आंकड़ा 18.9 फ़ीसदी, पिछड़ी जातियों में 21.1 फ़ीसदी जबकि अन्य की श्रेणी में (जिनमें सवर्ण हिंदू शामिल हैं) 12.8 फीसदी है।
  • नेशनल क्राइम रिकार्डस ब्यूरो (रिपोर्ट 2016) के मुताबिक दलितों के ख़िलाफ़ जितने अपराध दर्ज होते हैं, उसका अधिकांश दलित स्त्रियों के खिलाफ होता है।

ज़ाहिर है कि इन तमाम सुनियोजित प्रक्रियाओं का समग्र असर यही होता है कि सामाजिक- राजनीतिक परिदृश्य से दलित स्त्रियां लगभग बाहर कर दी जाती हैं, जो उन्हें अदृश्य नागरिक के तौर पर समाज की निचली सतह तक सीमित कर देता है। ध्यान रहे इस विस्फोटक ख़बर पर कि दलित स्त्रियां जल्दी मरती हैं, देश में कोई हलचल नहीं मची। जबकि इसका ताल्लुक देश की लगभग 17 फीसदी आबादी से है। अब ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय सैम्पल सर्वेक्षण ऑफिस के सर्वेक्षण से भी कोई हलचल पैदा नहीं होगी।

देश को संविधान को सौंपते हुए डा. अम्बेडकर ने मार्के की बात कही थी कि हम भले एक व्यक्ति एक वोट वाले राजनीतिक जनतंत्र में प्रवेश कर रहे हैं, मगर एक व्यक्ति एक मूल्य कायम करने की लड़ाई यानी सामाजिक जनतंत्र स्थापित करने की लड़ाई अभी देर तक चलेगी। वजह अपने समाज की ठोस स्थितियां हैं। यहां जातिगत स्थिति ना केवल आप की उम्र तय करती है, बल्कि आपकी सामाजिक स्थिति के अन्य पहलुओं को भी निर्धारित करती है। कुछ समय पहले राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो के आंकड़ों ने भी इस बात की ताईद की थी। उसमें भारत की जेलों पर निगाह डाली गई थी। आंकड़ों के मुताबिक जेलों में बंद हर तीन में से दो कैदी या तो अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति या पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते हैं। इनमें ज़्यादातर ऐसे लोग होते हैं, जिन्हें अपनी पढ़ाई दसवीं कक्षा के पहले ही छोड़नी पड़ी हो। यह अकारण नहीं कि देश के दलित बार-बार यह शिकायत करते हैं कि किस तरह पुलिस और कानूनी प्रणाली सदियों से चले आ रहे जातिगत भेदभाव के चलते उनके ख़िलाफ़ खड़ी दिखते हैं। जेलों में बंद कैदियों में 95 फीसदी पुरुष हैं। कुल कैदियों का पांचवां हिस्सा मुसलमानों का है।

कुछ समय पहले ग्लोबल हंगर इंडेक्स अर्थात वैश्विक भूख सूचकांक के आंकड़े जारी हुए थे। उन्होंने इस सच्चाई की तरफ नए सिरे से इशारा किया कि दुनिया में भूख की समस्या कितनी विकराल है, किस तरह हर साल पचास लाख़ बच्चे कुपोषण के कारण मर जाते हैं, किस तरह गरीब मुल्कों के दस में से चार बच्चे उसी के चलते कमज़ोर शरीर और दिमाग के साथ बड़े होते हैं। ऐसी बातों को लेकर अपने देश में कोई चिंता पैदा नहीं होती।

आख़िर जातिगत स्थिति और आयु सीमा, भुखमरी, दलित स्त्रियों की जल्दी मौतें जैसे मसलों को लेकर मीडिया या प्रबुद्ध जनों के विराट मौन को कैसे समझा जा सकता है? निश्चित ही इसके कई कारण तलाशे जा सकते हैं, मगर इसका सबसे प्रमुख कारण कथित ऊंची जातियों का राष्ट्रीय विमर्श पर कब्जा दिखता है। एक वेबसाइट पर लिखे अपने आलेख में शोएब दानियाल ने बताया थाः ‘भारत के कमजोर और मरणासन्न बच्चों का विशाल बहुमत आदिवासी, दलितों और शूद्र जातियों से ताल्लुक रखता है। इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित 2011 के एक अध्ययन के मुताबिक हिंदू “ऊंची” जातियों की तुलना में दलितों में कम वजन के बच्चे 53 फीसदी अधिक मिलते हैं, तो आदिवासियों में ये संख्या 69 फीसदी अधिक हैं।’

फिर इसमें क्या आश्चर्य कि भारत में ऐसे मसलों पर इतनी कम चर्चा होती है। इक्कीसवीं सदी में भारत के आर्थिक महाशक्ति बनने की बात अक्सर चलती रहती है। पढ़े-लिखे भारतीयों का सीना फूल जाता है, जब उन्हें बताया जाता है कि कैसे भारत विश्व बाजार में होड़ कर रहा है। सवाल उठता है कि ऐसा देश जो संप्रदाय, जाति आदि के विवादों में उलझा हुआ हो, जहां ऊंच-नीच पर आधारित चार हजार से अधिक जाति-उपजातियां मौजूद हों, जहां प्रेम जैसे बेहद निजी एवं आत्मीय रिश्ते पर समाज एवं परिवार की पहरेदारी मौजूद हो, जहां जातिगत भेदभावों का प्रत्यक्ष असर लोगों की आयु सीमा पर पड़ता हो, वह कैसे आर्थिक महाशक्ति बनेगा? तो क्या अब वक्त़ नहीं आ गया है जब सामाजिक आंदोलनों की नयी लहर खड़ी हो- जो जातिगत एवं लैंगिक भेदभाव को खत्म करने के संघर्ष को आगे बढ़ाए!

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