एक अनोखा आयोजनः राष्ट्रीय बैगा ओलिंपिक

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मध्य प्रदेश में तीन आदिम जन-जातियां निवास करती हैं। महाकोशल इलाके के मंडला, डिंडौरी, शहडोल, उमरिया अनूपपुर और बालाघाट ज़िलों में बैबा जनजाति, चंबल क्षेत्र में सहरिया और छिंदवाड़ा के पातालकोट में भारिया। इन तीनों ही जन-जातियों को मध्य प्रदेश में ‘विशेष पिछड़ी जनजाति’ घोषित किया गया है। इन तीनों जनजातियों में बैगा सबसे प्राचीन मानी जाती है। वे घने जंगलों में रहते हैं। उनका जीवन जंगलों पर ही निर्भर है। वे तीर-कमानधारी हैं और इसी के ज़रिए शिकार कर अपना भोजन जुटाते हैं। बैगा अपने आप में सिमटी रहने वाली बेहद संकोची स्वभाव वाली जनजाति है। अपने इसी स्वभाव और जीवन शैली की भिन्नता के चलते वे मैदानी समाज से दूरी बरतते हैं।

मध्य प्रदेश के महाकोशल इलाके के जिले मंडला और डिंडौरी का क्षेत्र अब भी नैसर्गिक वनों से भरा हुआ है। यहां पर वनस्पतियों तथा वन्य प्राणियों की विविधता तो है ही, इसके अलावा यह बैगा और गोंड आदिवासी जनजातियों का भी आदिम निवास क्षेत्र भी है। इस जनजाति के लोग घने वनों में रहना पसंद करते हैं। इसीलिये उन्हें ‘अरण्य-पुत्र’ भी कहा जाता है। जंगलों के साथ उनका पारस्परिक संरक्षण का संबंध है। दोनों एक-दूसरे के पूरक ही नहीं हैं, बल्कि व्यावहारिक रूप में एक-दूसरे के अस्तित्व की रक्षा भी करते हैं।

सन् 1976 में देश की 76 ‘विषेश जनजातियों’ की सूची में बैगाओं को भी शामिल किया गया। नृतत्वशास्त्रियों के द्वारा इनको द्रविड़ों से उत्पन्न और छोटानागपुर की भुंइया आदिम जनजाति की एक शाखा माना जाता है। बैगाओं की सात उपजातियां हैं- बिन्झवार, भरोटिया, नरासेटिया या नाहर, रायमैना, काटमैना, कौंड़वाना या कुडी कौंड़वाना। इन उपजातियों में परस्पर विवाह संबंध हो सकते हैं। बैगाओं की जीवन शैली जनजाति संबंधी विभिन्न प्रथाओं और परंपराओं से बंधी हुई है। उन्होंने अपनी आदिम और नस्लीय शुद्धता को काफी हद तक बचाए रखा है। उनकी प्रकृति के साथ गहरी पहचान है। पेड़ों-पत्तों, जड़ी-बूटियों, टीलों-पहाड़ों, पशु-पक्षियों, बादल, बिजली, धरती, आकाश, खेत-खलिहान, बीज और फल-फूलों के साथ इनका ख़ास किस्म का रिश्ता है। वे उनके साथ रचे-बसे हुए हैं।

बैगा जनजाति के लोग मांस, मोटे अनाज, कंदमूल और फलों का भोजन करते हैं। उनके उत्सवों के समय सुअर की बलि देने की प्रथा अभी भी मौजूद है। बलि प्रथा की विधि यह है कि पहले एक बर्तन में गर्म पानी भर लिया जाता है, फिर उसमें सुअर डाल दिया जाता है। जब तक वह चीखता-चिल्लाता रहता है, स्त्रियां गीत गाती रहती हैं। अंत में कुल्हाड़ी से काट दिया जाता है। वे जंगली पशुओं का मांस पाने के लिए शिकार करते हैं, किंतु उनमें चूहों के मांस के प्रति विशेष रुचि पाई जाती है। वे चूहों को भूनकर खाते हैं। सर्प और मेढ़क भी उनके भोजन में शामिल होते हैं।

