बैगाओं की ख़ास खेती- बेंवर

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बैगा आदिवासियों की विशेष जीवन शैली और कम संख्या को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें ‘राष्ट्रीय मानव’ घोषित किया गया है। इसलिए मध्य प्रदेश में बैगा विकास प्राधिकरण बनाकर विकास की खास योजनाएं भी बनाई जा रही हैं। पर अक्सर यह सवाल उठा करता है कि सरकारें जिसे विकास समझती हैं, क्या जनजातियां भी उसे ही विकास मानती हैं। उत्तर है- न। जनजातियों का अपना पारंपरिक रहन-सहन है और वे उसी तरह के जीवन के अभ्यस्त होने के कारण शहरी विकास मॉडल को ग्रहण करने में असमर्थ रहती हैं। बैगाओं के मामले में भी यही हुआ है। वे अपनी ख़ास खेती के जानकार हैं। आधुनिक विज्ञान का अपना महत्व है। पर पारंपरिक ओर अनुभवजन्य ज्ञान और विज्ञान भी कम अहम नहीं है। लेकिन बैगाओं को सरकारों ने उन्हें ‘बेंवर’खेती से अलग कर देने में कोई कोताही नहीं की। आइये, जानते हैं कि यह बेंवर खेती आखिर क्या है और कैसे की जाती है? पर उससे पहले थोड़ा बैगाओं की जीवन-शैली के बारे में भी जान लेना ज़रूरी है।

बैगाचक की स्थापना

बैगाओं की खास जीवन-शैली, खेती-पाती की विशेष विधियों और एक मौलिक तथा भिन्न किस्म की समाज-व्यवस्था को देखते हुए अंग्रेजों ने 19वीं सदी में एक खास इलाका ही उनके लिए आरक्षित कर दिया था। यह आरक्षित क्षेत्र ‘बैगाचक’ कहलाता है। इसकी स्थापना 1890 में की गई थी। तब जबलपुर के कमिश्नर आई.के. लौरी हुआ करते थे। इसके तहत मेकल पहाड़ी की तलहटी में आबाद सात वनग्राम- अजगर, ढाबा, रजनी, सरई, धुरकुटा, सिलपिड़ी, कजलंग, और लमोठा का लगभग 36 वर्गमील का जंगली इलाका आता है। उस समय मात्र 74 परिवारों को ही यहां बसाया गया था। यों तो उन दिनों बेंवर खेती करने पर अंग्रेज सरकार ने पूरी तरह से पाबंदी लगा दी थी, पर इन 74 परिवारों को 292 एकड़ के जंगली इलाके में बेंवर खेती करने की विशेष इजाजत दे दी गई थी। इसके अलावा भी उन्हें 2,336 एकड़ ज़मीन पर भी बेंवर खेती करने की अनुमति मिली हुई थी। आगे चलकर 1927 में बने नए वन अधिनियम के चलते यह छूट वापस ले ली गई। अब बैगाचक का और विस्तार हो चुका है। डिंडौरी जिले के समनापुर, बजाग और करंजिया विकासखंडों के 52 वन ग्रामों को भी इसमें मिला दिया गया है।

Photo : Rajendra Chandrakant Rai

सामूहिक श्रम की परंपरा

दूसरे आदिवासी समाजों की तरह बैगाओं में भी सामूहिक श्रम करने की अद्भुत् परंपरा है। वे इसे ‘सहाव’ कहते हैं। घर बनाना, खपरे बनाना और खेती जैसे बड़े और श्रम-साध्य कामों के लिये ‘सहाव’ परंपरा का उपयोग किया जाता है। सहाव के लिए पूरे गांव को ही बुलाया जाता है। निमंत्रण पाकर पूरा गांव जुट जाता है, और मिलजुल कर लोग काम करते हैं। इसके लिए उन्हें मजदूरी नहीं दी जाती। इसी तरह बैगाओं की खेती भी सामूहिक आधार पर ही होती है। उत्पादित फसलों का आपस में बंटवारा होता है। इन कामों में लगे श्रम का मूल्य चुकाने के लिये वे बदले में रुपये नहीं देते, बल्कि ‘सहावभात’ खिलाते हैं। किसी के पास इस भोज को करने का साधन न हो, तो उसका इंतजाम भी सामूहिक रूप से कर लिया जाता है।

