संयोग नहीं है ये बदहाली

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UP – Muzaffarnagar किसानों की हुंकार से होगा बदलाव?

5 September,2021, UP के मुज़फ़्फ़रनगर में किसानों की महापंचायत किन किन मायनो में अहम रही? ये किसानों का खुद का शक्ति परीक्षण...

ग्रामीण भारत की बदहाली के बारे में मशहूर पत्रिका इकॉनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली (ईपीडब्लू- 3 मार्च 2018) में छपे विशेष आलेख में एक अहम तथ्य का जिक्र हुआ है। तथ्य यह है कि फिलहाल ग्रामीण अर्थव्यवस्था जैसी दुर्दशा की शिकार है, वैसा इसके पहले 1998-2004 के दौर में भी हुआ था। तब भी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए-1) की सरकार केंद्र में थी। उन सात वर्षों के दौरान कृषि की औसत सालाना वृद्धि दर 1.76 प्रतिशत रही। 2004 के बाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उछाल आया। 2004-05 से 2012-13 तक इस क्षेत्र में औसत वृद्धि दर 3.84 फीसदी रही। यानी एनडीए-1 के शासनकाल की तुलना में दोगुना से भी ज्यादा। अब जबकि केंद्र में एनडीए-2 सरकार है, तो इसके कार्यकाल में कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर गिर कर 1.86 प्रतिशत रही है। यानी फिर बात जहां-की-तहां पहुंच गई। क्या यह महज एक संयोग है?

इसके पहले कि हम इस सवाल पर आएं, इस तथ्य पर भी गौर कर लेना चाहिए, जब कृषि की वृद्धि दर बढ़ी, तो उसके साथ-साथ किसानों की औसत आमदनी में भी बढ़ोतरी हुई थी। 2004-05 से 2014-15 तक किसानों की औसत आमदनी में सालाना 5.13 प्रतिशत का इजाफ़ा हुआ। इसके पहले 1999-2000 से 2004-05 के बीच इस आय में सालाना औसतन 0.55 फीसदी की गिरावट आई थी। तो यूपीए-1 और यूपीए-2 के शासनकाल में आखिर ऐसा क्या हुआ, जिससे गिरावट का ट्रेंड एक औसत स्वस्थ वृद्धि दर में तब्दील हो गया?

यूपीए राज में बदली सूरत

बेशक इसका एक कारण तब कृषि संबंधी अनुकूल देशी एवं अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की स्थितियां थीं। मगर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में अपेक्षाकृत ज्यादा बढ़ोतरी भी इसकी अहम वजह रही। इस अनुभव के बावजूद एनडीए-2 की सरकार ने सत्ता में आते ही एमएसपी को लगभग फ्रीज (रोक) कर दिया। इसको बढ़ाने की सुध उसे फिर से चुनाव करीब आने पर ही जाकर आई है। लेकिन अब भी जो घोषणाएं हुई हैं, जानकारों ने उन्हें बेहद देर से उठाया गया नाकाफ़ी कदम ही माना है।

यह निर्विवाद है कि यूपीए के शासनकाल में ग्रामीण इलाकों में बड़ी मात्रा में सरकारी पैसा गया। महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा), ग्रामीण आवास और सड़क निर्माण आदि के तहत हुए खर्च से गांवों में मजदूरी बढ़ी। नतीजतन, वहां अपेक्षाकृत अधिक संख्या में लोग गरीबी रेखा (विश्व बैंक के पैमाने के मुताबिक) से ऊपर आए। इन सबका मिला-जुला एक परिणाम यह जरूर हुआ कि खाद्य पदार्थों की महंगाई सहित आम मुद्रास्फीति में तेज बढ़ोतरी हुई। इससे मध्य वर्ग और शहरी आबादी में तत्कालीन सरकार के प्रति नाराजगी पैदा हुई। ये वो तबके हैं, जिनका मीडिया और आम चर्चा के दूसरे मंचों पर नियंत्रण है। ये समूह वैसा राजनीतिक कथानक बनाने में सक्षम हैं, जिनसे चुनाव के नतीजे तय होते हैं। वैसे भी भारत में मोटे तौर पर अपने वर्गीय एवं सामाजिक नज़रिये तथा पूर्वाग्रहों के कारण ये तबके अनुदारवादी और दक्षिणपंथी रूझानों का समर्थन करते हैं। ये निर्विवाद है कि भारतीय जनता पार्टी स्वाभाविक रूप से ऐसे रूझानों की प्रतिनिधि है। इसलिए इन वर्गों के हितों और उनकी राय को अगर वो सबसे ज्यादा अहमियत देती है, तो इसमें हैरत की कोई बात नहीं है।

फ़ोटो स्रोत: गुरमीत सप्पल

बीजेपी ले आई बदहाली?