जंगली जानवरों का शिकार करना और मछली मारना बैगा युवकों का प्रिय मनोरंजन है। बैगा लोगों का पहला भोजन है ‘बासी’ मतलब बचा हुआ भोजन जिसे वे अगले दिन खाते हैं। कोदो और मक्के का घोल ‘पेज’ कहलाता है, जिसमें स्वाद के लिए नमक भी डाल दिया जाता है। मक्का, चावल, कुटकी या ज्वार से भी वे पेज बनाते हैं, जो काफी पतला होता है। मेहमाननवाजी में पेज सबसे पहले दिया जाता है। भात-भाजी का भोजन ‘बियारी’ कहलाता है। अनाजों में ज्वार, बाजरा, मक्का, राई और रमतिल उनकी कृषि उपजें हैं और उनके भोजन का महत्वपूर्ण भाग भी। तेंदू या आम के पत्तों की चुंगी बनाकर उसमें तम्बाकू भरकर धूम्रपान किया जाता है।

बैगाओं की इस तरह की ख़ास जीवन-शैली, खेती की विशेष विधियों और भिन्न किस्म की समाज-व्यवस्था को देखते हुए अंग्रेजों ने 19वीं सदी में एक विशेष इलाका उनके लिए आरक्षित कर दिया था। इसी इलाके में वे बसे हुए हैं। यह आरक्षित क्षेत्र ‘बैगाचक’कहलाता है। बैगा अपने आदिम-विश्वासों के चलते धरती को अपनी माता मानते हैं। भूमि उनकी माता है, इसलिए वे हल चलाकर उसका सीना चीरकर खेती करना पसंद नहीं करते। इसके स्थान पर वे ‘बेंवर खेती’(झूम खेती) करते थे। कहीं-कहीं अब भी करते हैं। सरकारों ने उन्हें ज़मीनें आवंटित कीं, बैल आदि मुहैया कराए। फिर भी खेती की नई प्रचलित विधियां उन्हें रास नहीं आतीं।

वे जंगली जड़ी-बूटियों के गहरे जानकर होते हैं। अपनी इस विशिष्टता के कारण वे अन्य जनजातियों जैंसे गोंड, कोरकू आदि आदिवासियों के गांवों में ‘ओझा’कहलाते हैं। ओझा अर्थात वैद्य। वनोपज जमा करना, उनसे इलाज करना और उसे बेचना भी एक रोज़गार है। बैगाओं में संयुक्त परिवार प्रथा है। परिवार के सभी बड़े-बूढ़े और बच्चे एक साथ ही रहा करते हैं। बैगाओं का मुकद्दम ही उनके गांव का मुखिया होता है। बैगा शेर को अपना छोटा भाई मानते हैं और उसका शिकार नहीं करते। कुछ बैगा समाजों में अब भी उनके आहार में आदिम आहार शामिल है। दीमक, चूहा, चींटी और कंद-मूल ही उनका प्रमुख आहार बना हुआ है। लेकिन धीरे-धीरे आधुनिक आहार उनके जीवन में जगह बनाता जा रहा है।

फ़ोटो साभार : राजेंद्र चंद्रकांत राय

माना जाता है कि हमारे अधिकतर खेल और तमाम तरह की शारीरिक गतिविधियां हमारी आदिम प्रवृत्ति की स्मृतियां हैं। समय के परिवर्तन के साथ हमने उनमें बहुत से बदलाव कर लिए हैं। लेकिन बैगाओं और दूसरी जनजातियों ने अपनी परंपराओं को अभी भी बचाए रखा है। इसलिए वे आदिम संसार में झांकने के लिए हमें एक झरोखा उपलब्ध कराती हैं। मध्य प्रदेश में इसी झरोखे को बनाए और बचाए रखने के लिए ‘राष्ट्रीय बैगा ओलिंपिक’का आयोजन किया जाता है। इस बार चौथा ‘राष्ट्रीय बैगा ओलिंपिक’ अप्रैल के पहले सप्ताह में बालाघाट के बैहर में आयोजित हुआ। आयोजन में बालाघाट टूरिज्म प्रमोशन काउंसिल, आदिवासी विकास विभाग, खेल व युवा कल्याण, पर्यटन विकास निगम, और संस्कृति विभाग ने संयुक्त योगदान किया।