इस तरह बैगाओं की जीवन-परंपरा में सामूहिकता के भाव को ही प्रधानता मिली हुई है। लेकिन अब इन बैगाओं की जीवन-शैली पर भी संकट आ रहा है। असल में गैर आदिवासी क्षेत्रों से आए हुए लोगों की जीवन और कृषि शैली से संपर्क का इन पर दबाव पड़ा है। इन्हीं कारणों से बैगा अपना पारंपरिक निवास त्यागकर, सुदूर जंगलों के बजाय, समतली जगहों पर बसने लगे हैं। सरकारों ने अपने चिर-परिचित तरीके से उनका विकास करने की योजनाएं बना डाली हैं। बैगाओं के लिए बनाई गई विकास योजनाओं के तहत उन्हें कुछ सुविधाएं भी दी गईं, परंतु बदले में उनसे उनका आवास क्षेत्र ‘जंगल’ छीन लिया गया। इस तरह वे अपने नैसर्गिक निवास और पारंपरिक भोजन-स्रोत से ही वंचित कर दिए गए। वे जंगल से अपने भोजन के लिये कनिहाकांदा, डोनचीकांदा, कडुगीठकांदा, बैचांदीकांदा, लोरिंगकांदा, सैदूकांदा, बड़ाइनकांदा, बिराड़कांदा, तीखुरकांदा, रबीकांदा, ढुरसीकांदा प्राप्त करते हैं। इस तरह जंगल ही उनके प्राण हैं। उनका जीवन है। वहां से वे जड़ी-बूटियां और वनोपज जमा करते हैं। शिकार करके भोजन पाते हैं। बांस लाकर टोकरी और बरतन बनाते हैं।

जबकि सरकार ने कानून बनाकर वनों को आरक्षित कर दिया। इससे भी बैगाओं को अपने जंगलों से महरूम होना पड़ा है। 30-40 साल पहले बैगा स्त्रियां जंगल की सूखी लकड़ियां बीनकर लाया करती थीं। उन्हें अपने गांवों से लगे शहरी क्षेत्रों में बेचकर आजीविका चलाती थीं। लेकिन जंगलों का राष्ट्रीयकरण होते ही, वे लकड़ी-चोर मान ली गईं।

बेंवर खेती क्या है

हमारे देश में खेती की कई आदिम प्रणालियां रही हैं। भारत के विभिन्न प्रदेशों में इस आदिम कृषि प्रणाली को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। ओडीशा, बिहार और आंध्र प्रदेश में उसे ‘पोंडू’ कहा जाता है, तो असम सहित पूर्वांचलीय इलाकों में ‘झूम खेती’। छत्तीसगढ़ और बस्तर के क्षेत्र में वह ‘पेंदा’ नाम से जानी जाती है। इसी तरह मध्य प्रदेश में बैगा अपनी आदिम खेती प्रणाली को ‘बेंवर’कहते हैं।

बेंवर खेती असल में पारंपरिक विज्ञान और स्थानीय ज्ञान का नायाब उदाहरण है। इस खेती प्रणाली में अनेक प्रकार के अनाजों के बीजों का एक साथ उत्पादन किया जाता है। पर वे बीज अपने आप में बहुत सी भिन्नताएं और गुण लिए हुए होते हैं। जैसे एक बीज में अकाल सहने का गुण होगा, तो दूसरे में बाढ़ से मुकाबला करने का। तीसरा पाले से लड़ सकने में सक्षम होगा, तो चौथा किसी अन्य प्राकृतिक संकट से जूझने के काबिल होगा। बैगा एक साथ कई प्रकार के बीजों का रोपण करते हैं। इसलिए चाहे जैसा प्राकृतिक प्रकोप आए, बैगाओं को अपने साल भर के भोजन के लिए ज़रूरी खाद्यान्न मिल जाता है।

Photo : Rajendra Chandrakant Rai

बेंवर खेती करने का तरीका

बैगा पहाड़ की ढलान को काटकर खेती करते हैं। बेंवर खेती करने के लिए बैगा सबसे पहले उस ज़मीन पर, जहां उन्हें खेती करना होती है, छोटी-छोटी झाड़ियों को काटकर बिछा देते हैं। इन झाड़ियों को, अच्छी तरह से सूख जाने के लिए खुली धूप में छोड़ दिया जाता है। जब वे सूख जाती हैं, तब उनमें आग लगा दी जाती है। एक-दो दिनों तक लकड़ियां जलती रहती हैं। अंगारे धीरे-धीरे राख बनते रहते हैं। राख ठंडी होती जाती है। बरसात आने से एक सप्ताह पहले उसकी परत के नीचे कई प्रकार के बीजों को बो दिया जाता है। बीज बरसात आते ही उगने लगते हैं और अपने समय पर फसल के तौर पर तैयार हो जाते हैं। बैगाओं की यह पद्धति ‘डाही घूंकना’कहलाती है। इस प्रणाली में न तो रासायनिक खादों का प्रयोग किया जाता और न ही कीटनाशकों का।