लेकिन ऐसा करने का ग्रामीण और गरीब आबादी पर खराब असर पड़ता है, तो इसमें भी कोई अचरज की बात नहीं है। और ऐसा ही उन दोनों मौकों पर हुआ है, जब केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार बनी। इस हकीकत को ध्यान में रखें तो 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करने या किसानों को उनकी लागत के डेढ़ गुना के बराबर एमएसपी दिलाने की वर्तमान सरकार की घोषणाओं पर यकीन करना किसी के लिए भी मुश्किल होगा। वैसे ये बात सिर्फ धारणाओं की नहीं है। बल्कि ठोस आंकड़े भी यही बताते हैं कि कृषि को लाभकारी पेशा बनाने या किसानों की हालत सुधारने के लिए मौजूदा सरकार ने कुछ नहीं किया है। बल्कि हुआ उलटा है।

इस बारे में दो-राय नहीं हो सकती कि खेती-बाड़ी का हाल तभी सुधरेगा, जब कृषि का बुनियादी ढांचा बेहतर होगा। इसके लिए इसमें निवेश अनिवार्य शर्त है। इस बारे में हकीकत क्या है, ये जानने के लिए हम एक बार फिर ईपीडब्लू के उसी आलेख पर गौर कर सकते हैं। इसमें दिए गए प्रामाणिक आंकड़ों के मुताबिक लंबे समय के बाद कृषि क्षेत्र में सरकारी निवेश की उल्लेखनीय वृद्धि 2004-05 और 2013-14 के बीच दर्ज हुई थी। इस दौर में यह निवेश दस फीसदी सालाना की दर से बढ़ा। लेकिन 2013-14 से 2016-17 के बीच इसमें औसतन सालाना 2.3 प्रतिशत की गिरावट आई है। यही हाल कृषि क्षेत्र को मिलने वाले कर्ज का भी है। 2004-05 से 2014-15 के बीच इसमें सालाना 21 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हो रही थी। 2004-05 में एक लाख 25 हजार 309 करोड़ रुपए का कृषि ऋण दिया गया था। 2014-15 में ये रकम 8 लाख 45 हजार 320 करोड़ रुपए रही। मगर 2014-15 से 2016-17 के बीच ये वृद्धि दर घटकर 12.3 प्रतिशत रह गई है (2016-17 में दिए गए कृषि कर्ज की रकम 10 लाख 65 हजार 756 करोड़ रुपए रही। 2013 के बाद खेतिहर और गैर-खेतिहर मजदूरों के मेहताने में भी गिरावट आई है। ये गिरावट क्रमशः 0.3 प्रतिशत और 1.1 फीसदी रही है। इस दौरान मनरेगा, ग्रामीण आवास और ग्रामीण सड़क योजनाओं की भी उपेक्षा हुई है। या तो इनके बजट में कटौती हुई, या फिर मंजूर बजट को पूरा खर्च नहीं किया गया।

आम चर्चा में असंतोष की झलक नहीं

तो फिर इसमें आश्चर्य की क्या बात है कि एनडीए-2 के शासनकाल में ग्रामीण संकट तेजी से बढ़ा है। इसका नतीजा देश भर में फैल रहे किसान आंदोलन हैं। लेकिन यह भी सच है कि इस असंतोष या ग्रामीण भारत की हालत की झलक आम चर्चाओं में देखने को नहीं मिलती। दरअसल, मेनस्ट्रीम मीडिया को नियंत्रित कर लेना मौजूदा सरकार की एक बड़ी कामयाबी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने दो साल पहले कहा था कि ये सरकार अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की सुर्खियां संभालने की रणनीति पर चलती है। कहा जा सकता है कि ये बात ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सिलसिले में भी पूरी तरह लागू होती है।

इसीलिए अब तक राजनीतिक माहौल मोटे तौर पर बीजेपी के खिलाफ नहीं दिखता। ये कहना कठिन है कि क्या आने वाले चुनावों में मतदाताओं का वैसा ही खामोश विद्रोह देखने को मिलेगा, जैसा 2004 में एनडीए-1 के समय हुआ था। लेकिन तब और आज में फर्क यह है कि इस दौर की बीजेपी राष्ट्रीय चर्चा को अपने ढंग से ढालने में ज्यादा सफल है। चर्चा को “राष्ट्रवाद” और हिंदुत्व जैसे मसलों पर टिकाए रखने और इनके जरिए सामाजिक विद्वेषों को हवा देकर जज्बाती माहौल बनाए रखने में वह कामयाब रही है। अक्सर ऐसे वातावरण में लोग अपनी पीड़ा भूलकर अज्ञात भय से राजनीतिक व्यवहार (यानी मतदान) करने को प्रेरित हो जाते हैं। इसलिए ये कहना मुश्किल है कि बीजेपी की नीतियों की वजह से ग्रामीण भारत में आई मुसीबत से 2019 के आम चुनाव का नतीजा तय होगा या नहीं। लेकिन यह कठोर सच है कि फिलहाल देश के ग्रामीण इलाके एक ऐसे गहरे संकट जूझ रहे हैं, जिन्हें हल करने के वास्तविक कदम जल्द ना उठाए गए तो आम बदहाली- यहां तक कि भुखमरी रोजमर्रा की बात बन जाएगी। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि इस सरकार ने ज़मीनी सच की उपेक्षा करते हुए सभी कल्याण योजनाओं को आधार कार्ड से जोड़ने, तमाम लेन-देन ऑनलाइन करने और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को खत्म करने का जो गुमराह उत्साह दिखाया है, अपनी आबादी का एक बड़े हिस्सा उसकी मार भी झेल रहा है। इन सबका मिला-जुला असर क्या होगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

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