मुद्दे उठे, लेकिन असर?

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भूमि अधिकार आंदोलन ने बेहद ज़रूरी पहल की। उसने दिल्ली में ‘कृषि संकट, गौवंश से जुड़ी अर्थव्यवस्था पर चोट और दलित-अल्पसंख्यकों पर हमले’ विषय पर दो दिन के राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया। इसका एक अहम सत्र वो था, जिसमें मॉब लिंचिंग (भीड़ के हाथों हत्या) के शिकार हुए लोगों के परिजनों ने भागीदारी की। उन्होंने अपनी दर्दनाक कहानियां बताईं। उनकी बातों को सुनते हुए अहसास हुआ कि गौ-रक्षा के नाम पर देश की एक बड़ी आबादी को कैसी मुसीबत में पहुंचा दिया गया है। साथ ही एक आधुनिक संविधान वाले देश में कानून के राज के सिद्धांत के सामने कितनी बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

बहरहाल, आयोजकों ने बार-बार इस बात पर ज़ोर डाला कि ये मामला सिर्फ़ आस्था या सांप्रदायिक गोलबंदी का नहीं है बल्कि इसकी वजह से लाखों ग्रामीणों के सामने रोज़ी-रोटी का सवाल खड़ा हो गया है। सरकार के रुख़ और “गौ-रक्षकों” के आतंक के कारण हर व्यावाहरिक रूप में गौवंश के पशुओं की बिक्री पर रोक लगी हुई है। इससे किसानों/पशुपालकों की आमदनी का एक बड़ा ज़रिया सूख गया है। नतीजतन, पशुपालन की पूरी अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। कभी धन समझे जाने वाले जानवर अब बोझ बन गए हैं। आवारा घूमते पशुओं से फ़सलों को बचाना अब किसानों की एक नई चुनौती है।

ज़ाहिर है, मसला बड़ा है। इससे पीड़ित लोगों की संख्या लाखों में है। इसलिए ये अपेक्षा वाजिब है कि जब इस मुद्दे पर कोई कार्यक्रम हो, तो उसमें बड़ी भागीदारी हो। मगर दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के हॉल में काफी संख्या में खाली कुर्सियां आयोजन की तैयारी में कमज़ोरी की कहानी बयान कर रही थीं। किसान आंदोलन के एक चर्चित और वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता ने इस स्तंभकार से बातचीत में इस हाल पर मायूसी जताई। कहा कि आयोजक इस मौके का इस्तेमाल इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर दिल्ली की मध्यवर्गीय जनता से संवाद कायम करने के लिए कर सकते थे। जबकि हॉल में संभवतः सिर्फ आयोजक संगठनों से जुड़े कार्यकर्ता ही थे। भूमि अधिकार आंदोलन का दावा है कि वह 200 से ज़्यादा जन संगठनों और किसान संगठनों/यूनियनों का साझा मंच है। इससे सहज धारणा बनती है कि इसका आधार या जनाधार बहुत बड़ा होना चाहिए। मगर दिल्ली में हुए राष्ट्रीय सम्मेलन में ऐसी कोई झलक नहीं मिली।

सम्मेलन के आखिरी सत्र में अलग-अलग दलों के नेता बुलाए गए। अपेक्षा यही थी कि जिस मकसद के लिए ये आयोजन हुआ, उसे वो अपना समर्थन दें। इस सवाल को संसद में उठाएं। इस मसले को बड़ा मुद्दा बनाने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करें। वहां आए सीपीएम, सीपीआई, फॉरवर्ड ब्लॉक, आरएसपी, तृणमूल कांग्रेस, जनता दल-यू (शरद गुट), डीएमके और कई दूसरे दलों के आए नुमाइंदों ने ऐसा करने का इरादा भी जताया। मगर यहां एक ऐसा पेच नज़र आया, जिसकी ज़रूर चर्चा होनी चाहिए।

आयोजकों का इस पर ज़ोर रहा कि उन्होंने ‘बीजेपी और कांग्रेस को छोड़कर’ बाकी सभी दलों को आमंत्रित किया है। ज़ाहिर है, ये रुख़ सीपीएम की ‘करात लाइन’ की एक मिसाल है। आयोजन में सीपीएम से जुड़े संगठनों की भूमिका खुद ज़ाहिर थी। यह पूछने पर कि नीति या राजनीतिक चरित्र के लिहाज से तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके या ऐसे तमाम दलों में किस रूप में कांग्रेस से अलग हैं, आयोजकों के पास कहने के लिए कोई तार्किक बात नहीं थी। सीपीएम के एक बड़े नेता ने निजी बातचीत में माना कि उनकी पार्टी से जुड़े संगठनों की “अपनी राजनीति” के कारण ऐसा हुआ। यानी इतने बड़े सवाल पर सियासी कार्यक्रम की योजना बनाते वक्त भी “अपनी राजनीति” के तकाजे हावी रहे।

यह एक बड़ी समस्या है। इस कारण महत्वपूर्ण मसलों पर भी हुए कार्यक्रम अपना असर छोड़ने में नाकाम रहते हैँ। ऐसा ही दिल्ली में हुए ‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ के साथ हुआ। भूमि अधिकार आंदोलन ने 3 अप्रैल को दिल्ली में विरोध सभा और 23 अप्रैल को जन अधिकार आंदोलन के साथ मिलकर रैली करने का एलान किया है। अब यह सवाल आयोजकों के सामने है कि वे उन आयोजनों को भी 20-21 मार्च की तरह रस्म-अदायगी में तब्दील कर देना चाहते हैं या उससे सचमुच प्रभाव छोड़ना चाहते हैं? अगर मकसद प्रभाव छोड़ना है, तो अपने कार्यकर्ताओं भर की उपस्थिति से संतुष्ट हो जाने का नजरिया छोड़ना होगा। साथ ही उद्देश्य को प्रमुखता देते हुए उसके अनुरूप तमाम शक्तियों को जुटाने की कोशिश करनी होगी।

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