देश की सबसे पिछड़ी हुई और अपने समापन की कगार पर सरक रही बैगा जनजाति की संस्कृति और परंपराओं को संरक्षण देने, ग्रामीण पर्यटन और रोज़गार को बढ़ावा देने और बैगाओं के कौशल से देश को परिचित कराने के लिए इसका आयोजन होता है। तीन दिन के इस आयोजन में बॉली-बॉल, कबड्डी, खो-खो, रस्साकस्सी, धनुष-बाण, मटका दौड़, त्रिटंगी दौड़, बोरा दौड़, बाधा दौड़, भाला फेंक, रिलेरेस, बजनी खेल यानी कुश्ती, लंबी कूद, पाल खेल, बैडमिंटन, गुल्ली डंडा, गोबर डंडा, लीपा-पोती जैसी पारंपरिक और आधुनिक खेल प्रतियोगिताएं हुईं। बैगा ओलिंपिक की सबसे बड़ी विषेशता यह रही कि इसे बैगाओं के ही पारंपरिक खेल-उपकरणों और खेल-विधियों के तहत अंजाम दिया गया।

इसमें अनेक प्रदेशों से आये 400 बैगा खिलाड़ियों ने हिस्सेदारी की। मध्य प्रदेश के बालाघाट, सिवनी, मंडला, डिंडौरी, उमरिया, शहडोल, अनूपपुर, महाराष्ट्र के गोंदिया, भंडारा, नागपुर, गढ़चिरोली, चंद्रपुर और वर्धा, छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव, जगदलपुर, कवर्धा, बिलासपुर, कबीरधाम, दुर्ग, और कांकेर, झारखंड के रांची और धनबाद, आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद जिलों का इसमें प्रतिनिधित्व हुआ। इसके चलते जहां बैगाओं को अपने हुनर को दिखाने का अवसर हासिल हुआ, वहीं पर बैगाओं और जन-जातियों पर अध्ययन करने वाले अध्येताओं, छात्रों, पर्यटकों और उत्सव प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र में भी ये आयोजन बना रहा। बैगा ओलिंपिक में न केवल जन-जातीय खेलों का ही प्रदर्शन हुआ, बल्कि जन-जातीय संस्कृति की झलक दिखाने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भी मनमोहक प्रस्तुतियां हुईं। राजस्थानी संस्कृति का प्रतिनिधित्व वहां के घूमर, भदाई, सपेरा, पुरुलिया-छाउ, बीहू, कलारी और कत्थक नृत्यों ने किया, तो गुजरात का सांस्कृतिक स्वरूप दिखाने के लिए गरबा और टिप्पनी नृत्य प्रदर्शित किए गए। मध्य प्रदेश का बधाई और नवरात्रा नृत्य आकर्षण का केंद्र बना।

बैगा ओलिंपिक की एक अन्य विषेशता रही जनजातीय खान-पान के स्टॉल। इनमें कोदो-कुटकी से बने व्यंजन, शहद, महुआ, बैचांदी-चिप्स और मटका पेज जैसे खाद्य और पेय पदार्थों का स्वाद लेने वालों की भीड़ लगी रही। इस तरह बैगा समाज और गैर- जनजातीय शहरी समाज को एक-दूसरे के निकट आने, परस्पर एक-दूसरे को समझने और पारस्परिक अलगाव को मिटाने का अवसर भी यहां सुलभ हुआ।

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