बैगाओं द्वारा एक जगह पर एक ही साल खेती करने की वैज्ञानिक परंपरा का पालन भी किया जाता है। वे उसे दूसरे साल खाली छोड़ देते हैं। माना जाता है कि इससे धरती की अपनी उर्वरा शक्ति क्षीण नहीं होती। इसीलिए बैगाओं की फसलें आज भी जैविक बनी हुई हैं। जगह बदलकर खेती करने को ‘स्थानांतरित खेती’कहते हैं। बैगा जिस जगह पर बेंवर खेती करते हैं, उसे वे कांदाबाड़ी कहते हैं। यहां वे जगह बदल-बदलकर खेती करते हैं। वे जहां पर पहले साल खेती करते हैं, उसे डोंगर, दूसरे साल जहां खेती करते हैं उसे- मुढ़ार और तीसरे को सुढ़ार कहा करते हैं। चौथे साल वे फिर डोंगर में खेती करने पहुंच जाते हैं। ऐसी ज्यादातर बेंवर खेती तो अब खत्म हो चली है, पर वह पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बैगा अब भी बेंवर खेती कर रहे हैं। वे डाही घूंकना और किड़वा पद्धति भी अपनाते हैं, पर अभी इनके बारे में देश समाज को ज्यादा जानकारी नहीं है।

किडवा पद्धति में बैगा समतल भूमि पर खेती करते थे। इस तरह से भी बेंवर खेती होती है। अंतर बस इतना है कि बेंवर खेती पहाड़ी ढलान पर और किडवा समतली ज़मीन पर की जाती है। किडवा प्रणाली में लकड़ी की खपत को घटाया गया है। इसमें थोड़ी सी लकड़ियों को लेकर उनमें आग लगा दी जाती है और आग लग जाने पर उन्हें बांस के जरिये घकेल कर दूर-दूर तक फैला दिया जाता है। हां, यह ज़रूर है कि किडवा खेती में बेंवर की तुलना में कम प्रकार के बीजों को बोया जाता है।

बेंवर बीजों की क्षमताएं

भारी बरसात को सहन करने वाले बीज इस प्रकार हैं- मिर्ची,सिकिया, डोडका, ज्वार, सलहार, अमटा, डेंगरा, रवांसकुम्हरा, डोंगर कुटकी, भालूकांग, कोचई, खरनाकांदा। इसी तरह सूखा झेलने वाले बीज हैं- भेजरा, डोंगर उड़द, पुरपुरी, राहर, भुरठा (मक्का), खीरा, बेदरा, झुंझरु,मंडिया, सांवा, बड़ेकांग आदि। प्राकृतिक क्षमताओं से युक्त बीज अब लोप हो रहे हैं।

बीज बैंक बनाने की पहल

बैगाओं की रीति-रिवाजों और उनकी परंपराओं का संरक्षण करने के लिए ‘बैगा महापंचायत’ बनाई गई है। इसकी कोशिशों से अब सिलपुड़ी में एक बीज बैंक बन चुका है। बीज बैंक से बैगाओं को बीज उधार दिया जाता है। उसे उगाकर वे डेढ़ गुना बीज लौटा दिया करते हैं। इस तरह बीज की मात्रा बढ़ती जा रही है और पारंपरिक बीजों का संरक्षण हो रहा है। बैगाओं के परंपरागत बीजों में शामिल हैं – बाजरा की किस्म सलहार, ज्वार की दो किस्में कांग और जोवार, रागी की किस्म मड़िया, मक्का, कुब्की, सावां, कोदो, बिना जुताई वाली धान और गेहूं।

आज भी बैगाचक के मेकल रेंज में जंगल बचे हुए हैं। खेती में हल का उपयोग न करने के कारण पहाड़ी ढलानों पर मिट्टी का कटाव रुका हुआ है। जहां हलों से खेती होती है, वहां पर जंगलों को काटा जा रहा है और खेत बनाए जा रहे हैं। इससे जंगलों का विनाश हो रहा है। इसका उदाहरण मध्य प्रदेश के बैतूल ज़िले के भैंसदेही में मौजूद है। यहां पर कोरकू जनजाति के स्थायी खेती करने के कारण जंगलों का सफाया हो चुका है।

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